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बालिग जोड़ों का पीछा करने के बजाय, अपराधों की जांच करें- इलाहाबाद हाईकोर्ट की यूपी पुलिस को नसीहत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए. जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने कहा- "आजकल पुलिस अपराधों की जांच करने के बजाय सहमति से शादी करने वाले बालिग जोड़ों के खिलाफ FIR दर्ज कर उनका पीछा करने में व्यस्त है."

बालिग जोड़ों का पीछा करने के बजाय, अपराधों की जांच करें- इलाहाबाद हाईकोर्ट की यूपी पुलिस को नसीहत
सहमित से शादी करने वाले बालिग जोड़ों की याचिका पर हाईकोर्ट ने की सुनवाई.

Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और तल्ख टिप्पणी भी की है. कोर्ट ने कहा कि आजकल पुलिस अपराधों की जांच करने के बजाय सहमति से शादी करने वाले बालिग जोड़ों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उनका पीछा करने में व्यस्त है. ये लोग जोड़ों का पीछा करते हुए असल में शादियों की ही जांच-पड़ताल कर रहे हैं. कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि पुलिस अपना कीमती समय ऐसे कार्य में बर्बाद कर रही है, जो उनका नहीं है. दरअसल, हाईकोर्ट ने सहमति से शादी करने वाले बालिग जोड़े की ओर से दाखिल क्रिमिनल रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की.

कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि पुलिस की इन लापरवाहियों के कारण कोर्ट के पास ऐसे मामलों की संख्या भी बढ़ जाती है, जो वास्तव में कोर्ट में लाने लायक नहीं होते. पुलिस द्वारा FIR दर्ज करने के चरण पर और उसके बाद ऐसे कदम उठाने के कारण जो उन्हें बिल्कुल भी नहीं उठाने चाहिए, ऐसे मामले कोर्ट तक पहुंच जाते है.

कोर्ट ने अपनाया सख्त लहजा

कोर्ट में सख्त लहजे में कहा कि देश के हर नागरिक को अब यह संदेश भी जाना चाहिए कि बालिग होने की उम्र का सम्मान किया जाना चाहिए और साथ ही संवैधानिक संस्कृति का भी. संविधान किसी भी बालिग को चाहे उसका रिश्ता कुछ भी हो, किसी दूसरे बालिग की इच्छा पर हावी होने या उस पर राज करने की इजाजत नहीं देता जो कानून के तहत बालिग है. कोर्ट ने कहा कि बेशक, एक बच्चे का मामला जो बालिग नहीं है, वो अलग है. पुलिस ऐसी FIR दर्ज करके बहुत बड़ा अहित कर रही है और उससे भी ज्यादा जिसमें जवान जोड़े का पीछा कर रही है.

इससे पहले कि कोर्ट मजबूर हो...

कभी-कभी गलत मकसद से उन्हें जबरदस्ती अलग कर दिया जाता है और दुल्हन को उसके माता-पिता या उसके परिवार के पास वापस भेज दिया जाता है. ये काम बिल्कुल गैर-कानूनी है और इनमें से कुछ तो जुर्म भी है. कोर्ट ने ऐसे मामलों में पुलिस महानिदेशक और एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (गृह) को सुधारात्मक कदम उठाने का निर्देश दिया है, इससे पहले कि कोर्ट दखल देने के लिए मजबूर हो. कोर्ट ने लड़की के पिता द्वारा अपहरण के मामले में दर्ज कराई गई एफआईआर को भी रद्द कर दिया है. यह आदेश जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की डबल बेंच ने एक युवा दंपति की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है.

पिता ने दर्ज कराई थी गुमशुदगी

दरअसल, याचिकाकर्ता लड़की के पिता द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी. याचिका दाखिल करते हुए याचिकाकर्ताओं ने सहारनपुर के सदर बाजार थाने में दर्ज एफआईआर को रद्द करने कि कोर्ट से मांग की थी. लड़की ने अपनी मर्जी से विवाह किया था, लेकिन पिता की गुमशुदगी की शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कf गुमशुदगी की शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज करना उचित नहीं था. खासकर तब जब संबंधित व्यक्ति बालिग हो और अपनी इच्छा से जीवन जी रहा हो.

देहरादून में की थी जोड़ने ने मर्जी से शादी

याचिकाकर्ता नंबर एक और दो ने दिसंबर 2025 को देहरादून के शिव मंदिर (उत्तराखंड) में हिंदू रीति-रिवाज से शादी की थी. शादी का एक सर्टिफिकेट और शादी की रस्मों की कुछ तस्वीरें भी कोर्ट में पेश की गईं. कोर्ट ने कहा कि पहली याचिकाकर्ता यानी लड़की के हाईस्कूल सर्टिफिकेट में बताई गई जन्मतिथि से ये साफ है कि वह बालिग है. उत्तराखंड सरकार द्वारा जारी किया गया शादी का एक सर्टिफिकेट भी है, जिसकी एक फोटोस्टेट कॉपी पेपर-बुक पर अटैच है.

बालिग को बताने का हक नहीं

युवा जोड़े यानी पहले और दूसरे याचिकाकर्ता पति-पत्नी की तरह शांति से साथ रह रहे हैं. इस याचिका को दोनों याचिकाकर्ताओं के जॉइंट एफिडेविट से सपोर्ट किया गया है. कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताते हुए माना कि पहले याचिकाकर्ता के पिता के कहने पर दर्ज की गई FIR दोनों याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में गंभीर दखल है. किसी को भी किसी बालिग को यह बताने का हक नहीं है कि वह कहां रहेगा या किसके साथ रहेगा, शादी करेगा या अपनी ज़िंदगी बिताएगा.

हाईकोर्ट ने दी सख्त चेतावनी

मामले में प्रस्तुत विवाह प्रमाणपत्र और तथ्यों पर विचार करने के बाद कोर्ट ने एफआईआर को रद्द कर दिया और इसे याचिकाकर्ताओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में गंभीर हस्तक्षेप बताया. अपने आदेश में कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस द्वारा ऐसे मामलों में दखल देना न केवल गैर-कानूनी है, बल्कि कुछ परिस्थितियों में यह आपराधिक कृत्य भी हो सकता है. खासकर जब जोड़ों को जबरन अलग करने या महिला को उसके परिवार को सौंपने की कोशिश की जाती है.

कोर्ट ने डीजीपी और एडिशनल चीफ सेक्रेटरी गृह को निर्देश दिया कि भविष्य में इस प्रकार की कार्रवाइयों को रोका जाए और स्पष्ट किया कि वयस्कता की स्वतंत्रता का सम्मान करना संवैधानिक व्यवस्था का मूल तत्व है. इसके साथ ही अदालत ने लड़की के पिता और अन्य संबंधित पक्षों को निर्देश दिया कि वो उनके घर में न घुसें और न ही किसी भी तरह से उनकी शांतिपूर्ण शादीशुदा ज़िंदगी में खलल डालें.

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