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दलित सियासत पर उत्तर प्रदेश में घमासान, क्या वाकई बदल रहा है इस समुदाय का वोटिंग पैटर्न?

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में अब कुछ महीने ही बाकी हैं. ऐसे में जानना जरूरी है कि यूपी में दलित समुदाय कि सियासी ताकत कितनी है?

दलित सियासत पर उत्तर प्रदेश में घमासान, क्या वाकई बदल रहा है इस समुदाय का वोटिंग पैटर्न?
यूपी में दलित एक बड़ा वोट बैंक है.
लखनऊ:

हिंदी में एक कहावत है- 'मरा हाथी भी सवा लाख का होता है.' कहावत से इतर भी सियासत में किसी को 'खत्म' मान लेना खतरों भरा है. उत्तर प्रदेश जहां अगले साल चुनाव होने हैं वहां कई राजनीतिक विश्लेषक दलित वोटरों के गणित को समझने की खूब कोशिश कर रहे हैं. 

किसी जमाने में इस वोट बैंक पर एकतरफा बीएसपी का दबदबा था, जिसकी मुखिया मायावती हैं. यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री के पीछे वोट बैंक का वजन पिछले चुनावों में चाहे घटा हो, लेकिन दलित नेता के तौर पर उनकी अहमियत बरकरार है. और यही वजह है कि दलित वोट बैंक में सेंधमारी करने को आतुर तमाम दलों को गाहे-बगाहे बहन मायावती की याद आ ही जाती है, फिर चाहे उनसे गठबंधन करने की बात हो या फिर उनकी लीगेसी को सड़क पर चुनौती देने की बात. पैमाना आज भी मायावती बनी हुईं हैं, लेकिन दलित वोटों का समीकरण बदल रहा है.

मेरठ में दलित छात्रा ललिता गौतम की हत्या और उसके बाद हुए विरोध प्रदर्शन को लेकर बीएसपी प्रमुख मायावती और आजाद समाज पार्टी (एएसपी) के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद के बीच तीखी बयानबाजी हुई. मायावती ने जहां दलित समाज से कानून हाथ में न लेने और न्याय के लिए सड़कों पर उतरने के बजाय न्यायिक प्रक्रिया और अदालतों का रुख करने की अपील की और आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक दल शोषित वर्ग को गुमराह करके राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं और उनके लिए 'मगरमच्छ के आंसू' बहा रहे हैं. वहीं चंद्रशेखर आजाद ने पलटवार कर कहा कि पीड़ितों को अदालतों से न्याय मिलने में लंबा समय लग सकता है, इसलिए अत्याचार के खिलाफ सड़क पर उतरकर तुरंत आवाज उठाना और संघर्ष करना जरूरी है. मायावती पर इशारों में हमला बोलते हुए आजाद ने ये तक कहा कि वे लोग घरों में नहीं बैठे हैं, बल्कि पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए खुद मैदान में लड़ रहे हैं.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय बोलबाला

जातीय समीकरणों का महत्व उत्तर प्रदेश की राजनीति में हमेशा रहा है. अगड़ा-पिछड़ा, सवर्ण-दलित तक ही नहीं बल्कि जातीय समीकरणों में भी उपजातियां तक चुनावी नतीजे ऊपर नीचे कर देते हैं. इसलिए कई पार्टियों का अस्तित्व जातीय आधार पर ही खड़ा है, जिसके उदाहरण उत्तर प्रदेश से अधिक शायद ही किसी राज्य में मिलते हों. टिकट बंटवारे से लेकर पार्टियों में पदों तक में जातीय गणित का हिसाब लगभग तमाम पार्टियां रखतीं हैं. इतनी जटिलताओं के बीच वोटर किस पार्टी को वोट दे उसका चुनाव करता है, इसलिए पार्टियां हर मुद्दे को भुनाना चाहतीं हैं जो किसी जाति समूह, जाति या फिर उपजाति को प्रभावित कर रही हों. 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ऐसा ही जाति समूह दलित वोटरों का है, जिस पर नजर तो सबकी होती है लेकिन उसका आशीर्वाद किसे मिलेगा इस पर सस्पेंस चुनाव नतीजों तक बना रहता है. दलित वोटरों की विशेषता ये मानी जाती है कि जसकी तरफ भी वो खड़े होते हैं, तराजू का पलड़ा उधर झुकने की संभावना बढ़ जाती है. 

