भाजपा के अध्यक्ष नितिन नवीन की नई राष्ट्रीय टीम का सोमवार को ऐलान हो गया. नई टीम में राजस्थान को खासा प्रतिनिधित्व मिला है. पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राज्यसभा सांसद सतीश पूनिया को राष्ट्रीय महामंत्री बनाए जाने के साथ ही सुनील बंसल को भी राष्ट्रीय महामंत्री बनाया है. उदयपुर सांसद डॉ. मन्नालाल रावत को भाजपा अनुसूचित जनजाति यानी ST मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया तो राजस्थान के सीनियर चार्टर्ड अकाउंटेंट और भाजपा नेता राजेश मंगल को राष्ट्रीय सह कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है.
मन्नालाल रावत को लेकर लोगों में जिज्ञासा
राजस्थान के इन दो चेहरों यानी मन्नालाल रावत और डॉ. राजेश मंगल को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ दूसरे लोगों में भी जिज्ञासा दिखी है. इनको मिली जिम्मेदारियों के राजनीतिक मायने भी अहम हैं. एक तरफ मन्नालाल रावत के जरिए भाजपा ने आदिवासी राजनीति और ST बहुल क्षेत्रों में अपने संगठनात्मक विस्तार को मजबूत करने का संदेश दिया है. वहीं राजेश मंगल की नियुक्ति पार्टी के वित्तीय प्रबंधन और संगठन के भीतर प्रोफेशनल विशेषज्ञता को महत्व देने के संकेत के तौर पर देखी जा रही है.
सरकारी सेवा के दौरान उदयपुर और दक्षिण राजस्थान के आदिवासी इलाकों में उनके संपर्कों और सामाजिक सक्रियता ने उनकी अलग पहचान बनाई. वे जनजातीय संगठनों और वनवासी कल्याण से जुड़े कार्यक्रमों में भी सक्रिय रहे. यही जमीनी जुड़ाव 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए उनके पक्ष में महत्वपूर्ण फैक्टर माना गया तो संघ से जुड़ाव ने बाकी काम कर दिया.

2024 में सीधे लोकसभा चुनाव के मैदान में उतरे
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उदयपुर की ST आरक्षित सीट से तत्कालीन सांसद अर्जुनलाल मीणा का टिकट काटकर मन्नालाल रावत को मैदान में उतारा था. रावत ने कांग्रेस प्रत्याशी और पूर्व आईएएस अधिकारी ताराचंद मीणा को हरा कर पहली बार लोकसभा में प्रवेश किया. राजनीति में आने के लिए उन्होंने सरकारी सेवा से वीआरएस लिया था. यानी परिवहन विभाग में प्रशासनिक अनुभव से सीधे चुनावी राजनीति में आए रावत ने महज एक चुनाव के बाद राष्ट्रीय संगठन में महत्वपूर्ण जगह बना ली है.
ST मोर्चा की कमान क्यों महत्वपूर्ण?
मन्नालाल रावत को ST मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने का सबसे बड़ा संदेश आदिवासी राजनीति से जुड़ा माना जा रहा है. राजस्थान के साथ ही गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में आदिवासी समाज चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण आधार है. ऐसे में उदयपुर जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्र से आने वाले सांसद को राष्ट्रीय ST मोर्चे की कमान देना भाजपा के लिए संगठनात्मक और राजनीतिक दोनों लिहाज से महत्वपूर्ण है. रावत की जिम्मेदारी अब केवल राजस्थान तक सीमित नहीं रहेगी. उन्हें देशभर में आदिवासी समाज से जुड़े संगठनात्मक मुद्दों, पार्टी के जनजातीय आउटरीच और ST मोर्चे के विस्तार पर काम करना होगा.
राजेश मंगल- CA से भाजपा संगठन तक
राजेश मंगल की राष्ट्रीय टीम में एंट्री कई मायनों में चौंकाने वाली है. हालांकि जानकार बताते हैं कि मंगल ने आमेर से अलवर तक अपनी पहचान बनाई और फिर इस रूट का दिल्ली तक विस्तार कर लिया. पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट मंगल को भाजपा ने राष्ट्रीय सह–कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी है. राजस्थान की राजनीति और भाजपा संगठन में वे लंबे समय से वित्तीय और संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभालते रहे हैं. नई जिम्मेदारी मिलने के बाद उनकी पेशेवर स्पेशलिटी तो पार्टीक काम आएगी ही, साथ में. फंड मैनेजर के रूप में भी वे अपने सीनियर पीयूष गोयल की मदद करेंगे.
मंगल मूल रूप से राजस्थान के कोटपूतली-बहरोड़ जिले के पावटा क्षेत्र से हैं. शुरुआती पढ़ाई और कॉलेज अपने गांव से पूरी करने के बाद वे जयपुर आ गए. 1988 बैच के CA राजेश मंगल प्रैक्टिसिंग चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और भाजपा के सीए सेल में प्रदेश स्तर की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं. इसके अलावा भाजपा युवा मोर्चा में भी वित्तीय जिम्मेदारी निभाने का अनुभव उनके पास रहा है. भाजपा राजस्थान सीए सेल के प्रदेश संयोजक के तौर पर भी जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. अरुण चतुर्वेदी ने उन्हें अपनी टीम में यह बड़ी जिम्मेदारी दी थी. वे BPCL और NMDC में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर के तौर पर भी काम कर चुके हैं.

छात्र राजनीति से संगठन तक का सफर
राजेश मंगल की राजनीतिक यात्रा की शुरुआत छात्र राजनीति से हुई. उन्होंने छात्र राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई और राजस्थान विश्वविद्यालय से एम कॉम के दौरान उन्हें यूनिवर्सिटी छात्रसंघ में सचिव की जिम्मेदारी भी मिली. इसके बाद चार्टर्ड अकाउंटेंसी और संगठनात्मक राजनीति को उन्होंने साथ-साथ आगे बढ़ाया. CA क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता के चलते भाजपा के CA प्रकोष्ठ में उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं. 2010 में वे भाजपा के CA प्रकोष्ठ की गतिविधियों से और सक्रिय रूप से जुड़े. बाद में प्रदेश स्तर पर संगठनात्मक और वित्तीय जिम्मेदारियां बढ़ती गईं. 2013 के चुनाव में राजस्थान में भूपेंद्र यादव के सह–प्रभारी के रूप में काम करते हुए मंगल की मुलाक़ात यादव से हुई. इसके बाद यादव ने आमेर में सतीश पूनिया के चुनाव के दौरान उन्हें जिम्मेदारियां दी. बाद में वे उन्हें झारखंड चुनाव में भी साथ लेकर गए.
2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी पार्टी के चुनावी वित्तीय प्रबंधन से जुड़े कामों में उनकी भूमिका बताई जाती है. इसके बाद दिल्ली और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के साथ उनका संपर्क बढ़ा. भूपेंद्र यादव के साथ ही काम करते हुए वे दिल्ली में पीयूष गोयल से मिले और दिल्ली में उनकी सक्रियता ने भी उनके राष्ट्रीय नेटवर्क को मजबूत किया.
पावटा से दिल्ली तक पहुंचा संगठनात्मक सफर
राजेश मंगल की कहानी भाजपा में उन नेताओं की श्रेणी में आती है, जिनका आधार पारंपरिक चुनावी राजनीति के बजाय संगठन और प्रोफेशनल विशेषज्ञता रही है. पावटा से निकलकर राजस्थान विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति, CA के पेशे और फिर भाजपा के वित्तीय-संगठनात्मक ढांचे तक उनका सफर अब राष्ट्रीय संगठन में पहुंच गया है.
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