- मध्य प्रदेश में टीबी मरीजों को मिलने वाली 1000 रुपये की पोषण सहायता पांच महीने से अधिक समय से नहीं मिल रही है
- आर्थिक रूप से कमजोर परिवार मरीजों के लिए पौष्टिक भोजन जुटाने में गंभीर कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं
- टीबी के इलाज के साथ ही अच्छा पोषण भी आवश्यक है, क्योंकि कुपोषण से इलाज की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है
Health Department MP: मध्य प्रदेश में हजारों टीबी मरीजों के लिए जानलेवा बीमारी से लड़ाई अब भूख से जंग में बदलती जा रही है. सरकार की 'निक्षय पोषण योजना' के तहत मिलने वाली 1000 रुपये की मासिक सहायता पिछले करीब पांच महीनों से कई मरीजों तक नहीं पहुंची है. इस देरी की वजह से पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर परिवार मरीज के लिए बुनियादी फल-दूध और अच्छा खाना जुटाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. बीमारी के कारण काम करने में असमर्थ कई मरीजों का कहना है कि पैसा न मिलने से वे बेहद सीमित भोजन पर गुज़ारा करने को मजबूर हैं.
मरीजों की जुबानी: उम्मीद और लाचारी का दर्द
बीमारी से जूझ रही खुर्शीद का कहना है कि उनके घर में कमाने वाले पति और दो बेटे हैं, लेकिन इलाज के दौरान मिलने वाली सरकारी मदद का एक रुपया भी अभी तक उनके खाते में नहीं आया है. यह वही पैसा है जिससे उन्हें बेहतर डाइट की उम्मीद थी. एक अन्य मरीज ने बताया कि काम बंद होने के कारण वह पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हैं. वहीं, अपने पिता का इलाज करा रहे दिलीप थापा कहते हैं कि अगर 1000 रुपये समय पर मिल जाते, तो वे पिता को फल और अच्छा खाना दे पाते, लेकिन महीनों से इंतजार ही कर रहे हैं.

इलाज के दौरान मिलने वाली सरकारी मदद का एक रुपया भी नहीं मिलने से मरीजों के सामने पोषण का संकट खड़ा हो गया है.
इलाज के साथ पोषण है सबसे बड़ी जरूरत
मेडिकल विशेषज्ञों का मानना है कि टीबी के इलाज में जितनी जरूरी दवाएं हैं, उतना ही जरूरी अच्छा पोषण भी है. कुपोषण के कारण शरीर की रिकवरी धीमी हो जाती है और दवाएं शरीर पर बुरा असर डाल सकती हैं. दिहाड़ी मजदूरी करने वाली पलकी बाई, जो दो बार टीबी झेल चुकी हैं, बताती हैं कि बीमारी ने उनकी कमर तोड़ दी है. जांच तो सरकारी अस्पताल में हो गई, लेकिन खान-पान के लिए अब उनके पास पैसे नहीं बचे हैं.
आंकड़ों और जमीनी हकीकत में बड़ी खाई
निक्षय पोषण योजना के तहत हर टीबी मरीज को, चाहे वह अमीर हो या गरीब, इलाज चलने तक हर महीने 1000 रुपये सीधे बैंक खाते (DBT) में देने का नियम है. लेकिन नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. राज्य में करीब 1.76 लाख टीबी मरीज पंजीकृत हैं, जबकि सहायता राशि केवल 15,228 मरीजों तक ही पहुंच पाई है. यानी एक बड़ी आबादी अभी भी इस हक से वंचित है या उन्हें महीनों की देरी से भुगतान मिल रहा है.

मध्यप्रदेश में टीबी के हजारों मरीजों को करीब 5 महीने से पोषण का पैस नहीं मिला है. इसके लिए वे सरकारी दफ्तों के चक्कर काट कर भी परेशान हो रहे हैं.
तकनीकी दिक्कतें और सरकारी सफाई
अधिकारियों का कहना है कि भुगतान में हो रही इस रुकावट के पीछे पोर्टल का तकनीकी अपग्रेडेशन एक बड़ी वजह है. नेशनल टास्क फोर्स ऑन टीबी के सदस्य डॉ. देवेंद्र गौर के अनुसार, कई बार मरीजों के बैंक खाते आधार से लिंक नहीं होते या विवरण अधूरे होते हैं, जिससे पैसा अटक जाता है. हालांकि, जीएमसी के प्रोफेसर डॉ. लोकेन्द्र दवे भी मानते हैं कि गरीब मरीजों के लिए भोजन की व्यवस्था करना कठिन होता है और फंड जारी होने में देरी उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकती है.
लक्ष्य बड़ा पर चुनौतियां भी कम नहीं
केंद्र सरकार ने भारत को टीबी मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा है, लेकिन जानकारों का कहना है कि यह लक्ष्य केवल दवाओं से हासिल नहीं होगा. जब तक मरीजों को समय पर पोषण सहायता नहीं मिलेगी, तब तक यह लड़ाई अधूरी रहेगी. मध्य प्रदेश के हजारों मरीजों के लिए फिलहाल यह बीमारी से ज्यादा खाली पेट की लड़ाई बन गई है, जिसमें वे सिस्टम की फाइलों में अटके अपने हक का इंतजार कर रहे हैं.
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