यही वजह है कि कई पार्टियां भी दलित वोटरों के दम पर ही अस्तित्व में आ गईं और दलित वोटरों की धुरी पर कई नेता सिर्फ राज्य भर में ही नहीं पूरे देश में अपनी पहचान बना पाए. ऐसे नेताओं की फेहरिस्त लंबी है, लेकिन इतिहास से इतर भविष्य की चिंता इन दिनों तमाम पार्टियों का सता रही है इसलिए वो अपने-अपने अनुसार दलित वोट पर डोरे डालने की राजनीति में लगे हैं.

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कैसे बदला दलित सियासत का नंबर गेम?

2022 में हुए यूपी विधानसभा चुनाव और फिर 2024 के लोकसभा चुनाव के बीच दलित वोटिंग पैटर्न में कई बदलाव दिखते हैं. सबसे बड़ा बदलाव यह है कि दलित वोट बीएसपी–केंद्रित तिकोने खेल से निकलता दिखाई दिया. खास तौर पर नॉन‑जाटव समुदायों में बीएसपी से दूरी और बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए और समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन की दो मजबूत धुरी की ओर जाता दिखा. 2024 के लोकसभा चुनावों में तो जाटवों के भीतर भी पहली बार मायावती की पकड़ साफ तौर पर ढीली दिखी और SP-कांग्रेस ने यहां भी लगभग एक चौथाई आधार बना लिया.

2022: बीएसपी का सिक्का नहीं चला, दलित वोटरों में बिखराव

2022 विधानसभा चुनाव में दलित वोट बुरी तरह बंटा हुआ था. और ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बीएसपी का पारंपरिक आधार सिकुड़ चुका था, लेकिन तब नॉन‑जाटव दलितों की बड़ी संख्या बीजेपी के साथ गई थी. और तब, कुछ हिस्सा SP के साथ चला गया. बीएसपी का वोट शेयर महज 12.8% तक गिर गया और वह विधानसभा में एक सीट पर सिमट गई, जबकि बीजेपी गठबंधन ने SC आरक्षित सीटों पर बोलबाला बनाए रखा. बीजेपी ने पिछले विधानसभा चुनावों में नॉन‑जाटव दलितों को कल्याण योजनाओं और सुरक्षा-कानून व्यवस्था नैरेटिव के आधार पर अपनी ओर खींचा.

लेकिन, जाटव तब भी बीएसपी के साथ ही स्थायी ब्लॉक के तौर पर थे. लेकिन मायावती की पार्टी के लिए जाटवों की वफादारी भी पहले जैसी ठोस नहीं रही. पहली बार जाटव वोट बैंक भी बीजेपी और SP की ओर खिसकता दिखा. नॉन‑जाटव दलित, जिनमें पासी, वाल्मीकि, कोरी आदि शामिल हैं वो दलित वोट बैंक में स्विंग वोट बन गए. 

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2024: नॉन‑जाटव वोटरों का झुकाव, जाटव वोटरों में बढ़ी दरार

2024 लोकसभा में तस्वीर 2022 की तुलना में उलट गई. नॉन‑जाटव दलितों में INDIA ब्लॉक को लगभग 56% तक समर्थन मिला, जबकि एनडीए और बीएसपी दोनों काफी पीछे रह गए. जाटवों में भी बीएसपी की 'सिंगल नेचुरल होम' वाली स्थिति कमजोर पड़ी और पार्टी सिर्फ 44% जाटव वोट बचा पाई, जबकि SP–कांग्रेस गठबंधन लगभग 25% तक पहुंच गया और बाकी हिस्सा बीजेपी और चंद्रशेखर आजाद की पार्टी  में बंट गया.

2024 लोकसभा चुनावों में बीजेपी का कुल वोट शेयर 2019 की तुलना में गिरा और वह दलितों, खास तौर पर नॉन‑जाटव में अपना 2014–19 वाला 'Rainbow coalition' वाला जलवा बरकरार नहीं रख पाई. वहीं SP ने 17 में से 7 SC आरक्षित सीटें और कांग्रेस ने 1 सीट जीती, जो ये दिखाता है कि दलित वोट, खासकर नॉन‑जाटव, INDIA के पक्ष में निर्णायक रूप से री-अलाइन हुआ.

