- ईरान में प्रदर्शनकारी संघर्ष में अब तक कम से कम 648 लोग मारे जा चुके हैं, जिससे हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं
- डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सैन्य हमले की धमकी दी है, लेकिन उनका अंतिम राजनीतिक लक्ष्य स्पष्ट नहीं है
- अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप से ईरानी जनता की प्रतिक्रिया बढ़ सकती है लेकिन उनका दमन और सख्त हो सकता है- एक्सपर्ट
ईरान में गुस्साई जनता का विद्रोह शांत होने का नाम नहीं ले रहा और दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी अपना दबाव कम करने का नाम नहीं ले रहे हैं. बार-बार सैन्य हमले की धमकी देते ट्रंप के पास ईरान में हस्तक्षेप करने के कई विकल्प हैं. लेकिन इनमें से कोई भी विकल्प चुनने के पहले ट्रंप को यह तय करना होगा कि ईरान को लेकर उनका अंतिम लक्ष्य क्या है. 10 दिन हो गए हैं जब ट्रंप ने कहा था कि अगर ईरान की खामेनेई सरकार सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारियों को मारती है तो अमेरिका के मिसाइल "लॉक एंड लोडेड" हैं और "बचाव के लिए आने" के लिए तैयार हैं.
क्या ट्रंप ईरान में तख्तापलट करना चाहते हैं?
एक तरफ ट्रंप लगातार ईरान को सैन्य हमले की धमकी दे रहे हैं जबकि दूसरी तरफ ईरान में जारी प्रदर्शनों में कम से कम 648 लोग मारे गए हैं. सवाल है कि ट्रंप ईरान में तख्तापलट करना चाहते हैं या नहीं. ईरान में 1979 में इस्लामी क्रांति हुई थी और वहां मौजूद पश्चिम समर्थक शाह की राजशाही को उखाड़ फेंका गया था. उसके बाद से ईरान अमेरिका का कट्टर दुश्मन रहा है. अगर अब ट्रंप ईरान की सत्ता पर काबिज इस्लामी गणतंत्र का तख्तापलट करते हैं तो यह सैन्य कदम पूरे मिडिल ईस्ट को बदल देगा.
हालांकि यहां ख्याल रहे कि ट्रंप ने पहले लक्ष्य के रूप में "सत्ता परिवर्तन" का विरोध किया है, विशेष रूप से ईरान से छोटे देश इराक में अमेरिका को मिली सबक की ओर इशारा करते हुए. ट्रंप अभी सैन्य हमले की धमकी देते हुए दूसरे विकल्प अपना रहे हैं. जैसे सोमवार, 13 जनवरी को उन्होंने ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 प्रतिशत टैरिफ की घोषणा की, साथ ही उन्होंने ईरान की सरकार द्वारा बंद की गई इंटरनेट पहुंच को जबरन बहाल करने के तरीकों की बात की है. अमेरिका और ईरान, दोनों सरकारों ने यह भी खुलासा किया है कि दोनों पर्दे के पीछे बातचीत में भी लगे हैं, जिसका कॉर्डिनेशन ट्रंप के मित्र और दूत स्टीव विटकॉफ द्वारा किया जा रहा है.
ओबामा वाली 'गलती' फिर दोहराएगा अमेरिका?
ईरान के दिवंगत शाह के बेटे रेजा पहलवी अमेरिका में निर्वासन की जिंदगी जीते हैं. उन्होंने अपने सार्वजनिक बयान में ट्रंप को कहा है कि वो बराक ओबामा वाली गलती न दोहराए. ओबामा ने एक घरेलू आंदोलन का समर्थन करने के डर से 2009 के विरोध प्रदर्शनों का समर्थन करने में झिझक दिखाई थी. कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि लगभग एक पीढ़ी पहले ओबामा का डर अब उतना प्रासंगिक नहीं रह गया है, क्योंकि अब प्रदर्शन शिक्षित, शहरी क्षेत्रों से कहीं आगे तक फैल गए हैं, जो हमेशा धार्मिक सरकार का विरोध करते थे.
चैथम हाउस थिंक टैंक में मिडिल ईस्ट एंड नॉर्थ अफ्रीका प्रोग्राम के डॉयरेक्टर सनम वकील का भी यही मानना है. उन्होंने कहा कि ट्रंप के हस्तक्षेप से ईरान के सड़कों पर गति आ सकती है, लोग सड़क पर और ज्यादा उतर सकते हैं. लेकिन उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि ट्रंप का यह कदम समान रूप से ईरान की तानाशाही सरकार को उकसा भी सकता है, जो पैरानॉयड है. वह ट्रंप के हस्तक्षेप में और मजबूती से दमन करना शुरू कर सकती है.
तो ट्रंप को कितना हस्तक्षेप करना चाहिए?
यहां ध्यान रहे कि बीते साल जून में भी ट्रंप ने इजरायल को सपोर्ट देते हुए ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले का आदेश दिया था. ट्रंप बार-बार बातचीत के जरिए समाधान निकालने की बात करते हैं लेकिन हमले की तरफ उनका झुकाव होता है. हाल ही में वेनेज़ुएला में फिर से ऐसा देखा गया है. वो एक बार के सैन्य अभियानों के लिए तुरंत सफलता का दावा करते हैं.
जॉन्स हॉपकिन्स स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज के प्रोफेसर वली नस्र ने कहा कि 130 से 150 ईरानी शहरों में विरोध प्रदर्शन देखा गया है. उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका इन सभी शहरों या यहां तक कि ईरान के प्रमुख शहरों में भी खामेनेई के सुरक्षा बलों पर हमला करने की कोशिश करता है तो यह जून 2025 के हमले से कहीं बड़ा हमा होगा. क्योंकि इस बार केवल कुछ हवाई हमलों से काम नहीं चलेगा. नस्र ने कहा कि ट्रंप संभवत अपने हाथ गंदे नहीं करना चाहते हैं. वो एक ऐसा हमला कर सकते हैं जो चोट देने से अधिक मैसेज देने वाला हो.
अमेरिका और ईरान की सैन्य ताकत

हमला करें या न करें, दोनों की अपनी चुनौती
फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज के एक रिसर्च फेलो बेहनम बेन तालेब्लू ने कहा कि अमेरिका के हस्तक्षेप से एक बड़ा जोखिम यह है कि कहीं अमेरिकी हमलों के बाद ईरान के लोग बाहर निकलना न बंद कर दें. उन्होंने कहा, "हमलों में एक बड़ी चुनौती है. अगर हमला गलत हो जाता है - अगर टारगेट ही गलत हो, अगर खुफिया जानकारी खराब मिली हो, तो इससे विरोध प्रदर्शनों को बढ़ावा मिलने के बजाय यह प्रदर्शनकारियों को तोड़ ही न दे."
पहलवी और अमेरिका में कई रिपब्लिकन समर्थकों ने कूटनीति के विरोध में आवाज उठाई है और चेतावनी दी है कि इससे इस्लामिक गणतंत्र को केवल जीवनदान मिलेगा. लेकिन ईरान पर करीब से नजर रखने वाली अमवाज.मीडिया साइट के संपादक मोहम्मद अली शबानी का मानना है कि कई ईरानी ऐसे समझौते का स्वागत करेंगे जो प्रतिबंधों में ढील देगा और "युद्ध की छाया को हटा देगा."
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