- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाराजगंज के चंद्रेश को उम्रकैद की सजा रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को खारिज किया
- पीड़िता की उम्र विवादित रही, मेडिकल परीक्षण में उसकी उम्र लगभग 20 साल बताई गई, नाबालिग होने का सबूत नहीं मिला
- कोर्ट ने कहा कि यदि पीड़िता बालिग थी तो पॉक्सो और आईपीसी की धारा 376 के तहत आरोपी को दोषी ठहराना गलत होगा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाराजगंज से जुड़ी एक अपील पर सुनवाई करते हुए अपने फैसले में गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा है कि पश्चिमी विचारों और लिव-इन के कॉन्सेप्ट के प्रभाव में शादी किए बिना साथ रहने वाले युवाओं की बढ़ती प्रवृत्ति का चलन तेजी से बढ़ रहा है. ऐसे रिश्ते फेल होने के बाद एफआईआर दर्ज की जाती है और कानून महिलाओं के पक्ष में होने के कारण पुरुषों को उन कानूनों के आधार पर दोषी ठहराया जाता है जो तब बनाए गए थे जब लिव-इन का कॉन्सेप्ट कहीं भी अस्तित्व में नहीं था. हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता को ट्रायल कोर्ट से मिली उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया. यह आदेश जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस प्रशांत मिश्रा की बेंच ने दिया है.
मामले के अनुसार अपीलकर्ता चंद्रेश ने हाईकोर्ट में महाराजगंज की कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे कई मामलों में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी.
ये पूरा मामला 2021 का है. मार्च 2024 में महाराजगंज की पॉक्सो कोर्ट ने इस पर फैसला सुनाया था. कोर्ट ने चंद्रेश को इंडियन पीनल कोड (आईपीसी), पॉक्सो और एससी-एसटी एक्ट के तहत दोषी ठहराते हुए उसे अलग-अलग मामलों में 7 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा सुनाई थी. अप्रैल 2024 में चंद्रेश ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी थी.
क्या था पूरा मामला?
आरोप था कि चंद्रेश शादी का झांसा देकर एक नाबालिग लड़की को बहला-फुसलाकर बेंगलुरु ले गया और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए. नाबालिग लड़की 6 अगस्त 2021 को अपने घर लौट आई. उसने बताया कि चंद्रेश ने उसे शादी करने के इरादे से बहलाया था लेकिन उससे शादी नहीं की. लड़की के पिता का आरोप था कि उनकी बेटी नाबालिग है और आधार कार्ड के अनुसार उसकी जन्मतिथि 1 मार्च 2003 थी.
पुलिस ने केस दर्ज कर आरोपी चंद्रेश के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी. ट्रायल के दौरान 8 गवाहों के बयान दर्ज किए गए थे. चंद्रेश ने दावा किया कि उसके खिलाफ एफआईआर गलत तरीके से दर्ज की गई थी. चंद्रेश ने हाईकोर्ट में दलील दी कि दोनों पक्षों के बीच पुरानी दुश्मनी के कारण झूठे सबूतों के आधार पर चार्जशीट जमा की गई है. उसने मेडिकल सबूतों से इनकार किया और इस मामले में झूठे आरोप लगाने की बात कही. एक गवाह के बयान के अनुसार 17 अगस्त 2021 को पीड़िता प्रेग्नेंट पाई गई थी और उसे पेट दर्द और ब्लीडिंग की शिकायत थी. वहीं गवाही देने वाले डॉ. सुनील कुमार पासवान ने साबित किया कि ऑसिफिकेशन टेस्ट के समय पीड़िता की उम्र लगभग 20 साल थी.
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद कहा कि ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों और ट्रायल कोर्ट के फैसले को देखने के बाद हमारा मानना है कि ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता के खिलाफ फैसला और सज़ा का आदेश देते समय रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों पर ठीक से विचार नहीं किया है. जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) रूल्स, 2007 के नियम-12 के अनुसार पीड़िता ने पहले जिस स्कूल में पढ़ाई की थी वहां से सर्टिफिकेट ज़रूरी था. यहां तक कि जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) एक्ट, 2015 की धारा-94(2) के अनुसार भी स्कूल से सर्टिफिकेट या मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट ज़रूरी था. इस मामले में पीड़िता मैट्रिकुलेशन परीक्षा में शामिल नहीं हुआ थी.
अदालत ने कहा कि अगर पीड़िता बालिग थी तो POCSO एक्ट की धारा-6 के तहत अपीलकर्ता को दोषी ठहराना भी गलत है. आईपीसी की धारा-376 के तहत दोषी ठहराना भी सही नहीं है क्योंकि पीड़िता बालिग थी और छह साल से अपीलकर्ता के साथ सहमति से रिश्ते में थी. उसका खुद घर छोड़कर जाना और अपीलकर्ता के साथ छह महीने तक रहना उसके साथ फिजिकल संबंध बनाना. इस दौरान अपनी मां या परिवार में किसी को भी फोन न करना और अपीलकर्ता के उसे शिकारपुर क्रॉसिंग पर छोड़ने के बाद ही अपनी मां को फोन करना यह साबित करता है कि गवाह नंबर दो ने अपीलकर्ता के साथ फिजिकल संबंध बनाए और वह प्रेग्नेंट हो गई थी.
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(V) के तहत सज़ा कोई स्वतंत्र प्रावधान नहीं है और यह तभी लागू होती है जब आरोपी को IPC के प्रावधानों के तहत 10 साल या उससे ज़्यादा की कैद की सज़ा दी जाती है. इसलिए SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(V) के तहत अपीलकर्ता को दोषी ठहराना भी सही नहीं है और इसे रद्द किया जाता है. धारा 323 IPC के तहत दोषसिद्धि और सजा भी अनुचित है क्योंकि पीड़िता को धक्का देने का आरोप अपीलकर्ता पर नहीं बल्कि उसके परिवार के सदस्य पर लगाया गया था. कोर्ट ने उम्रकैद की सजा को भी रद्द करने का आदेश दिया.
लिव-इन रिलेशनशिप पर क्या कहा?
कोर्ट ने चिंता व्यक्त करते हुए गंभीर टिप्पणी की और कहा कि यह मामला पश्चिमी विचारों और लिव-इन रिलेशनशिप के कॉन्सेप्ट के प्रभाव में शादी किए बिना साथ रहने वाले युवाओं की बढ़ती प्रवृत्ति का एक उदाहरण है. ऐसे रिश्ते फेल होने के बाद FIR दर्ज की जाती है और कानून महिलाओं के पक्ष में होने के कारण पुरुषों को उन कानूनों के आधार पर दोषी ठहराया जाता है जो तब बनाए गए थे जब लिव-इन रिलेशनशिप का कॉन्सेप्ट कहीं भी मौजूद नहीं था. इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला कायम नहीं रखा जा सकता और इसे रद्द किया जाता है. कोर्ट ने जेल में बंद चंद्रेश को रिहा करने का निर्देश दिया अगर वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है.
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