जैसलमेर 871 साल का हो गया है. आज स्वर्णनगरी के स्थापना दिवस पर सोनार दुर्ग स्थित राजमहल में पारंपरिक आयोजनों का विधिवत आगाज हुआ. सबसे पहले भाटी राजवंश की कुलदेवी मां स्वांगिया जी की पूजा-अर्चना और हवन किया गया. इसके बाद राजमहल की छत पर रियासतकालीन ध्वज का मंत्रोच्चार के साथ पूजन हुआ. पूजा के बाद पूर्व महारावल चैतन्यराज सिंह, महाराज दुष्यन्त सिंह और महाराज केसरी सिंह ने ध्वजारोहण किया. पूर्व महारावल चैतन्यराज सिंह ने कहा कि 871 वर्षों से जैसलमेर अपने गौरव और स्वाभिमान के साथ सीना ताने खड़ा है.

स्थापना दिवस पर दुर्ग में समारोह
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उत्तर की ढाल
दरअसल जैसलमेर का इतिहास सिर्फ एक दुर्ग की कहानी नहीं, बल्कि वीरता और बलिदान की ऐसी गाथा है, जिसने सदियों तक देश की उत्तर-पश्चिमी सीमा की रक्षा की. उत्तर दिशा से आने वाले आक्रमणों के सामने जैसलमेर ढाल बनकर खड़ा रहा. यही वजह रही कि भाटी राजवंश को “उत्तर भड़ किवाड़” की गौरवपूर्ण उपाधि मिली.
जैसलमेर के इतिहास में ढाई साके का विशेष स्थान है, जिसमें वीर योद्धाओं के साथ वीरांगनाओं और आमजन के बलिदान की भी अमिट कहानी दर्ज है. दुर्ग निवासी सूर्यप्रकाश गोपा ने बताया कि ढाई साके का इतिहास आज भी हर जैसाणवासी को गौरवान्वित करता है और इसी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी है.

जैसलमेर की भव्य हवेलियां और सोनार दुर्ग मशहूर हैं
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आक्रमणकारियों के हमले
महारावल जैसल सिंह ने संवत 1212 यानी वर्ष 1156 ईस्वी में त्रिकूट पहाड़ी पर जैसलमेर दुर्ग की नींव रखी थी. इसके बाद करीब दो सौ वर्षों के इतिहास में अलाउद्दीन खिलजी, फिरोजशाह तुगलक समेत कई आक्रमणकारियों ने जैसलमेर पर हमले किए, लेकिन सोनार दुर्ग की पहचान और गौरव कायम रहा. सिल्क रूट से जुड़ने के बाद यहां देश-विदेश से व्यापारी और समृद्ध कारोबारी समुदाय पहुंचे. इसी दौर में भव्य हवेलियां, मंदिर, तालाब और छतरियां बनीं और जैसलमेर की स्थापत्य कला ने दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई.
राजपरिवार के करीबी नरपत सिंह ने बताया कि महारावल जैसल जी ने संवत 1212 में जैसलमेर दुर्ग की स्थापना की थी. स्थापना दिवस पर मां स्वांगिया जी की पूजा-अर्चना, महारावल जैसल जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण और दुर्ग पर ध्वजारोहण की परंपरा निभाई गई.

भाटी राजवंश की कुलदेवी मां स्वांगिया जी की पूजा
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पर्यटकों की पसंदीदा मंजिल
समय के साथ जैसलमेर ने आधुनिकता की ओर भी कदम बढ़ाए. रियासतकालीन दौर में महारावल जवाहर सिंह का काल जैसलमेर के आधुनिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है, जो 1914 से 1948 तक रहा. पोकरण में 1939 में रेल सेवा पहुंची, जबकि जैसलमेर में 1968 में रेल सेवा शुरू हुई. जैसलमेर में टेलीफोन लाइन भी वर्ष 1939 में पहुंची. आज यही जैसाण विश्व पर्यटन के नक्शे पर अपनी अलग पहचान रखता है और विदेशी सैलानियों की पसंदीदा मंजिलों में शामिल है.
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