- बीजेपी की नई टीम में वसुंधरा को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है.
- वसुंधरा राजे की लोकप्रियता और जमीनी प्रभाव से बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व वाकिफ है.
- वसुंधरा की जातीय समीकरणों की जटिल राजनीति में मजबूत पकड़ है.
बीजेपी की नई राष्ट्रीय टीम में एक बार फिर से वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) को जगह मिली है. राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा को नितिन नवीन की टीम में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है. बीजेपी की नई टीम में एक स्पष्ट संकेत यह भी है कि जमीनी राजनीति में अब भी प्रभाव रखने वाले वरिष्ठ नेताओं के मामले में पार्टी बेहद सावधानी से आगे बढ़ रही है. इसीलिए वसुंधरा राजे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए रखा है, यानी एक करिश्माई और अनुभवी नेता के साथ सम्मानजनक यथास्थिति. वसुंधरा राजे भले ही राजस्थान की सक्रिय राजनीति में फिलहाल हाशिये पर दिखाई दे रही हों, लेकिन उनकी लोक प्रियता आज भी बरक़रार है और ऐसे में पार्टी ने समझ लिया है कि उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
2023 में बीजेपी की आई नई रणीनीति
2023 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने राजस्थान में 115 सीटें हासिल कर सम्मानजनक प्रदर्शन किया, लेकिन यह उस प्रचंड बहुमत के आसपास भी नहीं था, जो पार्टी ने तब हासिल किया था. जब वसुंधरा राजे ने 2003 में पहली बार चुनावी राजनीति में कदम रखते हुए पार्टी का नेतृत्व किया था और बीजेपी को 120 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत दिलाया था.
2024 का लोकसभा चुनाव और वसुंधरा राजे
वसुंधरा राजे ने पार्टी के लिए प्रचार किया, लेकिन पूरे राज्य में व्यापक रूप से नहीं. 200 विधानसभा क्षेत्रों में से 70 निर्वाचन क्षेत्रों में उनकी पहुंच 54 चुनावी रैलियों तक सीमित रही. 2023 में भजनलाल सरकार के सत्ता संभालने के बाद संदेश साफ था कि पार्टी राजस्थान में नए चेहरों को आगे बढ़ाना चाहती थी. 2024 के लोकसभा चुनावों में वसुंधरा राजे ने केवल एक ही सीट पर प्रचार किया, वह थी झालावाड़-बारां, जिसका प्रतिनिधित्व उनके बेटे दुष्यंत सिंह करते हैं.

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2024 के चुनावों में बीजेपी ने राजस्थान में 11 लोकसभा सीटें गंवा दीं. इससे पहले पार्टी ने लगातार शानदार प्रदर्शन करते हुए 25 में से 25 सीटें जीती थीं. ऐसा लगा कि राजस्थान में पार्टी की नई व्यवस्था और नया नेतृत्व पूरी तरह मतदाताओं के साथ तालमेल नहीं बैठा पाया. ऐसे समय में जब राजस्थान की बीजेपी सरकार अपने कार्यकाल के मध्य बिंदु पर पहुंच रही है.
वसुंधरा पर बीजेपी का भरोसा क्या संकेत?
संकेत स्पष्ट है कि वसुंधरा राजे को बनाए रखना राजनीतिक रूप से समझदारी भरा फैसला है. 2028 में जब बीजेपी अगला विधानसभा चुनाव लड़ेगी. अगर पार्टी का फोकस महिला नेतृत्व पर रहता है, तो वसुंधरा राजे इस दौड़ में स्पष्ट रूप से सबसे आगे होंगी. उनकी व्यापक जनअपील है. राजस्थान जैसे गहरी सामंती जड़ों वाले राज्य में राजघराने से जुड़ी उनकी छवि का अपना एक अलग आकर्षण है. वह न केवल महिला मतदाताओं के बीच प्रभाव रखती हैं, बल्कि जातीय समीकरणों की जटिल राजनीति में भी उनकी अपनी मजबूत पकड़ है.
36 कौम पर मजबूत पकड़
उनकी जाट, मराठा और राजपूत विरासत तथा गुर्जरों के साथ उनका वैवाहिक संबंध उनकी बहू निहारिका राजे का संबंध राजनीतिक रूप से प्रभावशाली और संवेदनशील गुर्जर समुदाय से है. उन्हें राजस्थान के जातीय समीकरणों में एक ऐसी राजनीतिक पूंजी देता है, जो उनके पक्ष में काम करती है. राजे ने इसे अपनी राजनीतिक यूएसपी बना लिया है और अक्सर कहती रही हैं कि वह राजस्थान के 36 से 36 कौमों से जुडी हुई हैं.

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राजस्थान की राजनीति में अब भी प्रासंगिक वसुंधरा?
धौलपुर के जाट राज घराने की वो बहु हैं और इस राजनीतिक दौर में जाट मतदाता काफी मायने रखते हैं. पिछले लोक सभा चुनाव में जिन ग्यारह सीटों में भाजपा हारी थी वो जाट बहुलिया थीं. जब 2028 के चुनाव करीब आएंगे, तब बीजेपी को सत्ता विरोधी लहर यानी एंटी इंकम्बेंसी का सामना करना होगा. ऐसे में जिस नेता के पक्ष में इस तरह का राजनीतिक समीकरण हो, उसे बनाए रखना सिर्फ राजनीतिक रूप से सुविधाजनक ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी समझदारी भरा कदम है.
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में संगठन एवं राष्ट्रसेवा का अवसर प्रदान करने के लिए माननीय प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी एवं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री @NitinNabin जी का आभार।
— Vasundhara Raje (@VasundharaBJP) August 17, 2026
संगठन द्वारा नई जिम्मेदारियां प्राप्त करने वाले सभी साथियों को हार्दिक बधाई… pic.twitter.com/gTwoLvgX3i
राजे पार्टी के लिए समीकरण बिगाड़ने की क्षमता भी रखती हैं. ऐसे में उन्हें पार्टी में सम्मानजनक पद देकर बीजेपी ने उनकी राजनीतिक हैसियत के प्रति सम्मान जताया है और यह संकेत भी दिया है कि वह अब भी राजस्थान की राजनीति में प्रासंगिक हैं. राजे खेमे के सूत्र अक्सर यह दोहराते रहे हैं कि वह खुद राज्य के नए नेतृत्व को अपनी जगह बनाने और अपने दम पर उभरने का मौका देना चाहती हैं.
यही वजह है कि उन्होंने खुद को काफी हद तक अपने विधानसभा क्षेत्र झालावाड़-बारां तक सीमित रखा है. लेकिन जब भी वसुंधरा राजे सार्वजनिक तौर पर सक्रिय होती हैं. वह खबर बनती हैं और सुर्खियां बटोरती हैं. इस राजनीतिक खेल में भले ही वह फिलहाल हाशिये पर दिखाई दे रही हों, लेकिन उन्हें ऐसा खिलाड़ी नहीं माना जा सकता जिसे नजरअंदाज किया जाए. उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए रखना पार्टी के लिए एक सम्मानजनक यथास्थिति बनाए रखने का तरीका है.
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