Opinion: बांग्लादेश भी हो सकता है मक्का संधि का हिस्सा? तुर्की कैसे भारत के खिलाफ बिछा रहा बिसात
तुर्की मीडिया में हाल ही में छपे एक आर्टिकल से पता चलता है कि कैसे अंकारा भारत और उसके पड़ोस के लिए एक स्ट्रेटेजिक खतरा बनता जा रहा है.
मक्का संधि पर सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के दस्तखत होते ही, तुर्की के अखबार 'येनी शफाक' में एक लेख छपा. इसमें बांग्लादेश के इस गुट में शामिल होने की संभावना पर बात की गई थी. इस लेख में किसी लेखक का नाम नहीं था. अखबार ने यह बात अच्छी तरह मानी कि भारत को इस कदम से तकलीफ होगी, लेकिन फिर भी उसका दावा था कि इससे बांग्लादेश 'भारत के साथ चले आ रहे एकतरफा रिश्तों से आगे निकल सकेगा' और अपनी 'आजाद और सुलझी हुई विदेश नीति' का सबूत देगा.
अखबार के मुताबिक, "पाकिस्तान और तुर्की इसे इस्लामी रक्षा सहयोग के कुदरती विस्तार के तौर पर देखेंगे, जबकि भारत को अपने इस पूर्वी पड़ोसी के प्रति पुराने रवैये को बदलना पड़ेगा."
बांग्लादेश का पहलू
वैसे तो किसी मीडिया की खबर को बहुत ज्यादा संजीदगी से नहीं लेना चाहिए, लेकिन 'येनी शफाक' कोई आम अखबार नहीं है. यह एक कट्टरपंथी अखबार है जो तुर्की की मौजूदा हुकूमत का बेहद करीबी माना जाता है.
पिछले कुछ वक्त में इसकी सबसे बड़ी पहचान भारत पर हद से ज्यादा ध्यान देना रही है. भारत की छोटी-छोटी बातों को उछालकर तुर्की को भारत का मजाक उड़ाने का मौका देना इसकी आदत बन चुकी है. इस काम में यह अखबार भारत के नेताओं पर निशाना साधने से भी नहीं चूकता.
मुमकिन है कि तुर्की सच में बांग्लादेश को इस संधि में लाने की कोशिश करे, क्योंकि तुर्की के नेताओं ने खुद कहा है कि यह समझौता दूसरे देशों के लिए भी खुला है. तुर्की, बांग्लादेश के साथ भी पाकिस्तान की तर्ज पर रक्षा संबंध मजबूत करने में जुटा है.
और यही बात भारत के लिए फिक्र की वजह है. मक्का रक्षा समझौता तुर्की को एक बड़ा सहारा देगा, जो भारत के लिए सुरक्षा के मामले में एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है.
सऊदी अरब को लेकर भारत को चिंता करने की जरूरत नहीं
इस समझौते से भारत को बहुत ज्यादा घबराने की दरकार नहीं है. इस गुट का सबसे अहम हिस्सा सऊदी अरब है, जिसके भारत के साथ रिश्ते पिछले कुछ सालों में काफी मजबूत हुए हैं. सऊदी अरब इन रिश्तों को बिल्कुल खराब नहीं करना चाहेगा.
दोनों देशों के ताल्लुकात अपनी जगह बेहद मजबूत हैं. सऊदी अरब अब तेल पर अपनी निर्भरता खत्म करने की तैयारी में है और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए भारत का साथ बहुत जरूरी है.
सऊदियों ने भारत में 100 अरब डॉलर के निवेश का वादा भी किया है. कम से कम 40 भारतीय कंपनियों ने सऊदी अरब में अपने दफ्तर खोले हैं. इसके अलावा, भारत सऊदी तेल का एक बड़ा खरीदार है, जो मौजूदा दौर में ईरान के साथ जारी तनाव और हूती बागियों की ओर से समुद्री रास्तों की नाकेबंदी के बीच सऊदी के लिए बेहद अहम है. यहां तक कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग भी है और दोनों सेनाएं मिलकर अभ्यास करती हैं. सऊदी अरब पाकिस्तान के लिए भारत के साथ अपने इतने अहम रिश्तों को दांव पर नहीं लगाएगा.
उन्होंने साफ कहा था, "यह किसी खास देश या घटना का जवाब नहीं है. भारत के साथ हमारे रिश्ते पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हैं. हम इन्हें और आगे बढ़ाएंगे और इलाके में अमन कायम करने में मदद करेंगे."
समझौते के बाद जब पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सरहद पर झड़प हुई, तो सऊदियों ने कोई सैन्य दखल नहीं दिया. ना ही सऊदी अरब पर हुए हमलों के दौरान पाकिस्तान की सेना उनकी मदद के लिए आई. यहां तक कि हूती बागियों के हमलों का जवाब देने के लिए भी तुर्की या पाकिस्तान की तरफ से कोई संयुक्त सैन्य कार्रवाई नहीं दिखी.
असल में, इस बात पर कोई सफाई नहीं है कि 'हमला' किसे माना जाएगा और कब दूसरे देश मदद के लिए आएंगे. इसलिए यह समझौता मजबूत इरादों से ज्यादा एक तरह का दिखावा लगता है. हां, हथियार बनाने और रिसर्च के लिए एक-दूसरे को पैसा देने का काम जरूर होगा और तुर्की इसमें सबसे आगे रहेगा.
