Rent Agreement Hidden Clause: शहरों में अपने लिए एक परफेक्ट किराए का घर ढूंढना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है. हफ्तों तक ऑनलाइन लिस्टिंग खंगालने, दर्जनों फ्लैट्स देखने और मकान मालिक से लंबी बातचीत के बाद जब कोई बजट के मुताबिक घर मिलता है, तो किरायेदार राहत की सांस लेता है. लेकिन यहीं पर परेशानी खत्म नहीं होता है. कानूनी और रियल एस्टेट के जानकारों का कहना है कि यही वह समय होता है, जब ज्यादातर लोग अपनी सबसे बड़ी गलती कर बैठते हैं.
लापरवाही या जल्दबाजी की वजह से किरायेदार कई बार एग्रीमेंट की बारीक शर्तों को पढ़े बिना ही उस पर हस्ताक्षर कर देते हैं. इन्हीं लापरवाहियों की ओर से इशारा करते हुए विशेषज्ञ बताते हैं कि Clauses नजरअंदाज करने से बाद में सिक्योरिटी डिपॉजिट की वापसी, मेंटेनेंस चार्ज और समय से पहले घर खाली करने पर भारी पेनल्टी जैसे विवादों का सामना करना पड़ सकता है. दरअसल, हर किसी का ध्यान केवल किराए पर होता है, लेकिन असली वित्तीय जोखिम एग्रीमेंट के भीतर छिपे होते हैं. ऐसे में अगर आप भी नया घर किराए पर लेने जा रहे हैं, तो नीचे दिए गए 3 सबसे महत्वपूर्ण क्लॉज की जांच किए बिना रेंट एग्रीमेंट पर कभी हस्ताक्षर न करें.
सिक्योरिटी डिपॉजिट और डिडक्शन के नियम
मकान मालिक और किरायेदार के बीच होने वाले विवादों की सबसे बड़ी वजह हमेशा सिक्योरिटी डिपॉजिट ही होती है. भारत के कई प्रमुख शहरों में यह डिपॉजिट 2 से 6 महीने या उससे भी अधिक के किराए के बराबर होता है. रियल एस्टेट विशेषज्ञों के मुताबिक किरायेदारों को कभी यह नहीं मान लेना चाहिए कि घर खाली करते ही उनका पैसा तुरंत वापस मिल जाएगा. दरअसल, एग्रीमेंट में स्पष्ट लिखा होना चाहिए कि मकान मालिक को घर खाली होने के कितने दिनों के भीतर डिपॉजिट वापस करना होगा.इसके साथ ही एग्रीमेंट में स्पष्ट अंतर होना चाहिए कि सामान्य टूट फूट जैसे कि समय के साथ फीका पड़ा पेंट या हल्की पुरानी पड़ी चीजें और वास्तविक नुकसान जैसे कोई खिड़की या टाइल टूटना, इन दोनों में अंतर है. ऐसे में मकान मालिक सामान्य टूट फूट के नाम पर सिक्योरिटी डिपॉजिट से मनमानी कटौती नहीं कर सकता है.
लॉक इन पीरियड और एग्जिट पॉलिसी
समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता है. कभी नौकरी बदल सकती है, या ट्रांसफर हो सकता है या व्यक्तिगत कारणों से आपको शहर बदलना पड़ सकता है. ऐसे में आपका रेंट एग्रीमेंट लचीला होना चाहिए. दरअसल, कई किरायेदार लॉक इन पीरियड का मतलब नहीं समझते. यदि आपके एग्रीमेंट में भी 6 महीने या 1 साल का लॉक इन पीरियड है, तो उस अवधि से पहले घर खाली करना कॉन्ट्रैक्ट का उल्लंघन माना जाएगा. ऐसे में आपको बचे हुए महीनों का किराया भी पेनल्टी के रूप में देना पड़ सकता है. बातचीत के दौरान अक्सर एग्जिट क्लॉज को छोड़ दिया जाता है, जो बाद में विवाद का सबसे बड़ा कारण बनता है. ऐसे में एग्रीमेंट में स्पष्ट होना चाहिए कि घर खाली करने से कितने महीने पहले नोटिस देना अनिवार्य है, खाली करने के बाद निरीक्षण की प्रक्रिया क्या होगी और पेनल्टी के क्या नियम होंगे.
मेंटेनेंस चार्ज की जिम्मेदारी
ज्यादातर किरायेदारों को लगता है कि उनकी ओर से दिया जाने वाला मासिक किराया ही उनका एकमात्र खर्च है, लेकिन आधुनिक आवासीय सोसायटियों में मेंटेनेंस चार्ज काफी ज्यादा होते हैं. लिहाजा, रेंट एग्रीमेंट में यह साफ साफ लिखा होना चाहिए कि सोसायटी का मासिक मेंटेनेंस चार्ज मकान मालिक देगा या किरायेदार. इसे बिना स्पष्ट किए छोड़ देने से बाद में हर महीने बहस की स्थिति पैदा होती है. इसके अलावा, बड़े और प्रीमियम रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट्स में प्राइवेट लॉबी, पार्किंग, जिम और स्विमिंग पूल जैसी सुविधाओं का मेंटेनेंस खर्च बहुत ज्यादा होता है. इसलिए लिखित रूप में यह तय होना चाहिए कि इन अतिरिक्त सुविधाओं का शुल्क कौन अदा करेगा.
जुबानी वादों पर न करें भरोसा
अक्सर बातचीत या नेगोशिएशन के दौरान मकान मालिक कई तरह के मौखिक वादे कर देते हैं, जैसे घर में नया पेंट कराना, पार्किंग स्पेस देना, या फिक्स्ड लीज एक्सटेंशन, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ये वादे रेंट एग्रीमेंट के कागजों पर दर्ज नहीं हैं, तो कानूनन इनकी कोई वैल्यू नहीं रह जाती. कानूनी कार्यवाही या विवाद की स्थिति में हमेशा लिखित क्लॉज को ही प्राथमिकता दी जाती है.
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यदि आप किसी बिजनेस, स्टार्टअप या रिटेल शॉप के लिए ऑफिस स्पेस लीज पर ले रहे हैं, तो साधारण नियमों के अलावा तीन अतिरिक्त क्लॉज सालाना किराया वृद्धि दर, कॉमन एरिया मेंटेनेंस और बिजली-पानी जैसे खर्चों पर विशेष ध्यान दें.
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