- इलाहाबाद HC ने यूपी पंचायत चुनावों के संबंध में ओबीसी आरक्षण आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं
- कोर्ट ने आयोग के द्वारा आगरा जिले में किए गए डेटा संग्रहण की गुणवत्ता और व्यापकता को बेहद कमजोर बताया
- आयोग के 3 लाख से अधिक OBC आबादी वाले जिले में केवल 179 लोगों की उपस्थिति और 29 लोगों के बयान पर सवाल उठे
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर दाखिल याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई की. अदालत ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण को लेकर गठित समर्पित आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए है. जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की डिविजन बेंच ने याचिकाकर्ता दशरथ यादव की तरफ से दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान आयोग द्वारा जुटाए जा रहे एम्पिरीकल डेटा के तौर-तरीकों पर असंतोष जताया.
'पिछड़ेपन का आकलन जमीनी स्तर पर बेहद कमजोर'
कोर्ट ने माना कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुरूप विभिन्न जातियों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पिछड़ेपन का सही आकलन करने के लिए जिस स्तर और व्यापकता के साथ डेटा संग्रह होना चाहिए था, वह जमीनी स्तर पर बेहद कमजोर और नाकाफी नजर आ रहा है. कोर्ट ने आयोग को आगरा जिले में अबतक किए गए कार्य का डिटेल्ड विवरण सीलबंद लिफाफे में 14 अक्टूबर या उससे पहले कोर्ट में पेश करने का निर्देश दिया है. अब कोर्ट इस मामले में अगली सुनवाई 14 अक्टूबर को दोपहर 12 बजे करेगी.
दरअसल कोर्ट यूपी में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने के बाद समय से चुनाव न होने और प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने के मामले में जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है. इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट में कुल 11 याचिकाएं दाखिल की गई है, जिसमें छह जनहित याचिका भी शामिल हैं. सभी याचिकाओं पर कोर्ट एक साथ सुनवाई कर रही है.
ओबीसी कमीशन की रिपोर्ट पर असंतोष
कोर्ट ने याचिकाकर्ता दशरथ यादव की याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई करते हुए ओबीसी कमीशन की रिपोर्ट पर असंतोष जताया. याचिकाओं में समय से चुनाव कराने और प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने को चुनौती दी गई है. याचिकाओं में प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने के योगी सरकार के 25 मई के फैसले को भी चुनौती दी गई है. पंचायत चुनाव समय से न कराने जाने पर सवाल उठाए गए है. याचिका में यूपी सरकार, डायरेक्टर पंचायती राज, डीएम, चीफ डेवलपमेंट ऑफिसर, जिला पंचायती राज अधिकारी को पक्षकार सरकार बनाया गया है.
इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आशीष कुमार सिंह, रजनीश कुमार श्रीवास्तव और राज कुमार सिंह ने पक्ष रखा. जबकि राज्य सरकार की तरफ से अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल और आयोग की ओर से अधिवक्ता उदयन नंदन कोर्ट में पेश हुए. सुनवाई के दौरान आयोग के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि समर्पित आयोग ने अब तक चालीस जिलों को कवर करते हुए लगभग साठ फीसदी डेटा संग्रह का कार्य पूरा कर लिया है.
हलफनामे में दी गई ये दलील
उन्होंने यह भी दावा किया कि बाकी बचे जिलों का लगभग चालीस फीसदी काम भी निर्धारित समय सीमा के अंदर जल्द से जल्द संपन्न कर लिया जाएगा. कोर्ट के समक्ष दाखिल हलफनामे में यह दलील दी गई कि प्रमुख समाचार पत्रों में व्यापक प्रचार-प्रसार वाले सार्वजनिक नोटिस जारी किए गए थे और जब आयोग ने विभिन्न जिलों का दौरा किया तो वहां संपर्क करने वाले लोगों को प्रश्नावली वितरित की गई थी.
