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Asmita Dey: 'जब पापा गए तो लगा सब खत्म हो गया', जूडो में गोल्ड जीतने के बाद छलक पड़ा अस्मिता का दर्द

Asmita Dey: 22 मार्च 2003 को त्रिपुरा के बेलोनिया में जन्मीं अस्मिता तीन भाई-बहनों के साथ एक साधारण परिवार में पली-बढ़ीं. उनके पिता, अर्जुन कुमार डे, साइकिल ठीक करके गुजारा करते थे

Asmita Dey: 'जब पापा गए तो लगा सब खत्म हो गया', जूडो में गोल्ड जीतने के बाद छलक पड़ा अस्मिता का दर्द
Asmita Dey Story

Asmita Dey: भारतीय जूडाक अस्मिता डे ने ग्लासगो में आयोजित कॉमवेल्थ खलों के नौवें  दिन जूडो में गोल्ड जीतकर इतिहास रच दिया था. अस्मिता डे के लिए कॉमनवेल्थ चैंपियन बनने का सफर आसान नहीं था. . उनके पिता अर्जुन कुमार डे एक साइकिल रिपेयरिंग की दुकान चलाते, ऐसे में जब अस्मिता ने गोल्ड जीता तो उनके आंखों में आंसू थे. अपने पिता के संघर्ष को याद कर अस्मिता भावुक हो गई. 

7 महीने पहले ब्रेन स्ट्रोक से पिता का हुआ निधन, पिता को याद कर हुईं भावुक

कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने की खबर सबसे पहले जिस व्यक्ति को बताना चाहती थीं, उन्हें वे अब यह बता नहीं सकती थीं. उनके पिता, जो एक साइकिल मैकेनिक थे और दिन में मुश्किल से 300 रुपये कमाते थे और त्रिपुरा के एक छोटे से गांव में मिट्टी के घर में अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे, उनका 7 महीने पहले ब्रेन स्ट्रोक से निधन हो गया था. शुक्रवार को, जब 23 साल अस्मिता महिलाओं के 48 किग्रा वर्ग में कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय जुडोका बनीं, तो उन्हें लगा कि यह मेडल जितना उनका है, उतना ही उनके पिता का भी है.

अपनी ऐतिहासिक जीत के बाद आंसू रोकते हुए अस्मिता ने कहा, "जब मेरे पिता का निधन हुआ, तो मुझे लगा कि सब कुछ खत्म हो गया है क्योंकि वही मेरा साथ देते थे. "मैं त्रिपुरा के एक बहुत छोटे से गांव से हूं,  वहां के लोग इतने बड़े सपने नहीं देखते.. लेकिन पापा ने हमेशा मेरा साथ दिया."

रनिंग ट्रैक से जूडो मैट तक

22 मार्च 2003 को त्रिपुरा के बेलोनिया में जन्मीं अस्मिता तीन भाई-बहनों के साथ एक साधारण परिवार में पली-बढ़ीं. उनके पिता, अर्जुन कुमार डे, साइकिल ठीक करके गुजारा करते थे. खेल की दुनिया में उनकी एंट्री दौड़ने से हुई. उन्होंने 800 मीटर दौड़ में हिस्सा लिया और जिला-स्तर के ट्रायल्स तक पहुंचीं. एक कोच के जरिए जूडो से हुई मुलाकात ने सब कुछ बदल दिया. जो चीज एक ट्रायल सेशन के तौर पर शुरू हुई थी, वह धीरे-धीरे उनका मुख्य रास्ता बन गई. 

उनकी शुरुआती ट्रेनिंग बेलोनिया विद्यापीठ कोचिंग सेंटर में कोच बीना देबनाथ की देखरेख में हुई. बाद में वह माणिक लाल देब के अंडर त्रिपुरा स्पोर्ट्स स्कूल चली गईं. स्कूल प्रतियोगिताओं और खेलो इंडिया सर्किट में शानदार प्रदर्शन की वजह से उन्हें 2018 में भोपाल स्थित स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के रीजनल सेंटर में जगह मिली. वहां, अनुभवी कोच यशपाल सोलंकी ने उन्हें नेशनल सेटअप और 'टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम' के डेवलपमेंट ग्रुप तक पहुंचने में मदद की. 

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