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2026 से 1893: मुंबई के इस गणपति पंडाल में टाइम ट्रैवल हकीकत बन जाता है

मुंबई का गणपति पंडाल, जो 10 दिनों के लिए लौटा देता है 19वीं सदी के बॉम्बे में; यहीं से हुई थी सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत

एक ऐसी चॉल, जहां गणपति बप्पा के साथ लौट आती है 1893 की मुंबई
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हालांकि टाइम ट्रैवल का कॉन्सेप्ट अभी हकीकत नहीं बना है, लेकिन मुंबई का एक गणपति पंडाल आपको अपने 10 दिन के जश्न के दौरान 19वीं सदी में ले जाता है. पंडाल में आने वाला कोई भी व्यक्ति मुंबई के उस हिस्से का अनुभव कर सकता है, जो शहर के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग है. यहां आप उस बॉम्बे को जी सकते हैं, जिसे ब्लैक एंड व्हाइट दौर की बॉलीवुड फिल्मों में दिखाया गया है. यह जगह दक्षिण मुंबई के गिरगांव में स्थित केशवजी नाइक चॉल है. इसे महाराष्ट्र में सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की जगह भी माना जाता है.

पहले शाही परिवार ही मनाते थे गणपति उत्सव

1893 से पहले गणपति उत्सव मुख्य रूप से घरों और शाही परिवारों में मनाया जाता था, लेकिन बाल गंगाधर तिलक ने ही इस उत्सव को सार्वजनिक रूप दिया. उनका मानना था कि भगवान गणेश की पूजा के लिए इकट्ठा होने वाले लोगों को सामाजिक मुद्दों और ब्रिटिश शासन के अत्याचारों पर चर्चा करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है. उनकी पहल पर पुणे और मुंबई में सार्वजनिक गणेशोत्सव आयोजित किए गए. पुणे में यह उत्सव दगडू सेठ हलवाई ने आयोजित किया, जबकि मुंबई में केशवजी नाइक चॉल के निवासियों ने तिलक के आह्वान पर एकजुट होकर इसका आयोजन किया.

कैसे मनता था गणपति उत्सव?

चॉल एक या दो मंजिला इमारत होती है, जिसकी छत पर मैंगलोरियन टाइलें लगी होती हैं. यहां परिवार छोटे-छोटे कमरों में रहते हैं और साझा सुविधाओं का उपयोग करते हैं. ऐसी चॉलों में रहने वाले अधिकांश लोग निम्न आय वर्ग से होते थे और मिलों, प्रिंटिंग प्रेस या फैक्ट्रियों में काम करके अपनी आजीविका चलाते थे. ये चॉलें 20वीं सदी के अंत तक मुंबई की पहचान का हिस्सा थीं। हालांकि, रियल एस्टेट के तेजी से विकास के कारण इनकी जगह ऊंची रिहायशी इमारतों ने ले ली. केशवजी नाइक चॉल उन कुछ आखिरी चॉलों में से एक है, जो आज भी अपने मूल स्वरूप में मौजूद है.

सिर्फ चॉल का ढांचा ही पुराना नहीं है, बल्कि यहां के निवासियों ने उस उत्सव की मूल भावना को भी सहेज कर रखा है, जैसा वह 1893 में पहली बार मनाया गया था. यहां स्थापित की जाने वाली 2 फीट ऊंची गणेश प्रतिमा आज भी उसी स्वरूप में बनाई जाती है. प्रतिमा को पंडाल तक लाने और विसर्जन के लिए ले जाने में ट्रक की बजाय पारंपरिक पालकी का उपयोग किया जाता है. आधुनिक बैंड और वेस्टर्न म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट्स की जगह ढोल, ताशा और मंजीरे की धुन सुनाई देती है. शाम के समय सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं.

भले ही गणेशोत्सव की शुरुआत यहीं से हुई और आज यह एक विशाल व्यावसायिक आयोजन का रूप ले चुका है, लेकिन केशवजी नाइक चॉल का उत्सव अब भी सादगी की मिसाल बना हुआ है. यही सादगी इसकी सबसे बड़ी पहचान है, जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी संभालकर रखा गया है.

हालांकि केशवजी नाइक चॉल के गणपति के दर्शन के लिए 'लालबागचा राजा' की तरह लाखों श्रद्धालु नहीं पहुंचते, फिर भी मुंबई के आधुनिक इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए यह जगह बेहद खास है. चॉल के कई पुराने निवासी आज शहर के दूसरे हिस्सों में बस चुके हैं, लेकिन पुरानी यादों के कारण वे हर साल गणेशोत्सव के दौरान गिरगांव लौटते हैं. यहां आकर उन्हें सिर्फ भगवान गणेश के दर्शन ही नहीं होते, बल्कि वे अपने अतीत, अपनी संस्कृति और पुराने बॉम्बे से भी दोबारा जुड़ जाते हैं.

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