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असम में तीन गोगोई मिलकर हिमंता बिस्वा सरमा को दे पाएंगे टक्कर

असम विधानसभा चुनाव में तीनों गोगोई पहली बार एक साथ आए हैं. कांग्रेस, रायजोर दल और असम जातीय परिषद का गठबंधन कई सीटों पर मुकाबला बदल सकता है.

असम में तीन गोगोई मिलकर हिमंता बिस्वा सरमा को दे पाएंगे टक्कर
  • असम में गौरव गोगोई, लुरिनज्योति गोगोई और रायजोर दल के अखिल गोगोई एक साथ चुनाव लड़ रहे हैं
  • अखिल गोगोई ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से राजनीति में प्रवेश किया और 2021 में शिवसागर से विधायक चुने गए थे
  • लुरिनज्योति गोगोई असम जातीय परिषद के प्रमुख हैं, जो छह जातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाना चाहते हैं
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ये कहानी है असम के विधानसभा चुनाव लड़ रहे तीन गोगोई की.अभी तक ये तीनों गोगोई अलग-अलग चुनाव लड़ रहे थे मगर इस बार इकट्ठा हो गए हैं. यहां बात हो रही है कांग्रेस के असम के अध्यक्ष गौरव गोगोई की, जो 43 साल के हैं. असम जातीय परिषद के लुरिनज्योति गोगोई, वो भी 43 साल के हैं और रायजोर दल के अखिल गोगोई की जो 50 साल के हैं. गौरव गोगोई कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं और राज्यसभा के सांसद हैं. लोकसभा में पार्टी के उपनेता हैं. उनके पिता तरूण गोगोई असम के तीन बार के मुख्यमंत्री रह चुके हैं.

अखिल‑लुरिनज्योति का आंदोलन से जुड़ा सफर

अखिल गोगोई असम में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाते हुए राजनीति में आए. सूचना के अधिकार के लिए आंदोलन करते रहे. अखिल ने असम में कृषक मुक्ति संग्राम समिति बनाई. साल 2020 में रायजोर दल बनाया और 2021 में शिवसागर से विधायक चुने गए. लुरिनज्योति गोगोई डिब्रूगढ़ से आते हैं और दिसंबर 2019 में असम में क्षेत्रीयतावादी भावनाएं चरम पर पहुंचने के साथ ही, सीएए पारित होने पर गोगोई की लोकप्रियता भी तेजी से बढ़ी और वे संशोधित कानून के विरोध के प्रमुख चेहरों में से एक बनकर उभरे.

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AASU से पार्टी तक, अहोम बेल्ट पर नजर

पिछले साल नवंबर में, जब गोगोई ने प्रभावशाली ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (एएएसयू) के महासचिव पद से इस्तीफा देकर चुनावी राजनीति में कदम रखा और असम जातीय परिषद बनाई. लुरिनज्योति गोगोई का नारा है 6 जातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाना और चाय बागानों में काम करने वालों को बेहतर वेतन दिलवाना. ये तीनों गोगोई के साथ आने से उपरी असम के 40-45 सीटों पर असर पड़ेगा जहां अहोम जाति का प्रभाव है.गोगोई अहोम जाति से ही आते हैं.

सीट शेयरिंग से बदला सियासी खेल

तीनों गोगोई के साथ आने पर असम में इतनी चर्चा क्यों हो रही है और इसे गेम चेंजर क्यों कहा जा रहा है, इसका भी कारण है. कांग्रेस ने अखिल गोगोई की रायजोर दल को 11 और लुरिनज्योति गोगोई के असम जातीय परिषद को 10 सीटें दी है. यदि आप पिछले चुनाव के आंकडों को देखें तो असम में एनडीए को 44.50 फीसदी वोट मिले थे और कांग्रेस वाले विपक्षी गठबंधन को 43.7 फीसदी यानी दोनों गठबंधन के बीच वोटों का अंतर काफी कम था मगर सीटों में 25 का फासला.

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वोट गणित और निर्णायक सीटें

पिछले चुनाव में असम जातीय परिषद 82 सीटों पर लड़ी थी और उसे 3.7 फीसदी वोट मिले थे जबकि रायजोर दल 29 सीट पर लड़ी थी और उसे 1.5 फीसदी वोट मिले थे. यही नहीं 14 ऐसी सीटें जहां कांग्रेस हारी थी इन दोनों दलों को हार जीत के अंतर से अधिक वोट मिले थे. यानी यदि इन दोनों दलों से कांग्रेस का गठबंधन होता तो कांग्रेस उन 14 सीटों पर नहीं हारती. यही नहीं कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में डिब्रूगढ़ सीट लुरिनज्योति के लिए छोड़ दी थी और उस चुनाव में लुरिनज्योति ने सर्वानंद सोनोवाल के खिलाफ 4 लाख से ज्यादा वोट पाए थे.

AIUDF से दूरी, ध्रुवीकरण रोकने की कोशिश

पिछले चुनाव में बदरूद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा थी जो इस बार नहीं है. कांग्रेस की रणनीति है कि बदरूद्दीन अजमल से दूरी बना कर वह वोटों के ध्रुवीकरण को रोक पाएगी और असम की जातीय और जनजातीय हिंदु वोटों को अपने तरफ करने में सफल रहेगी. जिसमें अखिल गोगोई और लुरिनज्योति गोगोई कारगर साबित हो सकते हैं. इससे हाशिए पर खड़े वोटरों को एक संदेश है कि विपक्ष इकट्ठा है साथ ही इससे यह भी तय हो गया है कि इक बार असम में कोई तीसरा मोर्चा नहीं है और बीजेपी को सभी 126 सीटों पर एकजुट विपक्ष का सामना करना पड़े.

छह दलों का गठबंधन, सीधी लड़ाई BJP से

कांग्रेस अपने दो बड़े नेता भूपेन वोरा और प्रद्युत बोरदोलोई के पार्टी छोड़ने के झटके से उबरने की कोशिश कर रही है और उसकी भरपाई के लिए ही तीनों गोगोई को इकट्ठा किया गया है और एक मजबूत गठबंधन बनाया गया है. कांग्रेस ने असम में 6 दलों का गठबंधन बनाया है जिसमें रायजोर दल,असम जातीय परिषद,सीपीएम,ऑल इंडिया हिल्स लीडर्स कांफ्रेंस और माले शामिल है.असम में एक ही फेज में 9 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे.

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