अटल बिहारी वाजपेयी (1924–2018) भाजपा के सह संस्थापक के साथ तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे. उनका जन्म 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में हुआ था. जबकि मध्य प्रदेश के अलावा उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के डीएवी कॉलेज से उन्होंने पढ़ाई की.वो पहले ऐसे गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया. अटल बिहारी वाजपेयी की आज 8वीं पुण्यतिथि है. अटलजी को 2015 में देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था. अटलजी ओजस्वी वक्ता और कवि थे. आइए उनकी ऐसी ही कुछ कालजयी कविताओं की पंक्तियां पढ़ते हैं...
मैंने जन्म नहीं मांगा था...
किन्तु मरण की मांग करुँगा.
जाने कितनी बार जिया हूं,
जाने कितनी बार मरा हूं.
जन्म मरण के फेरे से मैं,
इतना पहले नहीं डरा हूं.
अंतहीन अंधियार ज्योति की,
कब तक और तलाश करूंगा.
मैंने जन्म नहीं मांगा था,
किन्तु मरण की मांग करूंगा.
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मौत से ठन गई
जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा जिंदगी से बड़ी हो गई
मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
जिंदगी-सिलसिला, आज-कल की नहीं
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूं?
तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आजमा
मौत से बेखबर, जिंदगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर.
बात ऐसी नहीं कि कोई गम ही नहीं,
दर्द अपने पराए कुछ कम भी नहीं.
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाकी हैं कोई गिला.
हर चुनौती से दो हाथ मैंने किए,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए.
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाकी हैं कोई गिला.
हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए.
आज झकझोरता तेज तूफ़ान है,
नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है.
पार पाने का कायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफां का, तेवरी तन गई.
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आओ फिर से दिया जलाएं
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाईं से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें, बुझी हुई बाती सुलगाएं
आओ फिर से दिया जलाएं
हम पड़ाव को समझे मंजिल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में आने वाला कल न भुलाएं
आओ फिर से दिया जलाएं
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गीत नया गाता हूं
गीत नहीं गाता हूं
बेनकाब चेहरे हैं,
दाग बड़े गहरे हैं
टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूं
गीत नहीं गाता हूं
लगी कुछ ऐसी नजर
बिखरा शीशे सा शहर
अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं
गीत नहीं गाता हूं
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गीत नया गाता हूं
गीत नया गाता हूं
टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात
प्राची में अरुणिम की रेख देख पता हूँ
गीत नया गाता हूं
टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलको पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा,
रार नई ठानूंगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं
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कदम मिलाकर चलना होगा
कदम मिला कर चलना होगा
बाधाएं आती हैं आएं
घिरें प्रलय की घोर घटाएं,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,
निज हाथों में हंसते-हंसते,
आग लगाकर जलना होगा.
कदम मिलाकर चलना होगा.
न दैन्यं न पलायनम...
कर्तव्य के पुनीत पथ को
हमने स्वेद से सींचा है,
कभी-कभी अपने अश्रु और
प्राणों का अर्ध्य भी दिया है
किंतु अपनी ध्येय यात्रा में
हम कभी रुके नहीं हैं.
किसी चुनौती के सम्मुख
कभी झुके नहीं हैं.
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