पंजाब की धरती पर इस समय एक मौन क्रांति चल रही है. इस क्रांति का केंद्र कोई राजनीतिक मंच नहीं, बल्कि सरकारी स्कूलों के क्लास रूम हैं. कभी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसने वाले पंजाब के सरकारी स्कूल आज देश के लिए एक मिसाल बन चुके हैं. जो राज्य कुछ साल पहले तक शिक्षा के राष्ट्रीय ग्राफ पर लगातार नीचे गिर रहा था, उसने आज नीति आयोग की शिक्षा गुणवत्ता रिपोर्ट 2026 में केरल, दिल्ली और महाराष्ट्र जैसे राज्यों को पछाड़कर देश में पहला स्थान हासिल कर लिया है. यह बदलाव रातों-रात नहीं आया, बल्कि इसके पीछे प्राथमिकताओं और नीतियों का एक बड़ा बदलाव है.
यदि हम पंजाब के पिछले एक दशक के सफर को देखें, तो समझ आता है कि सही नीयत और दिशा क्या कर सकती है. अकाली दल के शासनकाल (2016-17) के दौरान पंजाब शिक्षा के मामले में देश में 22वें स्थान पर संघर्ष कर रहा था. इसके बाद आई कांग्रेस सरकार के दौरान स्थिति सुधरने की बजाय और बिगड़ गई. साल 2018-19 में पंजाब 26वें और साल 2020 आते-आते गिरकर 27वें पायदान पर पहुंच गया.
पंजाब ने 27वें स्थान से सीधे नंबर 1 का सफर किया तय
उस दौर में पंजाब के लाखों गरीब और मध्यमवर्गीय माता-पिता के सामने अपने बच्चों के भविष्य को लेकर एक बड़ा सवालिया निशान था. टूटी दीवारें, बिजली की किल्लत और संसाधनों के अभाव के बीच सरकारी स्कूलों के बच्चे निजी स्कूलों से मुकाबला करने की स्थिति में नहीं थे, लेकिन साल 2022 में पंजाब की जनता ने बदलाव की कमान 'आम आदमी पार्टी' को सौंपी और मात्र 4 वर्षों के भीतर राज्य ने 27वें स्थान से सीधे नंबर 1 का सफर तय कर दिखाया है.
केरल को पछाड़ कर पंजाब ने मारी बाजी
नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट के आंकड़े इस ऐतिहासिक बदलाव की गवाही खुद देते हैं. प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर पंजाब ने देश के सबसे साक्षर राज्य माने जाने वाले केरल को भी पीछे छोड़ दिया है. पंजाब के बच्चों ने भाषा दक्षता में 82 प्रतिशत स्कोर किया है, जबकि केरल 75 प्रतिशत पर सिमट गया. तीसरी कक्षा के गणित में पंजाब ने 78 प्रतिशत अंक हासिल किए, जबकि केरल 70 प्रतिशत ही ला सका. हाई स्कूल के स्तर पर भी पंजाब का प्रदर्शन 52 प्रतिशत रहा, जो केरल के 45 प्रतिशत से कहीं बेहतर है. ये आंकड़े साफ करते हैं कि पंजाब के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की बुनियादी नींव अब देश में सबसे मजबूत हो रही है.
हरियाणा और अन्य पड़ोसी राज्यों से बहुत आगे
आज पंजाब के 99.9 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में न सिर्फ बिजली कनेक्शन है, बल्कि 99 प्रतिशत स्कूलों में वर्किंग कंप्यूटर लैब्स हैं. इसके अलावा राज्य के 80 प्रतिशत से अधिक स्कूलों को स्मार्ट क्लासरूम में बदला जा चुका है. अगर इसकी तुलना पड़ोसी राज्य हरियाणा से की जाए, तो अंतर साफ नजर आता है. हरियाणा में पिछले 12 वर्षों से भाजपा की सरकार है, लेकिन वहां स्मार्ट क्लासरूम की उपलब्धता सिर्फ 50.3 प्रतिशत है, जबकि पंजाब में यह 80.1 प्रतिशत है. इंटरनेट कनेक्टिविटी के मामले में भी पंजाब 88.9 प्रतिशत के साथ हरियाणा (78.9 प्रतिशत) से काफी आगे है. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि हरियाणा का सबसे समृद्ध शहर 'गुरुग्राम' भी शिक्षा के इन पैमानों पर पंजाब के सबसे पिछड़े जिलों के मुकाबले पीछे नजर आता है.
ग्लोबल ट्रेनिंग और राष्ट्रीय परीक्षाओं में फहराया परचम
मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान की अगुवाई में पंजाब सरकार ने शिक्षा को सिर्फ एक विभाग नहीं, बल्कि एक जन आंदोलन बना दिया है. राज्य के सरकारी स्कूल के शिक्षकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग के लिए फिनलैंड और सिंगापुर जैसे देशों में भेजा गया. इसका सीधा असर बच्चों के नतीजों पर दिख रहा है. हाल ही में सरकारी स्कूलों के 786 छात्रों ने JEE Main और 1,284 छात्रों ने NEET जैसी कठिन राष्ट्रीय परीक्षाओं को पास करके यह साबित कर दिया है कि अगर सही अवसर मिले, तो सरकारी स्कूल के बच्चे भी देश के सबसे बड़े संस्थानों में जगह बना सकते हैं. राज्य में अत्याधुनिक और सर्वसुविधायुक्त विशेष स्कूल स्थापित किए गए हैं. शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए 13,000 से ज्यादा शिक्षकों और सहायक स्टाफ की पारदर्शी तरीके से भर्ती की गई. लगभग 3 लाख छात्रों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए विशेष अंग्रेजी भाषा कार्यक्रम चलाया जा रहा है.
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आज अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे विकसित देशों की तरह पंजाब भी उस मॉडल पर काम कर रहा है जहां सरकारी शिक्षा को सबसे बेहतर और विश्वसनीय माना जाता है. पंजाब के गांवों में अब माता पिता गर्व से कहते हैं कि उनका बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़ रहा है. यह बदलाव किसी खोखले नारे या विज्ञापन से नहीं, बल्कि स्कूलों की चमचमाती इमारतों, तकनीक से लैस क्लास रूम और बच्चों के चेहरे पर दिखते आत्मविश्वास से आया है. पंजाब की यह सफलता देश के अन्य राज्यों के लिए एक संदेश है कि जब सरकार की नीयत साफ हो और प्राथमिकता में शिक्षा हो, तो बरसों पुराना पिछड़ापन कुछ ही सालों में दूर किया जा सकता है.
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