इलाहाबाद हाईकोर्ट में वाराणसी का एक समलैंगिक जोड़ा (Lesbian Couple) सुरक्षा की मांग को लेकर पहुंचा, उन्होंने कहा कि उनके लिव इन संबंध में किसी प्रकार की बाधा न डाली जाए, उन्हें अलग करने या तंग करने का प्रयास न किया जाए. इस याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत दो बालिग व्यक्तियों को अपनी पसंद का साथी चुनने, अपनी स्वायत्तता बनाए रखने तथा सहमति से सहजीवन (लिव-इन रिलेशनशिप) व्यतीत करने का पूरा और मौलिक अधिकार प्राप्त है. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सामाजिक स्वीकार्यता की कमी, पारंपरिक धारणाओं या परिवार के विरोध के आधार पर दो बालिग नागरिकों की स्वतंत्रता और शारीरिक सुरक्षा पर कोई आंच नहीं आने दी जा सकती. जस्टिस डॉ. गौतम चौधरी की सिंगल बेंच ने एक अंतरधार्मिक समलैंगिक महिला जोड़े की याचिका को स्वीकार करते हुए संबंधित पुलिस अधिकारियों को उन्हें तत्काल और प्रभावी सुरक्षा प्रदान करने के कड़े निर्देश जारी किए है. कोर्ट ने अपने आदेश में यह साफ कर दिया कि इस जोड़े के परिवार, रिश्तेदारों या समाज के किसी भी अन्य व्यक्ति को उनके लिव-इन संबंध में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने, बाधा डालने या उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती.
दो बालिग युवतियों ने लगाई थी इलाहाबाद हाईकोर्ट से गुहार
यह पूरा मामला दो बालिग युवतियों से जुड़ा हुआ है. याचिकाकर्ताओं ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष अपनी सुरक्षा को लेकर गुहार लगाई थी. याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने कोर्ट को बताया कि दोनों युवतियां बालिग है, अविवाहित है और अपनी स्वतंत्र इच्छा से एक-दूसरे के साथ लिव-इन संबंध में रह रही हैं. दोनों पढ़ी-लिखी हैं और अपनी स्वतंत्र इच्छा से एक-दूसरे के साथ समलैंगिक लिव-इन संबंध में रह रही हैं, चूंकि वे दोनों अलग-अलग धर्मों, यानी एक हिंदू और दूसरी मुस्लिम धर्म से संबंध रखती है और साथ ही समान लिंग की हैं इसलिए उनके परिजनों और रिश्तेदारों की ओर से उनकी जान-माल को गंभीर खतरा बना हुआ है. याचियों ने कोर्ट को अवगत कराया कि उनका यह फैसला किसी भी प्रकार के भय, दबाव या अनुचित प्रभाव से मुक्त है हालांकि उनके इस अंतरधार्मिक और समलैंगिक रिश्ते से उनके परिजन और रिश्तेदार नाराज थे.
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, प्रतिवादी संख्या पांच और प्रतिवादी संख्या छह द्वारा उनके शांतिपूर्ण सहजीवन में लगातार बाधाएं उत्पन्न की जा रही हैं. परिजनों और रिश्तेदारों की ओर से उनकी जान-माल को गंभीर खतरा बना हुआ है. याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने तर्क दिया कि अपनी पसंद से जीवन साथी चुनने और साथ रहने की आजादी भारतीय संविधान द्वारा हर नागरिक को दी गई है, लेकिन परिवार की नाराजगी और सामाजिक रूढ़िवादिता के कारण उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा पर संकट आ गया है, जिसके चलते पुलिस सुरक्षा की अत्यंत आवश्यकता है. अपनी जान-माल और व्यक्तिगत स्वायत्तता पर मंडराते खतरे को देखते हुए दोनों युवतियों ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया है. मामले की सुनवाई के दौरान पूर्व में पारित आदेश के अनुपालन में दोनों युवतियां व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित हुईं. कोर्ट ने दोनों से व्यक्तिगत तौर से पूछा. उनके बयानों को न्यायिक पत्रावली पर दर्ज किया. दोनों युवतियों ने बेहद सुदृढ़, स्पष्ट और निर्भीक शब्दों में बयान दिया कि वो बालिग हैं और अपने भले-बुरे को समझने में पूरी तरह सक्षम हैं. उन्होंने एक लिखित पत्र के माध्यम से भी यह स्पष्ट किया कि वे अपनी समलैंगिक अभिरुचि के अनुसार एक साथ रह रही है और भविष्य में भी सहजीवन में ही रहना चाहती हैं. याचियों की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता तथा अनुच्छेद 21 जीवन एवं वैयक्तिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक नवतेज सिंह जौहर मामले का संदर्भ देते हुए कहा कि यौन रुझान (समान लैंगिक पसंद) व्यक्ति की निजता और गरिमा का आंतरिक हिस्सा है तथा लोक नैतिकता की तुलना में संवैधानिक नैतिकता की रक्षा करना न्यायपालिका का सर्वोपरि दायित्व है.
