सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं के बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने बड़ा स्पष्टीकरण दिया है. नियुक्ति विभाग ने साफ कहा है कि किसी भी अभ्यर्थी को केवल उसकी राजनीतिक विचारधारा, वैचारिक मतभेद, सरकार की आलोचना या शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक गतिविधियों के आधार पर सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा. विभाग ने कहा कि हाल में चरित्र एवं पूर्ववृत्त सत्यापन से जुड़े शासनादेश को लेकर कुछ खबरों में भ्रामक व्याख्या सामने आई, जिसके बाद स्थिति स्पष्ट करना जरूरी हो गया.
नियुक्ति विभाग के अनुसार, शासनादेश का सही अर्थ उसके पूरे पाठ और वास्तविक संदर्भ को पढ़कर ही समझा जाना चाहिए. विभाग ने कहा कि इस नियम को ऐसा बताना गलत है मानो राजनीतिक विचार रखने या किसी वैचारिक असहमति के कारण उम्मीदवारों को सरकारी सेवाओं से बाहर किया जाएगा. शासनादेश में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है.
राजनीतिक विचार और हिंसक गतिविधियां अलग-अलग विषय
सरकार ने स्पष्ट किया है कि नियम में राजनीतिक विचारधारा और हिंसक गतिविधियों के बीच साफ अंतर किया गया है. शासनादेश में केवल उन संगठनों और गतिविधियों का उल्लेख है, जिनका घोषित उद्देश्य हिंसक तरीकों से समाज की मौजूदा व्यवस्था को बदलना है. ऐसे मामलों में अभ्यर्थी की भूमिका और संलिप्तता का परीक्षण निर्धारित नियमों के तहत किया जाएगा.
विभाग का कहना है कि सरकार की आलोचना करना, किसी नीति का विरोध करना, लोकतांत्रिक तरीके से प्रदर्शन करना या किसी राजनीतिक विचार को मानना, इन्हें हिंसक गतिविधियों के समान नहीं माना जा सकता. इसलिए सामान्य राजनीतिक गतिविधियों को लेकर युवाओं में किसी तरह की आशंका नहीं होनी चाहिए.
पहले भी था नियम, अब किया गया अधिक स्पष्ट
नियुक्ति विभाग ने बताया कि यह प्रावधान कोई नया नहीं है. सरकारी नियुक्तियों में चरित्र एवं पूर्ववृत्त सत्यापन से संबंधित नियम पहले से लागू थे. हाल में जारी शासनादेश में उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में विभिन्न प्रावधानों को एक जगह संकलित कर अधिक सरल, स्पष्ट और व्यवस्थित रूप में रखा गया है.
सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य नियमों के एकरूप पालन को सुनिश्चित करना और सत्यापन प्रक्रिया में अस्पष्टता को खत्म करना है. इससे अभ्यर्थियों और संबंधित अधिकारियों दोनों को नियमों को समझने में आसानी होगी और अनावश्यक भ्रम की स्थिति नहीं बनेगी.
तीन साल की अवधि पर भी सरकार ने दी सफाई
शासनादेश में 21 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद जांच की तारीख से पहले के तीन वर्षों के दौरान किसी व्यक्ति की गतिविधियों का उल्लेख किया गया है. विभाग ने कहा कि इसे अलग से पढ़कर निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा.
नियम में यह भी प्रावधान है कि यदि संबंधित व्यक्ति के व्यवहार और प्रवृत्ति में सकारात्मक बदलाव के ठोस प्रमाण मिलते हैं तो उसे भी ध्यान में रखा जाएगा. यानी केवल तीन वर्ष की अवधि का जिक्र करके नियम की व्याख्या नहीं की जा सकती, बल्कि उसके सभी प्रावधानों को साथ पढ़ना जरूरी है.
युवाओं में भ्रम न फैले, इसलिए जारी किया गया स्पष्टीकरण
नियुक्ति विभाग ने कहा कि सरकारी सेवाओं में चरित्र एवं पूर्ववृत्त सत्यापन एक स्थापित प्रक्रिया है, जिसका मकसद अभ्यर्थी की उपयुक्तता का आकलन करना है. ऐसे में शासनादेश को उसके मूल आशय से अलग करके प्रस्तुत करना उचित नहीं है. विभाग ने मीडिया और आम लोगों से अपील की है कि नियमों की व्याख्या पूरे संदर्भ में की जाए ताकि अभ्यर्थियों के बीच किसी तरह का भ्रम न फैले.
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