मध्यप्रदेश के इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट लटके, कहीं लोग जोखिम उठा रहे; कहीं हो रहे आंदोलन

मध्यप्रदेश में मॉनसून से पहले ही 3500 किलोमीटर सड़कें बदहाल हो चुकी थीं, लोक निर्माण विभाग ने दावा किया कि प्रदेश के 50 जिलों में करीब 609 निर्माण कार्य शुरू किए गए

मध्यप्रदेश के इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट लटके, कहीं लोग जोखिम उठा रहे; कहीं हो रहे आंदोलन

मध्यप्रदेश के सागर में पानी से भरी सड़क पर जोखिम उठाकर शवयात्रा निकालते हुए लोग.

भोपाल:

देश के दूसरे हिस्सों की तरह मध्यप्रदेश के भी कई गांवों में छोटे-बड़े पुल-पुलिया, चुनावी भाषण में जोर शोर से बनते हैं, फिर नेताजी सत्ता में आ जाते हैं और वो पुल-पुलिया कभी नहीं बनते हैं, या सालों की देर होती है. मध्यप्रदेश में मॉनसून से पहले ही 3500 किलोमीटर सड़कें बदहाल हो चुकी थीं. लोक निर्माण विभाग ने दावा किया कि प्रदेश के 50 जिलों में करीब 609 निर्माण कार्य शुरू किए गए हैं. इनमें पुल-पुलियाओं के साथ सड़क निर्माण से लेकर मरम्मत के कार्य भी हैं.10 हजार 795 करोड़ रुपये की लागत वाले इन निर्माण कार्यों पर सात हजार से अधिक श्रमिक तैनात किए गए हैं.
      
इन दावों के बीच तस्वीरें सागर से आईं जहां चार फीट बहते पानी के बीच, जान जोखिम में डालकर लोगों ने झांसी गेट अंडर ब्रिज से शवयात्रा निकाली. वजह इलाके में ओवरब्रिज का काम महीनों से बंद हैं. लोगों को मजबूरी में यहां से गुजरना होता है.

ये तो कुछ महीनों की लेटलतीफी का मामला है, आदिवासी बहुल छिंदवाड़ा के निमनी गांव में डेढ़ सौ लोगों के खेत जिरौरा गांव में हैं लेकिन वहां पहुंचने के लिए न कोई रास्ता है और न ही कोई पुल है. निमनी गांव और जिरौरा गांव के बीच से होकर कन्हान नदी निकलती है. सालों बीत गए यहां से मुख्यमंत्री भी बन गए, छिंदवाड़ा मॉडल का खूब ढोल पीटा गया लेकिन यहां के लोग गोल आकर की तुम्बा लौकी को सुखाकर नदी का तेज बहाव पार करते हैं. ये रास्ता बेहद जोखिम भरा है. पिछले साल तुंबा पलटने से दो लोगों की मौत भी हो चुकी है. यहां से गुजरने वाले ग्रामीण विनायक कहते हैं, शिवराज सिंह से हमने कहा था हमको पुलिया बना दें, वो देखने आए थे लेकिन कुछ नहीं हुआ. खेत के लिए ऐसे ही जाना पड़ता है, नहीं तो खेती कैसे करेंगे.

वहीं इलाके से कांग्रेस विधायक विजय चौरे अपनी निधि से नाव का गिफ्ट देकर खुश हैं, कहते हैं 2-3 बार टीमें आई हैं. दुर्भाग्य रहा कांग्रेस की सरकार चली गई कोविड की वजह से काम रुका है. विधायक निधि से नाव गिफ्ट की है उससे लोग काम चला रहे हैं.
    
पड़ोसी बालाघाट में भी कुछ ऐसा ही नजारा है, टांडा दी उफान पर है जिससे लांजी सालेटेकरी मार्ग बंद है. ऐसे में लोग जान जोखिम में डालकर पुल पार कर रहे हैं क्योंकि दो साल से पुल निर्माण का काम अधूरा है.

इसी बालाघाट में नैरो गेज की रेल लाइन धीरे-धीरे ऐतिहासिक धरोहर बन गई. ब्रॉडगेज ने आकार ले लिया लेकिन एक दशक से काम बिल्कुल छुक छुककर ही आगे बढ़ रहा है. 23 साल पहले नींव पड़ी, लेकिन 17 साल से काम लगभग बंद जैसा ही रहा. बन जाता तो दक्षिण से पूर्व को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण रेल रूट से लाखों की आबादी वाले आदिवासी बहुल मलाजखण्ड को विकास के नए आयाम मिलते. ब्रॉडगेज संघर्ष समिति के अध्यक्ष अनूप सिंह बैंस कहते हैं कि बालाघाट लामटा के बीच बहुत धीमी गति से काम चल रहा है. 20 साल से हम लोग आंदोलन कर रहे हैं. ये बन जाता तो उत्तर से दक्षिण को जोड़ने वाला मार्ग है जिससे 273 किलोमीटर फेरा लगाकर गाड़ियां जाती हैं वो दूरी कम हो जाती. बालाघाट से देश की रेलें गुजरें इसलिए जल्द से जल्द इसे पूर्ण कराना चाहिए.

सांसद ढाल सिंह बिसने के पास लॉकडाउन का बहाना है. वे कहते हैं, लॉकडाउन के कारण से गड़बड़ी आई, लेकिन वो गति नहीं है जो पहले थी आप भी समझते हैं उतने मजदूर नहीं हैं हम लोग कोशिश कर रहे हैं.

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वैसे जहां निर्माण हो गया, मसलन गुना के सरकारी अस्पताल में यहां लिया जाना तो कोरोना सैंपल था, लेकिन बिचारे बैलों को छांव मिल रही है. हाथ टंगे ही रह गए जिसे देखकर अस्पताल परिसर में घूम रहे आवारा कुत्ते भी नहीं भाग रहे.