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This Article is From Mar 29, 2026

क्‍या सास-ससुर के भरण-पोषण के लिए बाध्‍य है बहू? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ की स्थिति

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि नैतिक दायित्व की अवधारणा चाहे कितनी भी जोरदार क्यों न लगे, लेकिन किसी वैधानिक आदेश के अभाव में कानूनी दायित्व के रूप में लागू नहीं की जा सकती है.

क्‍या सास-ससुर के भरण-पोषण के लिए बाध्‍य है बहू? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ की स्थिति
  • इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि बहू अपने सास-ससुर का भरण-पोषण करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है.
  • कोर्ट ने कहा कि विधायिका ने अपनी समझदारी से इस प्रावधान के दायरे में सास-ससुर को शामिल नहीं किया है.
  • कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए याचिकाकर्ता सास–ससुर की याचिका को खारिज कर दिया.

इलाहाबाद हाई कोर्ट का बहू द्वारा सास–ससुर को भरण–पोषण देने को लेकर एक महत्‍वपूर्ण फैसला सामने आया है. कोर्ट ने सास–ससुर द्वारा अपनी बहू से भरण–पोषण की मांग वाली क्रिमिनल रिवीजन याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि बीएनएसएस की धारा 144 या सीआरपीसी की धारा 125 के कानूनी प्रावधानों के तहत एक बहू अपने सास-ससुर का भरण-पोषण करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है. कोर्ट ने साफ करते हुए कहा कि यह बात पूरी तरह से तय है कि बीएनएसएस की धारा 144 या दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के संबंधित प्रावधानों के तहत भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है और यह अधिकार केवल उन्हीं व्यक्तियों की श्रेणियों तक सीमित है जिनका उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है. 

कोर्ट ने कहा कि विधायिका ने अपनी समझदारी से इस प्रावधान के दायरे में सास-ससुर को शामिल नहीं किया है. दूसरे शब्दों में विधायिका की मंशा यह नहीं है कि इस प्रावधान के तहत किसी बहू पर उसके सास-ससुर के प्रति भरण-पोषण की जिम्‍मेदारी डाली जाए. कोर्ट ने कहा कि नैतिक दायित्व की अवधारणा चाहे वह कितनी भी जोरदार क्यों न लगे, लेकिन किसी वैधानिक आदेश के अभाव में कानूनी दायित्व के रूप में लागू नहीं की जा सकती है. इस प्रावधान के तहत भरण-पोषण का दावा केवल उन्हीं व्यक्तियों द्वारा किया जा सकता है, जो उसमें विशेष रूप से सूचीबद्ध श्रेणियों के अंतर्गत आते हैं. 

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प्रावधान के दायरे में नहीं आते सास-ससुर: हाई कोर्ट 

कोर्ट ने माना कि सास-ससुर इस प्रावधान के दायरे में नहीं आते हैं. कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए याचिकाकर्ता सास–ससुर की क्रिमिनल रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया. यह आदेश जस्टिस मदन पाल सिंह की सिंगल बेंच ने याचिकाकर्ता राकेश कुमार और नीरज देवी की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है. 

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ताओं सास–ससुर ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन याचिका दायर करते हुए आगरा के फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी. फैमिली कोर्ट ने 21 अगस्त 2025 को अपने आदेश में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 144 के तहत सास–ससुर द्वारा दाखिल आवेदन को खारिज कर दिया था. 

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याचिका में बहू के नैतिक दायित्‍व पर दिया गया जोर 

फैमिली कोर्ट ने आवेदन खारिज होने के बाद याचिकाकर्ताओं ने इसे इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी. हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता सास–ससुर के वकील ने दलील दी कि फैमिली कोर्ट द्वारा पारित आदेश गैर-कानूनी और मनमाना है और इसे जारी करते समय न्यायिक विवेक का इस्तेमाल नहीं किया गया है.  

याचिकाकर्ताओं के वकील ने इस बात पर जोर दिया कि याचिका दाखिल करने वाले बुजुर्ग, अनपढ़ और गरीब माता-पिता हैं, जो अपने इकलौते बेटे स्वर्गीय प्रवेश कुमार के जीवित रहते हुए उन पर पूरी तरह से निर्भर थे. कोर्ट में कहा गया कि मृतक की शादी उनकी बहू के साथ 26 अप्रैल 2016 को हुई थी और उनके बेटे की मृत्यु 31 मार्च 2021 को हो गई थी. याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उनकी बहू उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत है. उसकी अपनी पर्याप्त आय है और उसे मृतक के सभी सेवा और सेवानिवृत्ति लाभ भी प्राप्त हो चुके हैं. बहू के इस नैतिक दायित्व पर जोर दिया गया कि वह अपने बुज़ुर्ग सास-ससुर का भरण-पोषण करे.  

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इस नैतिक दायित्व को कानूनी दायित्व के रूप में माना जाना चाहिए. वहीं बहू के वकील ने याचिका का विरोध किया और कहा कि फैमिली कोर्ट का पास किया गया ऑर्डर पूरी तरह कानून के मुताबिक है और इसमें हाई कोर्ट के दखल की कोई जरूरत नहीं है. कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद माना कि मौजूदा मामले में रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह पता चले कि याचिकाकर्ता की बहू को मिली नौकरी अनुकंपा के आधार पर थी. 

आगरा फैमिली कोर्ट के आदेश को रखा बरकरार 

कोर्ट ने कहा कि मृतक की संपत्ति के उत्तराधिकार के संबंध में दी गई दलील पर भी धारा 125 सीआरपीसी संबंधित प्रावधानों के तहत कार्यवाही में विचार नहीं किया जा सकता क्योंकि ऐसे मुद्दे संक्षिप्त भरण-पोषण कार्यवाही के दायरे से बाहर हैं. कोर्ट ने साफ कर दिया कि इस प्रावधान के अंतर्गत भरण-पोषण का दावा केवल उन्हीं व्यक्तियों द्वारा किया जा सकता है, जो उसमें विशेष रूप से सूचीबद्ध श्रेणियों के अंतर्गत आते हैं. कोर्ट ने कानूनी स्थिति को देखते हुए आगरा फैमिली कोर्ट द्वारा पारित आदेश को बरकरार रखा और याचिकार्ताओं की क्रिमिनल रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया. 
 

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