सबसे बड़ा फायदा तुर्की को होगा
तुर्की का रक्षा उद्योग बहुत मजबूत है और उसे दशकों तक यूरोप का समर्थन मिला है. तुर्की की नीति खुद को हथियारों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने और दुनिया में बड़ा हथियार निर्यातक बनने की है. लेकिन इस वक्त तुर्की की अर्थव्यवस्था खराब दौर से गुजर रही है कि महंगाई चरम पर है और उसकी मुद्रा (लीरा) गिर रही है. ऐसे में मक्का समझौता तुर्की के लिए एक नई जान की तरह है.
दूसरा फायदा यह है कि तुर्की को अपने रक्षा उद्योग के लिए सऊदी अरब के पैसों का सहारा मिलेगा. इससे उसे अमेरिका और पश्चिमी देशों की मदद पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा. इस मामले में तुर्की का 'कान' (KAAN) फाइटर जेट बेहद अहम है. तुर्की और सऊदी दोनों अमेरिका से एफ-35 लड़ाकू विमान खरीदना चाहते थे, लेकिन इजरायल के दबाव के कारण अमेरिका यह डील नहीं कर रहा. ऐसे में 'कान' जेट, एफ-35 का एक बेहतरीन विकल्प बन सकता है.
सऊदी अरब इसे आसानी से खरीद सकता है और इसके बनने की प्रक्रिया में अपना असर भी रख सकता है. इसके अलावा, तुर्की बेहतरीन ड्रोन और जंगी जहाज़ भी बना रहा है. इस साल उसने अपनी पहली अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल 'यिल्दिरिमहान' का प्रोटोटाइप भी दुनिया के सामने रखा है, जिसकी मारक क्षमता 6,000 किलोमीटर है.
तुर्की का रक्षा कारोबार तेजी से बढ़ रहा है और कई देश उससे हथियार खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं. मक्का समझौते से गुट के बाकी देशों के लिए तुर्की से हथियार खरीदना और आसान हो जाएगा.
तुर्की की सोच और उसकी पहचान का असर
तीसरी बात है वैचारिक चुनौती. तुर्की की मौजूदा हुकूमत की सोच राजनीतिक इस्लाम से जुड़ी है, जिसकी वजह से वह दुनिया भर के इस्लामी संगठनों का कट्टर हिमायती है. चाहे वह सोमालिया हो, गाजा हो या फिर पाकिस्तान और बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी. हालांकि, अपने पुराने ऑटोमन इतिहास और यूरोप के करीब होने की वजह से तुर्की की इस छवि में एक तरह का सलीका और निखार दिखता है.
इसी वजह से वह अपनी इस सोच को उन जगहों पर भी पेश कर पाता है जहां कट्टरपंथ को पसंद नहीं किया जाता. अजरबैजान, मध्य एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका और यहां तक कि भारत के कुछ हिस्सों में भी इसका असर देखा जा सकता है. मुस्लिम पहचान को बढ़ावा देने के पीछे तुर्की का मकसद अपने बाजार और हथियारों की बिक्री को बढ़ाना भी है. यह कोई इत्तेफाक नहीं है कि तुर्की ही बार-बार कह रहा है कि मक्का समझौते में और देश भी जुड़ सकते हैं.
आखिर में ट्रेड कॉरिडोर्स के मामले में तुर्की को सबसे बड़ा फायदा हो रहा है. काफी समय से तुर्की खुद को एक बड़ा एनर्जी और ट्रांसपोर्ट हब बनाने की कोशिश में है. पुरानी हिजाज रेलवे लाइन, जो ऑटोमन दौर में तुर्की को मक्का से जोड़ती थी, उसे फिर से शुरू किया जा रहा है. सऊदी अरब ने फिलहाल इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करने से इनकार कर दिया है और अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी तुर्की से हाथ मिला लिया है.
भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC), जो पहले इजरायल से होकर गुजरने वाला था, अपने पुराने रूप में फिलहाल ठप हो चुका है. अब इसे जॉर्डन, सीरिया और तुर्की के रास्ते मोड़ने की बात हो रही है.
गौर करने वाली बात यह है कि 2023 में दिल्ली के जी-20 सम्मेलन में जब इस कॉरिडोर का ऐलान हुआ था, तब तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने इसकी सख्त आलोचना की थी और मांग की थी कि तुर्की को भी इसका हिस्सा बनाया जाए. अब उनकी यह ख्वाहिश पूरी होती दिख रही है. इसके लिए भारी निवेश की जरूरत होगी, जो सऊदी के पैसों से मुमकिन हो पाएगा और यही एक बड़ी वजह है कि सऊदियों ने तुर्की को इस समझौते में शामिल किया.
ये तमाम बातें भारत के लिए चिंता का सबब हैं. फिलहाल, मक्का समझौता सऊदी अरब को सुरक्षा का भरोसा देने के साथ-साथ सबसे ज्यादा फायदा तुर्की को पहुंचा रहा है. भारत को चौकन्ना और तैयार रहने की जरूरत है. हाल के दिनों में भारत सरकार ने तुर्की के साथ 'ऑपरेशन सिंदूर' में उसकी भूमिका के बावजूद रिश्ते सुधारने की कोशिश की है. लेकिन फिलहाल कोई भी नया कदम उठाने से पहले सब्र रखना ही बेहतर होगा.
तुर्की की रणनीति को समझने के लिए 'येनी शफाक' का यह लेख एक अच्छा जरिया है. क्योंकि खुद तुर्की के विश्लेषकों का भी मानना है कि तुर्की कश्मीर के मुद्दे से अपना ध्यान आसानी से नहीं हटाएगा.
(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
डिस्क्लेमर: यह लेखक के अपने निजी विचार हैं.
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