उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव बदले-बदले नजर आ रहे हैं. उन्होंने राम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण को उठाते हुए भगवान राम में आस्था रखने वालों की बात की तो वहीं शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के चरणों में भी बैठे दिखे. लखनऊ में सपा की ओर से ब्राह्मण सम्मेलन का आयोजन कराया गया और अब ऐसे ही एक और कार्यक्रम की तैयारी है. यही नहीं सपा दफ्तर के बाहर तो 'सनातन ही समाजवाद है' लिखा बैनर लगाया गया. ऐसे में सवाल है कि क्या अखिलेश यादव सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति की ओर बढ़ रहे हैं या फिर यूपी में प्रभावी सवर्ण वोट लुभाने के लिए उन्हें यही रास्ता दिखा है?
सपा के प्रवक्ता राजकुमार भाटी बीते दिनों कई विवादों में फंसते दिखे. एक सेमिनार में ब्राह्मणों को लेकर उनकी टिप्पणी पर खूब विवाद हुआ. इसके अलावा राजपूतों का गुस्सा भी उनके सांसद रामजीलाल सुमन पर भड़का था. उन्होंने महाराणा सांगा को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी. इस तरह सपा के नेताओं के बयानों से यह नैरेटिव सवर्णों के विपरीत जाता दिख रहा था. भले ही अखिलेश यादव PDA की राजनीति कर रहे हैं, लेकिन सवर्ण भी यूपी में प्रभावी हैं. अलग-अलग आंकड़े बताते हैं कि ब्राह्मण उत्तर प्रदेश में उन जातीय समूहों में से एक है, जिनकी संख्या काफी अधिक है. अब यदि इसी में क्षत्रिय और वैश्य समुदाय को जोड़ लिया जाए तो आंकड़ा 25 फीसदी के करीब जाता है.
ऐसी स्थिति में सपा नहीं चाहेगी कि इतने बड़े वर्ग को अपनी राजनीति से ही परे रखा जाए. अवध और पूर्वांचल के कई जिलों तो इनका अच्छा खासा प्रभाव है. इसके इतर ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज की नैरेटिव पावर भी काफी अधिक रही है. यदि ब्राह्मण एकतरफा पाले से बाहर रहे तो फिर सपा के लिए मुश्किल होती. इसीलिए समाजवादी पार्टी ने रुख बदला है और अखिलेश यादव ने खुद ही इसकी कमान संभाली है. हालांकि यह भी समझना महत्वपूर्ण है कि आखिर सपा को इससे कितना फायदा मिलेगा. इसलिए क्योंकि 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले भी समाजवादी पार्टी ने ऐसी पहल की थी.
फायदे की उम्मीद, पर अखिलेश के सामने 2022 जैसा खतरा भी
लखनऊ में अखिलेश यादव ने भगवान परशुराम की प्रतिमा का अनावरण भी किया था, किंतु नतीजों में इसका कोई फायदा नहीं दिखा. यही नहीं सीएसडीएस के डेटा के अनुसार ब्राह्मण समुदाय भाजपा को समर्थन देने में सबसे आगे था. यही कारण है कि यूपी की राजनीति को समझने वाले कुछ लोग अखिलेश की इस रणनीति पर सवाल भी उठा रहे हैं. उनका सवाल है कि यदि अखिलेश इस तरह सवर्णों को लुभाने में जुटे हैं तो क्या उनका उतना वोट मिल पाएगा. कहीं ऐसा न हो कि सवर्णों का वोट उतना न मिले, जितना अखिलेश यादव एफर्ट कर रहे हैं. लेकिन पिछड़ों और दलितों का वोट छिटक जाए. फिलहाल 2027 पर नजर है और अखिलेश यादव की राजनीति तब तक क्या रंग बदलती है, यह देखना होगा.
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