बिहार में नौकरी और रोजगार के लिए पलायन की बहुत बड़ी समस्या है. प्रदेश से करोड़ों लोग दशकों बाद भी रोजगार के लिए पलायन कर रहे हैं. ऐसा इसलिए कि बिहार में आज भी रोजगार के लिए युवाओं को भटकना पड़ता है. वहीं शिक्षा के स्तर में बिहार आज भी निचले पायदान पर है. ऐसे में एक तबका मजदूरी पर ही अपना जीवन यापन करता है. राज्य में कई सरकारें आई और चली गई सभी ने पलायन के मुद्दे पर लोगों से वोट मांगे लेकिन सच्चाई यह है कि आज भी पलायन जारी है. बिहार के शिवहर जिले का एक गांव ऐसा है जहां लोग रोजगार के लिए पलायन नहीं करते हैं. यहां लोग खेती के बदौलत अपने गांव की पहचान बनाई है, जहां कोई बेरोजगार नहीं है.
इस गांव में खेती के जरिए न केवल गांव को विकसित किया गया है बल्कि कोई पुरुष बेरोजगार नहीं है. यह सब महिलाओं की मेहनत की वजह से हुआ है. यह गांव महिला सशक्तिकरण का बेजोड़ उदाहरण है.
महिलाएं करती है सब्जियों की खेती
इस गांव का नाम है कोठिया गांव जो शिवहर जिले के शिवहर प्रखंड में स्थित है. बताया जाता है कि कोठिया गांव आज के दौर में उत्तर बिहार में विकास के रूप में अपनी पहचान बनाई है. यहां रहने वाली महिलाएं खेतों में सब्जी उगाने का काम करती हैं. बताया जाता है कि गांव में करीब 700 एकड़ जमीन पर सब्जी की खेती होती है. यहां इतनी सब्जी होती है जिससे यहां लोग आराम से अपना जीवन यापन करते हैं.
महिलाएं देती है पुरुषों को काम
दरअसल, महिलाएं सब्जी की खेती करती है और सुबह ही महिलाएं खेतों से सब्जियां तोड़ कर लाती है. इसके बाद पुरुषों को इन सब्जियों को बेचने के लिए शिवहर के अलग-अलग बाजारों में भेजती है. इतना ही नहीं सब्जियों को आस-पास के जिलों में भी भेजी जाती है. सब्जियों से होने वाली कमाई इतनी होती है जिससे गांव के लोगों को रोजगार करने की जरूरत नहीं होती है.
कैसे हुआ यह सफल
बताया जाता है कि गांव की तस्वीर ऐसी नहीं थी एक दशक पहले गांव की हालत अच्छी नहीं थी. पुरुष रोजगार के लिए यहां भी पलायन कर रहे थे और दूसरे राज्यों में काम खोजने जाते थे. लेकिन यहां कि महिलाओं ने बड़ा कदम उठाते हुए एक महिला किसान कल्ब का गठन किया. इसके बाद इस संगठन से सैकड़ों महिलाएं जुड़ गई. यहां महिलाओं ने आधुनिक खेती के बारे में जानकारी हासिल की. इसमें मिश्रित खेती, किसान वर्मी कंपोस्ट और श्रीविधी खेती के साथ परंपरागत खेती के बारे में जानकारी ली और खेती की शुरूआत की. आज यह गांव महिलाओं की खेती लिए जाना जाता है.
महिलाओं ने जिस तरह मोर्चा संभाला है. इससे पुरुषों में भी काफी खुशी है. महिलाओं की खेती के काम में पुरुष भी साथ देते हैं और आज यह गांव संपन्न रूप से दिखता है.
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