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मायावती फैक्टर: करिश्मा से 'नॉट‑इन‑कॉन्टेस्ट' तक

मायावती की राजनीतिक हैसियत 2022 में भी गिरावट पर थी, पर तब तक जाटव कोर ने उन्हें पूरी तरह नहीं छोड़ा था; बीएसपी की पहचान अब भी दलित प्रतिनिधित्व की मुख्य धुरी मानी जाती थी, भले सीटें न आयी हों. 2024 तक आते‑आते नेतृत्व संकट, आक्रामक एंटी‑बीजेपी स्टैंड की कमी और जमीन पर कमजोर अभियान ने यह धारणा बना दी कि बीएसपी 'लड़ नहीं रही', सिर्फ सिम्बॉलिक उपस्थिति है. इसी खालीपन में SP–कांग्रेस ने संविधान, आरक्षण और जाति जनगणना के सवालों को केंद्रीय मुद्दा बनाकर दलित मतदाताओं, खास तौर पर युवाओं और महिलाओं, को नया भरोसा दिया. नतीजा यह हुआ कि मायावती की व्यक्तिगत विश्वसनीयता भी पहली बार इतने बड़े पैमाने पर चुनौती में आई और जाटव–नॉन‑जाटव दोनों हिस्सों ने उन्हें 'वोट बर्बाद' समझते हुए INDIA ब्लॉक की ओर शिफ्ट करना शुरू किया.

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क्या चंद्रशेखर आजाद मायावती के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं?

दरअसल, मायावती और चंद्रशेखर आजाद दोनों ही जाटव समुदाय से आते हैं और पश्चिमी यूपी से भी जहां दलित सियासत सबसे अधिक मुखर है. 2022 से 2024 के बीच चंद्रशेखर आजाद का उभार मायावती और बीएसपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आया. खासतौर पर पश्चिमी यूपी में जहां कभी बीएसपी का मजबूत जाटव आधार था. नगीना से 1.5 लाख के आसपास के अंतर से उनकी जीत ने यह संकेत दिया कि दलित, विशेषकर युवा जाटव, अब मायावती के अलावा भी एक वैकल्पिक नेतृत्व को गंभीरता से लेने लगे हैं.

2022 तक चंद्रशेखर की राजनीति ज्यादातर आंदोलनकारी और प्रतीकात्मक दिखती थी, जबकि संगठनात्मक स्तर पर बीएसपी अभी भी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती थी. लेकिन 2024 तक आते‑आते नगीना, बिजनौर बेल्ट, मुरादाबाद–सहारनपुर–मुजफ्फरनगर के पश्चिमी यूपी इलाके और कुछ हद तक डुमरियागंज जैसे पूर्वांचल के पॉकेट्स में आजाद समाज पार्टी ने बीएसपी से ज्यादा वोट लेकर जमीन पर अपनी वास्तविक उपस्थिति दर्ज करा दी.

यही वजह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी 9% के आसपास वोट शेयर और शून्य सीट पर सिमट गई, जबकि चंद्रशेखर न सिर्फ जीते, बल्कि जाटव‑केंद्रित BSP मॉडल को चुनौती भी देते दिखे. 2022-2024 के बीच पूरे यूपी में वोट शेयर के स्तर पर चंद्रशेखर और मायावती की तुलना करें तो जहां 2022 में ASP हाशिये पर थी और BSP तीसरी–चौथी ताकत, लेकिन 2024 में नगीना जैसी सीटों पर चंद्रशेखर ने सीधे मायावती को लोकल स्तर पर रिप्लेस कर दिया. 2024 लोकसभा में नगीना (SC) सीट पर चंद्रशेखर आजाद ने लगभग 51.19% वोट लेकर जीत दर्ज की. उसी सीट पर BSP के उम्मीदवार को सिर्फ 1.33% वोट मिले और वे चौथे स्थान पर रहे. लोकसभा में एक सीट जीतना तो दूर पूरे यूपी में बीएसपी का कुल वोट शेयर लोकसभा 2024 में गिरकर सिंगल डिजिट में आ गया यानी 10 फीसदी से भी कम.

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कैसा है उत्तर प्रदेश में दलित वोटरों का समीकरण?

उत्तर प्रदेश को क्षेत्रीय हिसाब से मोटे तौर पर पांच हिस्सों में बांटा जाता है. हर इलाके में दलित वोट महत्वपूर्ण तो है, लेकिन क्षेत्रों के बदलते ही दलितों में जातीय समीकरण भी बदल जाते हैं और उसी हिसाब से नतीजों में किस जाति का किस इलाके में बोलबाला होगा, वो भी तय होता है. यहां जिन पांच क्षेत्रों की बात हो रही है, वो हैं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मध्य उत्तर प्रदेश जिसे अवध भी कहते हैं, बुंदेलखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और रूहेलखंड. 

एक ही प्रदेश के भीतर इतने सारे क्षेत्रों में दलित सियासत का स्वरूप भी बदलता जाता है. इसके पीछे बड़ी वजह है दलित आबादी जो कहीं ज्यादा है तो कहीं कम. पूरे राज्य में दलितों की जनसंख्या लगभग 20.7 प्रतिशत है. सबसे ज्यादा दलित जिस इलाके में हैं, वो है अवध का इलाका यानी प्रदेश का केंद्रीय हिस्सा, जहां दलितों की आबादी 25 फीसदी से ऊपर है. यहां लखनऊ, अयोध्या और प्रयागराज जैसे बड़े जिले हैं तो दलित आबादी के हिसाब से सीतापुर, लखीमपुर खीरी, हरदोई, रायबरेली, उन्नाव और कौशांबी जैसे जिले भी हैं.