हालांकि जब कोर्ट ने आयोग द्वारा दाखिल हलफनामे और पेश किए गए और रिकॉर्ड की बारीकी से जांच की तो सामने आया कि आयोग की बैठकों में उपस्थित होने वाले लोगों की संख्या वास्तविक आबादी की तुलना में कम थी. कोर्ट ने इस खामी पर आगरा जिले का विशेष रूप से उदाहरण दिया. कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि रिकॉर्ड से यह साफ पता चलता है कि आगरा जिले में तीन लाख से अधिक की ओबीसी आबादी होने के बावजूद सार्वजनिक नोटिस के बाद आयोग के समक्ष केवल 179 लोग ही उपस्थित हुए.
आयोग पर महज 29 लोगों के बयान दर्ज करने का खुलासा
इससे भी अधिक चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि उपस्थित सभी लोगों को प्रश्नावली दिए जाने के बावजूद आयोग ने महज 29 लोगों के बयान दर्ज किए. यानी तीन लाख से ज्यादा आबादी वाले जिले में आयोग कुल उपस्थित 179 लोगों के भी पूरे बयान दर्ज नहीं कर सका. कोर्ट ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि आयोग को यह महत्वपूर्ण कवायद करते हुए लगभग पांच महीने बीत चुके है, लेकिन काम करने का तरीका यह सवाल खड़ा करता है कि आयोग अंततः विभिन्न जातियों के पिछड़ेपन का सही मूल्यांकन कैसे करेगा.
कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि आयोग के गठन के तत्काल बाद गठित की गई सलाहकार समिति ने आज तक आयोग के साथ एक भी औपचारिक बैठक नहीं की है. आयोग की ओर से कोर्ट को बताया गया कि सलाहकार समिति की पहली बैठक 12 अक्टूबर को प्रस्तावित है, जिसमें अब तक एकत्रित आंकड़ों पर विचार-विमर्श किया जाएगा. कोर्ट ने कहा कि आयोग की पूरी प्रक्रिया और कार्यप्रणाली को समझने के लिए वह प्रारंभिक तौर पर उदाहरण के तौर पर आगरा जिले के काम की गहराई से जांच करना चाहता है.
हाईकोर्ट ने समर्पित आयोग का निर्देश
कोर्ट ने समर्पित आयोग को निर्देश दिया कि वह आगरा जिले के संबंध में अब तक किए गए संपूर्ण कार्य का विस्तृत और बिंदुवार विवरण सीलबंद लिफाफे में कोर्ट के समक्ष पेश करे. इस विवरण में आयोग को स्पष्ट रूप से यह समझाना होगा कि उसने जमीनी स्तर पर किस प्रक्रिया के तहत काम किया है और ओबीसी वर्ग की विभिन्न जातियों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पिछड़ेपन का जातिवार Empirical डेटा कैसे संकलित किया है. वह अपनी अंतिम रिपोर्ट में इस सामग्री का मूल्यांकन कैसे प्रस्तुत करने का इरादा रखता है.
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि यह पूरी कवायद सुप्रीम कोर्ट द्वारा डॉ. के. कृष्णमूर्ति बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और बाद में सुरेश महाजन बनाम मध्य प्रदेश राज्य के फैसलों में दिए गए 'ट्रिपल टेस्ट' के कड़े आदेशों और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आगरा जिले का यह सीलबंद ब्योरा देखने के बाद ही कोर्ट यह समझ पाएगी कि आयोग को दी गई छह महीने की निर्धारित समय सीमा के अंदर वह पूरे प्रदेश के सभी जिलों में इस कार्य को पारदर्शी और प्रामाणिक तरीके से कैसे पूरा करेगा. हाईकोर्ट ने समर्पित आयोग को निर्देश दिया कि आगरा जिले से संबंधित यह संपूर्ण रिपोर्ट 14 अक्टूबर को या उससे पहले कोर्ट में पेश कर दी जाए. इसके साथ ही कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई 14 अक्टूबर को दोपहर बारह बजे तय की है.
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