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9/11 के बाद कैसे रूस और अमेरिका के बीच सुधर गए थे रिश्ते, फिर अचानक क्या बिगड़ा?

11 सितंबर 2001 के आतंकी हमले के बाद रूस और अमेरिका के रिश्तों में अप्रत्याशित गर्मजोशी आ गई थी. राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सबसे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश को समर्थन का संदेश दिया और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में खुलकर सहयोग किया.

9/11 के बाद कैसे रूस और अमेरिका के बीच सुधर गए थे रिश्ते, फिर अचानक क्या बिगड़ा?
9/11 के बाद, पश्चिमी देश और रूस आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में एकजुट थे.
AFP

अमेरिका में 11 सितंबर 2001 के उस भयावह आतंकी हमले को आज 25 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन उसकी गूंज आज भी दुनिया में सुनाई देती है. करीब 3,000 बेकसूर लोगों की जान लेने वाले इस हमले ने रूस और पश्चिमी देशों के रिश्तों की पूरी पटकथा ही बदलकर रख दी. आज भले ही यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस और पश्चिमी देश आमने-सामने खड़े हों और दुश्मनों जैसा बर्ताव कर रहे हों, लेकिन 9/11 के ठीक बाद का दौर कुछ और ही कहानी बयां करता है. उस वक्त दोनों के बीच ऐसी दोस्ती की शुरुआत हुई थी, जिसकी किसी ने उम्मीद भी नहीं की थी.

सोवियत संघ के बिखरने के बाद मॉस्को हमेशा से पश्चिमी देशों के साथ अपने रिश्ते सुधारना चाहता था. 9/11 के हमले के बाद आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पश्चिमी देश और रूस अचानक एक मंच पर आ गए. हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश को फोन करने वाले सबसे पहले विदेशी नेता रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ही थे. पुतिन ने अमेरिका को बिना शर्त समर्थन की पेशकश की और टीवी पर लाइव आकर अमेरिकी जनता से कहा, "रूस की तरफ से मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि हम इस मुश्किल घड़ी में आपके साथ हैं."

जब अमेरिका के लिए पुतिन बने मददगार

अल-कायदा और तालिबान का सफाया करने के लिए जब अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने अफगानिस्तान पर हमला बोला, तो रूस ने खुलकर मदद की.

पुतिन प्रशासन ने अफगानिस्तान से जुड़ी बेहद संवेदनशील और अहम जानकारियां अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के साथ शेयर कीं. इतना ही नहीं, जब अमेरिका ने अपने सैन्य अभियानों के लिए इस इलाके में अपने मिलिट्री बेस बनाए, तब भी पुतिन ने कोई आपत्ति नहीं जताई. उस समय लगा कि रूस और अमेरिका की यह नई दोस्ती वैश्विक राजनीति को एक नए दौर में ले जाएगी.

इराक युद्ध में आया भरोसे में दरार

लेकिन यह दोस्ताना ज्यादा दिनों तक टिक न सका. साल 2003 में जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया, तो इस रिश्ते में हमेशा के लिए खटास आ गई. अमेरिका ने दावा किया था कि इराक के पास तबाही फैलाने वाले हथियार (WMD) हैं, जो बाद में पूरी तरह झूठे साबित हुए.

इराक में रूस के बड़े आर्थिक और व्यापारिक हित जुड़े हुए थे. अमेरिका के इस कदम से पुतिन को लगा कि वाशिंगटन रूस के हितों की सरेआम अनदेखी कर रहा है. 

उस दौर में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के विदेश नीति सलाहकार और अमेरिका में राजदूत रहे सर डेविड मैनिंग ने भी इस बात को स्वीकार किया था कि 9/11 के बाद इतने सहयोग के बावजूद इराक में अपने हितों की अनदेखी से पुतिन बेहद नाराज थे. 

पुतिन को लगा कि अमेरिका 'तबाही के हथियारों' का बहाना बनाकर मनमाने ढंग से दूसरे देशों में सत्ता बदलने का खेल खेल रहा है. टोनी ब्लेयर के चीफ ऑफ स्टाफ जोनाथन पॉवेल का भी मानना था कि इराक युद्ध ही वो मुख्य वजह थी जिसने पुतिन के साथ पश्चिमी देशों के रिश्तों को पूरी तरह तोड़कर रख दिया.

विश्वासघात का दौर 

इराक युद्ध के बाद रिश्तों में जो गिरावट शुरू हुई, वो रुकने का नाम नहीं ले रही थी. रूस की नजर में अमेरिका और उसके सहयोगियों ने एक के बाद एक कई ऐसे कदम उठाए जिससे तनाव बढ़ता गया. इनमें नाटो (NATO) का विस्तार कर बाल्टिक देशों को शामिल करना, अमेरिका का एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल ट्रीटी से एकतरफा बाहर निकल जाना और यूरेशिया में हुए 'कलर रेवोल्यूशन' को वाशिंगटन का समर्थन मिलना शामिल था.

इन तमाम घटनाओं ने रूस और अमेरिका के बीच अविश्वास की ऐसी दीवार खड़ी कर दी जो आज तक ढह नहीं सकी है. दशकों बाद आज हालात यह हैं कि रूस और पश्चिमी देश एक-दूसरे को सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखते हैं, जहां एक की जीत दूसरे की सीधी हार मानी जाती है.

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