Who is Asmita Dey: अक्सर सितारों की भीड़ कुछ 'छोटे नाम' ऐसा कमाल कर देते हैं कि बड़ों-बड़ों की आंखें खुली रह जाती है. और कुछ ऐसा ही भारतीय जूडाक अस्मिता डे ने ग्लासगो में आयोजित कॉमवेल्थ खलों के नौवें दिन शुक्रवार को जूडो में 48 किग्रा भार वर्ग में त्रिपुरा की अस्मिता डे ने कर दिया. अस्मिता ने कनाडाई प्रतिद्वंद्वी हेइडी क्वाच को 2-1 मात देने के साथ ही कॉमनवेल्थ खेलों में भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक जीतने के साथ ही इतिहास रच दिया. और साइकिल रिपेयर करने वाली पिता के लिए यह उपलब्धि कितनी बड़ी है, यह सहज ही समझा जा सकता है. और त्रिपुरा से इस स्वर्णिम यात्रा तक अस्मिता ने कितना त्यागा और संघर्ष किया है, यह भी समझा जा सकता है.
पिता चलाते हैं साईकिल रिपयेरिंग की दुकान
अस्मिता का जन्म त्रिपुरा के दक्षिण त्रिपुरा जिले के जिला मुख्यालय बेलोनिया में एक बेहद सामान्य और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में हुआ. उनके पिता अर्जुन कुमार डे एक साइकिल रिपेयरिंग की दुकान चलाते हैं. और वह कुल मिालकर परिवार में तीन भाई-बहन हैं. सीमित आय और तंगहाली के बावजूद उनके पिता ने बच्चों को पालने-पोसने और पढ़ाने-लिखाने के लिए बहुत कड़ा संघर्ष किया, लेकिन संसाधनों की कमी का असर अस्मिता के सपनों पर नहीं पड़ा, क्योंकि उनके पिता ने हर कदम पर उनका हौसला बढ़ाया.
Glasgow, Scotland: India's Asmita Dey clinched the Women's 48kg Judo gold medal at the Commonwealth Games 2026, defeating Canada's Heidi Quach in a thrilling final
— IANS (@ians_india) July 31, 2026
She says, "Today, my mindset was simply that I am the best in 48 kg today, and I must win gold—for my country, for… pic.twitter.com/l2o7ToDe6f
एक सलाह ने बदल दी दिशा
बचपन में अस्मिता का झुकाव मुख्य रूप से एथलेटिक्स की तरफ था. शुरुआत में 800 मीटर दौड़ उनका पसंदीदा इवेंट हुआ करता था और उन्होंने जिला स्तर के ट्रायल्स में भी सफलता पाई थी. लेकिन खेल के दिनों में ही उनके एक कोच की नजर उनकी फुर्ती और शारीरिक क्षमता पर पड़ी. उन्होंने अस्मिता को एथलेटिक्स से हटकर जूडो अपनाने की सलाह दी. और यहीं उनके जीवन की दिशा-दशा पूरी तरह बदल गई.
जीवन का टर्निंग पॉइंट बना भोपाल आना
अस्मिता के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साल 2015 में आया, जब उन्होंने त्रिपुरा स्पोर्ट्स स्कूल में प्रवेश लिया. वहां उन्होंने पहले कोच बिना देबनाथ और बाद में कोच माणिक लाल देब के मार्गदर्शन में जूडो की बारीकियां सीखनी शुरू कीं.स्कूल स्तर और 'खेलो इंडिया' सर्किट में उनके शानदार प्रदर्शन ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई. इसके बाद उन्हें भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के भोपाल क्षेत्रीय केंद्र में ट्रेनिंग के लिए चुन लिया गया. घर से हजारों किलोमीटर दूर भोपाल में राष्ट्रीय स्तर की विश्व-स्तरीय ट्रेनिंग सुविधाएं मिलना उनके करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, जिससे उनके खेल में निखार आया.
अंतरराष्ट्रीय सफलताएं
कॉमनवेल्थ में गोल्ड जीतने से पहले अस्मिता ने जुलाई 2022 में बैंकॉक में आयोजित एशियाई कैडेट और जूनियर जूडो चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने इतिहास रचा. यह किसी भी त्रिपुरा के खिलाड़ी द्वारा जूडो में जीता गया पहला अंतरराष्ट्रीय पदक था. इसके बाद उन्होंने मकाऊ में आयोजित 'जूनियर एशिया कप' (2023) और 'खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स' में स्वर्ण पदक जीते, तो 'कुवैत सिटी एशियन ओपन' में उन्होंने रजत पदक अपने नाम किया. इसी शानदार और नियमित प्रदर्शन ने अस्मिता को भारत सरकार की 'टारगेट ओलिंपिक पोडियम स्कीम' (TOPS) का हिस्सा बना दिया.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं