Rajasthan News: राजस्थान में जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल के सामने स्थित मोदी धर्मशाला में रहने वाले दर्जनों परिवारों का जीवन एक अनिश्चित प्रतीक्षा में सिमट गया है. ऐसी ही एक घटना सामने आई है, जिसमें बांसवाड़ा जिले के बागीदौरा से जयंतीलाल और उनकी पत्नी अनीता मार्च महीने में जयपुर आए थे. तब से दोनों यहीं हैं. घर से 531 किलोमीटर दूर उनका बेटा गांव में किराने की दुकान संभाल रहा है, जो परिवार की आय का एकमात्र जरिया है. वहीं जयंतीलाल और अनीता अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं ताकि अनीता का किडनी ट्रांसप्लांट हो सके.
59 वर्षीय जयंतीलाल अपनी पत्नी अनीता को अपनी किडनी दान करने वाले हैं. सभी जरूरी दस्तावेज पूरे हो चुके हैं, एनओसी भी मिल चुकी है. लेकिन 30 मई को उनके इलाज कर रहे वरिष्ठ नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. धनंजय अग्रवाल के सेवानिवृत्त होने के बाद, जयंतीलाल और अनीता का कहना है कि उनका ट्रांसप्लांट लगभग एक महीने तक टल गया. मार्च से इंतजार कर रहे इस दंपति के लिए यह झटका बेहद भारी था.
'मार्च से कर रही ट्रांसप्लांट का इंतजार'
अनीता ने कहा "मेरे इलाज में अब तक करीब पांच लाख रुपये खर्च हो चुके हैं. पहले हमने किराये पर कमरा लिया था, फिर उसे छोड़कर इस धर्मशाला में आ गए. यहां भी रोज़ 900 रुपये देने पड़ते हैं. मेरा बेटा गांव में अकेला है. वही दुकान संभाल रहा है, वही घर जाकर खाना बनाता है. मुझे उसकी बहुत चिंता रहती है. मुझे हर दूसरे दिन डायलिसिस कराना पड़ता है. मार्च से मैं अपने ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रही हूं."
जयपुर के एसएमएस अस्पताल के नेफ्रोलॉजी विभाग की पांचवीं मंजिल पर कमरा नंबर 518 अब फिर से खुल चुका है. यह कमरा पहले डॉ. धनंजय अग्रवाल का था. उनके सेवानिवृत्त होने के बाद मरीजों की फाइलें इसी कमरे में बंद रहीं, जिससे किडनी ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे कम से कम 11 मरीजों के मामलों पर असर पड़ा. अब यह कमरा खोला जा चुका है और डॉ. संजीव शर्मा ने इन मामलों की जिम्मेदारी संभाल ली है.
जान पर भारी पड़ रही लापरवाही
डॉ. विनय मल्होत्रा ने कहा "किसी कमरे के बंद होने से इलाज नहीं रुक सकता. अगर कमरा बंद था तो हमने चाबी मंगवाकर उसे खुलवाया. किडनी ट्रांसप्लांट पूरी मेडिकल टीम की प्रक्रिया होती है और मरीजों का रिकॉर्ड भी ऑनलाइन उपलब्ध रहता है. डॉ. अग्रवाल का सरकार ने पुनर्नियोजन किया है और उनकी पोस्टिंग अजमेर में हुई है. उनके मामलों की जिम्मेदारी अब दूसरे डॉक्टर संभाल रहे हैं." अस्पताल की व्यवस्था पर सवाल उठने और मीडिया की नजर पड़ने के बाद सरकार हरकत में आई और नए डॉक्टर को इन मरीजों की जिम्मेदारी सौंप दी गई.
उम्मीद की नई किरण
मीडिया और अस्पताल की व्यवस्था पर उठे सवालों के बाद अब सरकार ने सक्रियता दिखाई है. डॉ. संजीव शर्मा को इन मामलों की कमान सौंपी गई है और उन्होंने दो हफ्तों के भीतर ट्रांसप्लांट करने का आश्वासन दिया है. यह खबर उन परिवारों के लिए राहत लेकर आई है जो हफ्तों से धर्मशाला के छोटे से कमरों में अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे.
आर्थिक और मानसिक बोझ
इन मरीजों के लिए सिर्फ अस्पताल की लंबी कतारें ही चुनौती नहीं हैं. हर दिन होने वाला डायलिसिस, रहने का खर्च और गांव से दूर रहने की मजबूरी ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया है. एक मरीज के बीमार होने पर पूरा परिवार आर्थिक संकट में घिर जाता है. एसएमएस अस्पताल जैसे बड़े संस्थान से हर किसी को उम्मीद रहती है कि यहां व्यवस्थाएं पारदर्शी और तेज होंगी ताकि जयंतीलाल और महेंद्र जैसे मरीजों को बिना वजह अपनी सेहत और जेब का नुकसान न उठाना पड़े.
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