'समलैंगिक संबंध प्राकृतिक और पारंपरिक सामाजिक ढांचे को प्रभावित करते'
दूसरी ओर राज्य सरकार की तरफ से पेश स्थायी अधिवक्ता ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क प्रस्तुत किया कि समलैंगिक संबंधों को भारतीय समाज में सामाजिक स्वीकार्यता प्राप्त नहीं है. उन्होंने तर्क दिया कि समाज का एक पारंपरिक वर्ग विवाह और परिवार की व्यवस्था को केवल पुरुष और महिला के बीच का संबंध मानता है, जिससे वंश आगे बढ़ता है. ऐसे में समलैंगिक संबंध प्राकृतिक और पारंपरिक सामाजिक ढांचे को प्रभावित करते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि हालांकि अपनी पसंद का साथी चुनना अनुच्छेद 21 का हिस्सा है लेकिन इस प्रकार के संबंधों को कानूनी मान्यता प्रदान करना कोई मौलिक अधिकार नहीं है.
दोनों युवतियां बालिग, अपना भलाबुरा समझने में सक्षम- कोर्ट
कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने और कानूनी नजीरों का विश्लेषण करने के बाद राज्य के तर्कों को खारिज कर दिया. कोर्ट ने पाया कि दोनों ही युवतियां बालिग, शिक्षित और अपने भले-बुरे को समझने में पूरी तरह सक्षम हैं. कोर्ट ने यह भी माना कि उनके द्वारा एक साथ रहने का निर्णय बिना किसी भय, दबाव या अनुचित प्रभाव के स्वतंत्र सहमति से लिया गया है. कोर्ट ने माना कि यद्यपि समलैंगिक विवाह को वैधानिक मान्यता देना या विवाह जैसी संस्था का कानूनी ढांचा तैयार करना विधायिका के क्षेत्राधिकार में आता है किंतु इसके बावजूद ऐसे जोड़ो को अनुच्छेद 21 के तहत भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक संबंध स्थापित करने तथा साथ रहने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है. वैवाहिक दर्जे का अभाव किसी भी तीसरे पक्ष, परिवार के सदस्यों या प्रशासनिक तंत्र को दो बालिग नागरिकों की गरिमा, स्वायत्तता और शारीरिक सुरक्षा पर हमला करने का अधिकार नहीं देता.
संवैधानिक व्यवस्था में जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सर्वोपरि- कोर्ट
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अत्यंत कड़े शब्दों में कहा कि संवैधानिक व्यवस्था में जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सर्वोपरि है. जब दो बालिग व्यक्ति अपनी स्वेच्छा से एक साथ रह रहे हो तो उनकी लैंगिक पहचान या समाज के विरोध के आधार पर उनके जीवन में कोई विघ्न नहीं डाला जा सकता. कोर्ट ने पाया कि दोनों याचियों ने सोच-समझकर साथ रहने का फैसला लिया है इसलिए उनके इस फैसले का विरोध करने का किसी को कोई कानूनी हक नहीं है. कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए आदेश दिया कि याचियों को शांतिपूर्ण ढंग से एक साथ रहने की पूरी स्वतंत्रता है और उनके परिजनों या किसी अन्य व्यक्ति को उनके लिव-इन रिलेशनशिप में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जाएगी. कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि याचियों के शांतिपूर्ण जीवन में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती है तो वो आदेश की प्रमाणित प्रति के साथ संबंधित पुलिस आयुक्त, एसएसपी या एसपी से संपर्क कर सकती हैं. पुलिस अधिकारियों का यह दायित्व होगा कि वो याचियों की बालिग होने की पुष्टि करने के बाद उन्हें तुरंत सुरक्षा मुहैया कराएं. साथ ही कोर्ट ने निजी प्रतिवादियों को यह छूट दी कि यदि याचियों द्वारा जमा किए गए दस्तावेज फर्जी पाए जाते हैं तो वो आदेश को वापस लेने के लिए रिकॉल आवेदन दायर कर सकते हैं. निर्णय के अंत में कोर्ट ने इस जटिल कानूनी विषय पर समर्पित शोध कार्य के लिए अपनी रिसर्च एसोसिएट सुश्री जाह्नवी सिंह के प्रति आभार भी व्यक्त किया.
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