कुछ साल पहले तक लोग शादी वगैरह की शॉपिंग करने के लिए या डिजाइनर कपड़े खरीदने के लिए चांदनी चौक, साउथ एक्सटेंशन और हौज खास जैसी जगहों पर जाते थे लेकिन अब दिल्ली में एक ऐसी जगह मौजूद है जिसे डिजाइनर या फैशन हब के नाम से जाना जाता है. दिल्ली का शाहपुर जाट आज देश के सबसे चर्चित फैशन हब्स में गिना जाता है.
यहां की संकरी गलियों में लाखों रुपये के ब्राइडल लहंगे, डिजाइनर स्टूडियो, कैफे और क्रिएटिव बिजनेस दिखाई देते हैं. लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक ऐसा गांव भी है जिसकी पहचान, विरासत और समस्याएं आज भी बरकरार हैं. करीब 600 से 700 साल पुराने इस गांव का इतिहास दिल्ली सल्तनत के दौर से जुड़ा हुआ है. लोकल लोगों के मुताबिक, शाहपुर जाट कभी पूरी तरह खेती पर निर्भर गांव था. पंचशील, एशियन गेम्स विलेज और आसपास के कई बड़े इलाकों का डेवलपमेंट इसी गांव की खेती की जमीन पर हुआ. साल 1982 के एशियन गेम्स से पहले लगभग 135 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई, जिसके बाद गांव की इकोनॉमी पूरी तरह बदल गई.
ब्राइडल फैशन सेंटर के रूप में मिली पहचान
खेती खत्म होने के बाद लोगों ने अपने मकानों में एक्स्ट्रा फ्लोर्स बनाकर किराए पर देना शुरू किया. इसी दौरान कम किराए की वजह से फैशन डिजाइनरों और कारीगरों ने यहां अपने स्टूडियो और वर्कशॉप खोले. धीरे-धीरे रितु कुमार, दस्तकार और बाद में NIFT व पर्ल एकेडमी से जुड़े कई डिजाइनर भी यहां पहुंचे. देखते ही देखते शाहपुर जाट दिल्ली के मेन डिजाइन और ब्राइडल फैशन सेंटर के रूप में पहचान बनाने लगा.
आज भी गांव के अंदर सैकड़ों कारीगर जरी, सीक्वेंस और हैंड एंब्रॉयडरी का काम करते हैं. यहां एक ब्राइडल ड्रेस तैयार करने में कई दिन, कभी-कभी कई हफ्ते तक लग जाते हैं. हालांकि कारीगरों का कहना है कि पहले की तुलना में काम में 20 से 25 फीसदी तक गिरावट आई है और अब कंपटीशन भी बढ़ गया है.
किराए से हो रही है लोगों की अच्छी खासी इनकम
लोकल लोगों का मानना है कि फैशन इंडस्ट्री आने से गांव की फाइनेंशियल कंडीशन मजबूत हुई और किराए से अच्छी इनकम होने लगी है. वहीं दूसरी ओर, गांव की मूल पहचान धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है. संकरी गलियां, पार्किंग की कमी, बिजली के तारों का जाल, पुरानी बिल्डिंग और आग लगने जैसी दुर्घटनाओं का खतरा आज भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं.
दिल्ली का "अर्बन विलेज" है शाहपुर जाट
यहीं रहने वाले लोग बताते हैं कि शाहपुर जाट न पूरी तरह गांव रह गया है और न ही पूरी तरह शहर बन पाया है. यह दिल्ली के उन "अर्बन विलेज" का हिस्सा है, जहां विकास और विरासत एक साथ मौजूद हैं लेकिन स्पष्ट नीतियों के अभाव में दोनों के बीच बैलेंस बनाना मुश्किल होता जा रहा है.
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