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश जहां 22 फीसदी से अधिक दलित वोटर हैं, बुंदेलखंड में भी दलित आबादी 22 से 23 फीसदी के बीच मानी जाती है. पूर्वी उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति के अंदर लगभग 20 प्रतिशत लोग आते हैं तो रूहेलखंड में दलित आबादी लगभग 18 फीसदी के आसपास है. पश्चिमी यूपी में जिन जिलों में दलितों की संख्या सबसे अधिक है उनमें आगरा, इटावा, कन्नौज और हाथरस मुख्य हैं. साथ ही सहारनपुर, मेरठ, मुजफ्फरनगर जैसे जिलों के कई इलाकों में भी वो सियासी तौर पर काफी मजबूत हैं. बुंदेलखंड के झांसी, जालौन, ओरैया और चित्रकूट जिलों में दलित आबादी 25 फीसदी से ऊपर है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिन जिलों में दलित आबादी सबसे ज्यादा है उनमें आजमगढ़, जौनपुर, मिर्जापुर, चंदौली और भदोही जैसे जिले हैं. तो रूहेलखंड के बिजनौर और शाहजहांपुर में दलित आबादी 20 प्रतिशत से ऊपर है.

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दलितों में सबसे दमदार है जाटव वोट बैंक

उत्तर प्रदेश में दलित समाज की सबसे बड़ी उपजाति जाटव है, जिसकी हिस्सेदारी लगभग 55% है. इसके बाद पासी  16%, धोबी 6%, कोरी 6%, बाल्मीकि 3% से थोड़ा अधिक, खटीक लगभग ढाई प्रतिशत, धानुक करीब डेढ़ प्रतिशत और कोल लगभग एक प्रतिशत आते हैं. शेष छोटी दलित उपजातियां मिलकर बाकी हिस्सा बनाती हैं.

क्षेत्रीय रूप से जाटवों की पकड़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश और रोहिलखंड में सबसे मजबूत है. पासी समुदाय अवध और मध्य यूपी में ज्यादा प्रभावी है, जबकि कोरी, खटीक, धानुक और कोल की उपस्थिति पूर्वी यूपी और बुंदेलखंड के कई जिलों में अधिक दिखती है. धोबी और वाल्मीकि समुदायों की आबादी, खासकर शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में, अपेक्षाकृत अधिक है. राजनीतिक दृष्टि से यूपी का दलित वोट एकसमान नहीं है. 

जाटवों का बड़ा हिस्सा पारंपरिक रूप से बीएसपी के साथ रहा है, लेकिन गैर-जाटव दलित समुदायों में समय के साथ बीजेपी और अब कुछ हद तक एसपी की भी पैठ बनी है. यही कारण है कि उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में दलित उपजातियों का क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन बहुत अहम हो जाता है.

तो क्या अगले चुनावों में दलित वोटर कुछ नया करेंगे?

आंकड़ों से एक बात तो तय है कि दलित वोटरों ने हर सियासी पार्टी को उत्तर प्रदेश में आजमाया है. बेशक उन्होंने वोट बैंक के तौर पर अपनी ताकत दिखाई लेकिन इस समुदाय की स्थितियां वैसे नहीं बदली जिसकी उन्हें उम्मीद थी. मायावती का वोट बैंक बिखर कर बीजेपी, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस या फिर चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी की ओर गया तो जरूर, लेकिन आज भी दलित समुदाय में ज्यादातर बहन जी को अपना सबसे बड़ा नेता मानते हैं. 

दलित युवाओं में चंद्रशेखर आजाद को लेकर उम्मीद जरूर है, वो कई जगहों पर उनके साथ खड़े भी नजर आते हैं, लेकिन कुछ उदाहरणों को छोड़ दें तो उसे वोट के तौर पर मोड़ना उनके लिए भी मुश्किल दिखाई देता है. इसलिए, उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति एक चौराहे पर खड़ी है, जहां हर पार्टी उन्हें किसी न किसी बहाने अपनी ओर करना तो चाहती है. 

लेकिन, दलित वोटर यही पूछता है कि पार्टियों को वोट तो मिल जाएगा लेकिन बदले में जिस सम्मान की लड़ाई ये समुदाय सदियों से लड़ रहा है क्या वो कोई भी उन्हें दिलवाने में सक्षम है?

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