अमेरिका और ईरान के बीच छिड़े भीषण युद्ध ने अब ग्लोबल डिफेंस सप्लाई चेन की कमर तोड़ दी है. आलम यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति होने का दम भरने वाले अमेरिका के पास अब अपने ही करीबियों को देने के लिए हथियार कम पड़ गए हैं. व्हाइट हाउस ने साफ कर दिया है कि ईरान के खिलाफ जारी सैन्य अभियान के कारण उसके हथियारों का भंडार तेजी से खाली हो रहा है, जिसका सीधा असर अब यूरोप के उन देशों पर पड़ेगा जो अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिकी वेपन्स के भरोसे बैठे थे.
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों ने अपने यूरोपीय समकक्षों को सूचित किया है कि पहले से तय और कॉन्ट्रैक्ट हो चुके हथियारों की डिलीवरी में अब लंबा इंतजार करना पड़ सकता है.
इस फैसले की सबसे ज्यादा मार बाल्टिक देशों और स्कैंडिनेवियाई देशों पर पड़ने वाली है. ये वे देश हैं जो रूस की सीमा के करीब हैं और अपनी रक्षा तैयारियों के लिए पूरी तरह से अमेरिकी 'फॉरेन मिलिट्री सेल्स' (FMS) प्रोग्राम पर निर्भर हैं. एस्टोनिया और लिथुआनिया के रक्षा मंत्रालयों ने भी पुष्टि की है कि उन्हें अमेरिका से संभावित देरी के संदेश मिल चुके हैं, जिससे उनकी सैन्य योजनाएं खटाई में पड़ती नजर आ रही हैं.
युद्ध जीतना पहली प्राथमिकता
जब इस देरी पर व्हाइट हाउस और विदेश विभाग से सवाल किया गया, तो उन्होंने गेंद पेंटागन के पाले में डाल दी. पेंटागन के प्रवक्ता ने गोल-मोल जवाब देते हुए कहा कि अमेरिकी सेना दुनिया की सबसे ताकतवर सेना है और वह अपने सहयोगियों की जरूरतों का ख्याल रखेगी. हालांकि, 'ऑपरेशनल सिक्योरिटी' का हवाला देते हुए उन्होंने यह बताने से इनकार कर दिया कि किन हथियारों की डिलीवरी रोकी गई है. हकीकत यह है कि अमेरिका इस वक्त दोतरफा दबाव में है एक तरफ उसे इजरायल के साथ मिलकर ईरान से लड़ना है, तो दूसरी तरफ अपने नाटो सहयोगियों को खुश रखना है.
सहयोगियों पर ठीकरा फोड़ रहा ट्रंप प्रशासन
अमेरिकी अधिकारी इस देरी के लिए यूरोपीय देशों को भी जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. वाशिंगटन का तर्क है कि ईरान के खिलाफ युद्ध में और 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को खोलने में यूरोपीय देशों ने वैसी मदद नहीं की जैसी उम्मीद थी. अमेरिका का कहना है कि उसे मध्य-पूर्व में अपनी मोर्चेबंदी मजबूत करने के लिए इन हथियारों की तत्काल जरूरत है.
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