इस वर्ष का जून महीना पिछले 126 वर्षों के मौसम इतिहास में पांचवां सबसे सूखा जून साबित हुआ है. इस साल मानसून की सुस्त चाल और बीच-बीच में लंबे समय के लिए बारिश पर ब्रेक के कारण महाराष्ट्र में सामान्य से 40 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है. मॉनसून की बेरुखी ने राज्य में कृषि, पेयजल आपूर्ति और जलस्रोतों को लेकर एक बड़ा और गंभीर संकट खड़ा कर दिया है.
मराठवाड़ा की जमीनी हकीकत
महाराष्ट्र के पारंपरिक सूखा प्रभावित क्षेत्र के रूप में पहचाने जाने वाले मराठवाड़ा में स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक बनी हुई है. पूरा जून महीना बीत जाने के बावजूद अधिकांश इलाकों में किसान अब तक बुवाई नहीं कर पाए हैं. आसमान में रोज घने काले बादल मंडराते हैं, बारिश का माहौल भी बनता है, लेकिन बिना बरसे ही लौट जाते हैं. बादल उम्मीद तो जगाते हैं, मगर धरती अब भी बारिश की चंद बूंदों के इंतजार में पूरी तरह सूखी पड़ी है.
खेतों में धूल उड़ रही है और बारिश के अभाव में किसानों के चेहरों की चिंता लगातार गहरी होती जा रही है.
बुवाई के लिए क्यों तरस रहे हैं खेत?
कृषि विशेषज्ञों और किसानों के अनुसार, बीजों के सही अंकुरण और बुवाई के लिए जमीन के भीतर कम से कम आठ से नौ इंच तक नमी का होना अत्यंत आवश्यक है. मौजूदा जमीनी हकीकत यह है कि खेतों में नमी तो दूर, जमीन की ऊपरी सतह दो से तीन इंच तक की मिट्टी पूरी तरह सूखी और सख्त नजर आ रही है। ऐसे में बुवाई करना बीजों को बर्बाद करने के समान है.
किसानों का दर्द
गांव की चौपालों पर बैठे हताश किसानों और महिलाओं का कहना है कि प्रकृति उनके साथ आंख-मिचौली खेल रही है. हवाएं चलती है, काले बादलों से अंधेरा होता है, लेकिन बारिश की एक बूंद तक जमीन पर नहीं गिरती. हालात अब उस मुहाने पर पहुंच गए हैं, जहां समय तेजी से हाथ से फिसलता जा रहा है. अगर आने वाले एक सप्ताह के भीतर मराठवाड़ा में अच्छी और संतोषजनक बारिश नहीं हुई तो इस साल का पूरा कृषि सीजन (खरीफ की फसल) किसानों के हाथ से पूरी तरह निकल जाएगा.
यह संकट केवल खेतों तक सीमित नहीं रहेगा, बारिश के अभाव में भविष्य में इंसानों के लिए पीने के पानी और मवेशियों के लिए चारे और पानी की भयंकर समस्या खड़ी हो सकती है. फिलहाल किसान और प्रशासन, दोनों की निगाहें किसी चमत्कार की आस में आसमान की ओर ही टिकी हैं.
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