देश के पहले प्रधानमंत्री बनने की कहानी भी दिलचस्प है. सरदार वल्लभभाई पटेल, महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के बीच का यह किस्सा साल 1946 के कांग्रेस अध्यक्ष पद चुनाव से जुड़ा है. भारत को आजादी के पहले देश में एक अंतरिम सरकार का गठन होना था. यह तय था कि जो व्यक्ति कांग्रेस अध्यक्ष चुना जाएगा, वही अंतरिम सरकार का प्रमुख यानी स्वतंत्र भारत का पहला प्रधानमंत्री बनेगा. दरअसल,दूसरे विश्व युद्ध और भारत छोड़ो आंदोलन के कारण 1940 से 1946 के बीच कांग्रेस के संगठन चुनाव नहीं हो पाए थे.मौलाना अबुल कलाम आजाद ही लगातार अध्यक्ष रहे. लिहाजा अप्रैल 1946 में नए अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई.
सरदार पटेल को बहुमत मिला था
कांग्रेस संगठन नियमों के मुताबिक, राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनाव के लिए 15 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों से नामांकन मांगे गए थे. इसमें से 12 कमेटियों ने सरदार पटेल के नाम का प्रस्ताव भेजा था. बाकी बची समितियों ने किसी के नाम का प्रस्ताव नहीं भेजा. जवाहरलाल नेहरू के नाम का प्रस्ताव एक भी प्रांतीय समिति ने नहीं किया था. ऐसे में सरदार पटेल का कांग्रेस अध्यक्ष और देश का पहला प्रधानमंत्री बनना पूरी तरह तय था. महात्मा गांधी के पौत्र और प्रोफेसर राजमोहन गांधी ने अपनी किताब (Patel: A Life) में इस कहानी का जिक्र किया था. इस किताब में इस पुस्तक में आचार्य जेबी कृपलानी की भूमिका का विस्तार से उल्लेख है.गांधीजी के सुझाव पर उन्होंने कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों के हस्ताक्षर करवाकर नेहरू का नाम प्रस्तावित करवाया.
महात्मा गांधी असमंजस में थे
महात्मा गांधी व्यक्तिगत तौर पर जवाहरलाल नेहरू को कमान सौंपना चाहते थे.गांधी का मानना था कि स्वतंत्र भारत को एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी, जिसे दुनिया जानती हो. धाराप्रवाह अंग्रेजी के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत छवि रखता हो. गांधी जानते थे कि नेहरू किसी अन्य नेता जैसे सरदार पटेल के अधीन काम करने को राजी नहीं होंगे. नेहरू को नेतृत्व नहीं मिला तो पार्टी में विभाजन हो सकता था. भारत के विभाजन के संवेदनशील समय पर बापू किसी भी कीमत पर नहीं चाहते थे.वो जानते थे कि सरदार पटेल बेहद अनुशासित और देश हित में महत्वाकांक्षाओं का त्याग कर सकते हैं. सरदार पटेल की पुत्री मनीबेन पटेल (Maniben Patel) की डायरी के गुजराती अंशों में लिखा है कि कैसे बापू ने पटेल को अपनी उम्मीदवारी वापस लेने का संकेत दिया और पटेल ने तुरंत अपनी सहमति दे दी.
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सरदार पटेल ने क्यों दिया इस्तीफा
प्रांतीय समितियों के नतीजों में सरदार पटेल को पूर्ण बहुमत मिला. उसके बाद महात्मा गांधी ने कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की बैठक बुलाई. गांधीजी ने नेहरू से कहा, प्रांतीय कमेटियों ने तुम्हारा नाम प्रस्तावित नहीं किया है, केवल पटेल का नाम. इस पर तुम्हारा क्या कहना है? नेहरू ने इस पर जवाब नहीं दिया. स्पष्ट था कि वो नंबर दो का स्थान स्वीकार करना नहीं चाहते थे. नेहरू के मौन और जिद को भांपते हुए गांधी ने सरदार पटेल की तरफ देखा.महात्मा गांधी ने बिना कुछ कहे सिर्फ इशारे से पटेल को अपनी उम्मीदवारी वापस लेने का इशारा दिया. सरदार पटेल गांधीजी में पूरा भरोसा था. उन्होंने बिना एक पल गंवाए जेब से कागज निकाला और कांग्रेस अध्यक्ष पद की उम्मीदवारी से इस्तीफा लिखकर गांधी को सौंप दिया. फिर बिना किसी विरोध के आचार्य जेबी कृपलानी ने नेहरू के नाम का औपचारिक प्रस्ताव रखा. कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों ने हस्ताक्षर किए और नेहरू निर्विरोध अध्यक्ष और फिर देश के प्रधानमंत्री बने.
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क्या सरदार पटेल को पछतावा था?
सरदार पटेल ने कभी भी इस फैसले पर अपने मन की बात किसी भी मंच पर सार्वजनिक नहीं की. अपने जीवन के अंतिम दिनों में सरदार पटेल ने एक सार्वजनिक भाषण में स्वयं कहा था कि गांधीजी का नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने का फैसला पूरी तरह सही था क्योंकि देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे ले जाने के लिए नेहरू का करिश्माई व्यक्तित्व आवश्यक था.नेहरू ने पटेल को सरकार का सबसे मजबूत स्तंभ कहा. पटेल ने नेहरू को हमेशा अपना नेता माना. मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अपनी पुस्तक (India Wins Freedom 1959) में भी लिखा था, यह मेरी एक बड़ी भूल थी कि मैंने दोबारा अध्यक्ष न बनने का फैसला किया और नेहरू का समर्थन किया। काश! मैंने उस समय सरदार पटेल का समर्थन किया होता, तो शायद इतिहास अलग होता और देश का विभाजन भी टाला जा सकता था.
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