जिस तरह से हमारी रगों में खून का बहते रहना जरूरी है, ठीक उसी तरह से दुनिया की अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए तेल का बहते रहना भी जरूरी है. तेल दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए 'खून' की तरह काम करता है. इस तेल पर अगर कोई संकट आए, तो बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाएं पटरी से कैसे उतर सकती हैं, ये अमेरिका-ईरान युद्ध में देख ही लिया. अमेरिका जैसे दुनिया के ताकतवर मुल्क में तेल का खजाना खाली होने लगा था.
अमेरिका-ईरान की जंग के कारण होर्मुज स्ट्रेट भी बंद हो गया था, जहां से दुनियाभर को 20 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल सप्लाई होता है. जानकारों ने चेता ही दिया था कि अगर लंबे समय तक ये खेल चलता है तो इससे तेल का अब तक का सबसे बड़ा संकट आ सकता है.
खैर, ऐसे हालात बनने से पहले ही अमेरिका और ईरान में एक शांति समझौता हो गया है. दोनों ने 17 जून को MoU पर दस्तखत कर दिए हैं. अब 60 दिन हैं फाइनल डील करने में. MoU पर साइन होने के बाद अमेरिका ने ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंध को 60 दिन के लिए हटा दिया है. अब ईरान फिर से दुनियाभर को अपना तेल बेच सकता है. अब जब दुनिया ने अमेरिका-ईरान की जंग में तेल का खेल देख ही लिया है तो यह भी जान लेना जरूरी है कि इस खेल का बड़ा खिलाड़ी कौन है?
कौन है तेल की दुनिया का बादशाह?
दुनिया में तेल की दुनिया का बादशाह अमेरिका है. अमेरिका ही है, जहां कच्चे तेल का सबसे ज्यादा उत्पादन होता है. अमेरिका के एनर्जी इन्फोर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) के मुताबिक, 2025 में अमेरिका में रोजाना कच्चे तेल का 1.35 करोड़ बैरल से ज्यादा उत्पादन हुआ. दुनिया में कच्चे तेल का जितना उत्पादन होता है, उसमें से 16% अकेला अमेरिका में होता है.
कच्चे तेल का सबसे ज्यादा उत्पादन कभी रूस में होता था. लेकिन अब इस मामले में अमेरिका पहले नंबर पर है. अमेरिका में होने वाले कुल उत्पादन का लगभग एक-चौथाई हिस्सा पर्मियन बेसिन से आता है, जो पश्चिमी टेक्सास और दक्षिण-पूर्वी न्यू मैक्सिको में फैला है. पर्मियन और टेक्सास के अलावा, अमेरिका के अलास्का और मैक्सिको की खाड़ी में भी तेल के बड़े भंडार मौजूद हैं.
दूसरे नंबर पर रूस है, जहां 2025 में 1.05 करोड़ बैरल कच्चा तेल निकला था. रूस पर यूक्रेन के साथ जंग का असर भी पड़ा है. 2022 के बाद से रूस का कच्चा तेल का उत्पादन घटता जा रहा है. 2022 की तुलना में 2025 में इसमें 4 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है.
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खाड़ी देश कहां टिकते हैं?
ये तो सभी जानते हैं खाड़ी देशों में तेल के कुएं हैं. इसलिए तेल के उत्पादन में भी वही आगे रहेंगे. खाड़ी देश अब भी दुनिया के सबसे बड़े ऑयल हब हैं. दुनिया के टॉप 10 कच्चे तेल उत्पादक देशों में मिडिल ईस्ट के 5 देश शामिल थे. इनमें सबसे आगे सऊदी अरब रहा, जहां रोज 90 लाख बैरल से ज्यादा कच्चा तेल का उत्पादन हुआ. दूसरे नंबर पर इराक था, जहां रोजाना का उत्पादन 43 लाख बैरल रहा. फिर ईरान में 42 लाख बैरल, संयुक्त अरब अमीरात में 38 लाख और कुवैत में 26 लाख बैरल उत्पादन हुआ था.
ये सभी पांचों देश फारस की खाड़ी के किनारे हैं. इस कारण ग्लोबल एनर्जी मार्केट में इनकी भूमिका काफी अहम हो जाता है. यही कारण है कि होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से ग्लोबल सप्लाई पर बड़ा असर पड़ता है.
हालांकि, दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार वेनेजुएला के पास है. OPEC के डेटा के मुताबिक, वेनेजुएला के पास 303 अरब बैरल कच्चे तेल का भंडार मौजूद है. दूसरे नंबर पर सऊदी अरब है, जिसके पास 267 अरब बैरल तेल है. ईरान के पास 208 अरब बैरल से ज्यादा भंडार है. वहीं, अमेरिका के पास 45 अरब बैरल तेल का भंडार ही है.
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अब जानिए ईरान पर प्रतिबंधन हटने का मतलब क्या हुआ?
अमेरिका की ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने सोमवार को प्रतिबंधों में छूट के लिए लाइसेंस जारी किया था. ये छूट 21 अगस्त तक लागू रहेगी. प्रतिबंधों में छूट का मतलब हुआ कि ईरान अब अमेरिका ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को अपना तेल बेच सकता था. प्रतिबंधों के कारण अब तक ईरानी तेल खरीदने पर अमेरिका खरीदार देशों पर भी प्रतिबंध लगा देता था.
ये छूट अभी 60 दिन की है और अगर अमेरिका-ईरान के बीच फाइनल डील होती है तो ये प्रतिबंध लंबे समय के लिए भी हट सकता है. इसके बदले में ईरान ने अपनी न्यूक्लियर फैसेलिटीज में इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) को निरीक्षण की इजाजत दी है. इसका सबसे बड़ा फायदा भारत को होगा. वह इसलिए क्योंकि 2018 में अमेरिकी प्रतिबंध दोबारा लगने से पहले तक ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार भारत ही था. भारत अपनी जरूरत का 85% तक कच्चा तेल आयात करता है.
लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि भारत तुरंत ही ईरानी तेल खरीदना शुरू कर देगा. इसमें थोड़ा समय लगेगा. हालांकि, ईरानी तेल के बाजार में आने से कच्चे तेल की कीमत भी कम होगी. इससे भारत का इंपोर्ट बिल कम होगा.
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