जौनपुर के एक छोटे से गांव में झोपड़ी में पले-बढ़े रोहित यादव ने 14 साल की उम्र में बांस के डंडे से भाला फेंकना सीखा. सुविधाओं के अभाव और आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. आज वही रोहित यादव भारत के नंबर-1 और दुनिया के नंबर-2 भाला फेंक एथलीट बन चुके हैं. रोहित की कहानी साबित करती है कि अगर हौसला बुलंद हो तो कोई भी सपना नामुमकिन नहीं.
रोहित यादव जौनपुर के अदारी डभिया गांव के रहने वाले हैं. रोहित 87.05 मीटर की दूरी तक भाला फेंक कर दुनिया के इस सत्र के दूसरे सर्वश्रेष्ठ थ्रोअर बन गए हैं. भुवनेश्वर के कलिंगा स्टेडियम में हुई 65वीं नेशनल इंटर-स्टेट सीनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप के आखिरी दिन रोहित ने गोल्ड मेडल के साथ यह उपलब्धि हासिल की. इसी सेशन में टॉप पर चल रहे श्रीलंका के रुमेश थरंगा पथिराज (92.62 मीटर) के बाद लिस्ट में दूसरे स्थान पर पहुंच गए. इसी के साथ उन्होंने जापान में होने वाले एशियन गेम्स के लिए भी क्वालीफाई कर लिया.

NDTV ने रोहित के पिता सभाजीत यादव से बातचीत की. बेटे की उपलब्धि पर गर्व जताते हुए वे भावुक हो गए. उन्होंने बताया कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी. वे अपने परिवार के साथ झोपड़ी में रहते थे. इस दौरान उन्होंने अपने बेटों को सिखाया कि अगर कुछ करना है, तो मेहनत जरूरी है. वह तीनों बेटे राहुल, रोहित और रोहन को बचपन से ही भाला फेंकने की प्रैक्टिस करवाते थे.
उन्होंने बताया कि भाला खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, तो बच्चों को बांस के डंडे से प्रैक्टिस करवाते थे. रोहित ने 14 साल की उम्र से मेहनत करना शुरू कर दिया था. वह रोज भाला फेंकने की प्रैक्टिस करता था और यही वजह है कि आज उसने यह उपलब्धि हासिल की है.
भुवनेश्वर में रोहित यादव की सीरीज इस तरह रही
77.71 मीटर, 77.63 मीटर, नो मार्क, 77.51 मीटर, 79.40 मीटर और 87.05 मीटर. रोहित ने कहा था,"मैं आखिरी प्रयास में 87.05 मीटर का थ्रो हासिल कर पाया क्योंकि मुझे अच्छी रिदम या लय मिल गई."
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