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महाराष्ट्र को 'बेटा' चाहिए ? राज्य में 1000 लड़कों पर सिर्फ 888 बेटियां जबकि नेशनल एवरेज है 914

महाराष्ट्र में तरक्की के बीच गिरते लिंगानुपात (Sex Ratio) ने गंभीर चिंता बढ़ा दी है. सरकारी रिपोर्ट (SRS) के अनुसार राज्य में 1000 लड़कों पर सिर्फ 888 बेटियां जन्म ले रही हैं, जो नेशनल एवरेज (914) से बहुत कम है. हैरान करने वाली बात यह है कि गांवों के मुकाबले शहरों का हाल और भी बदतर (874) है, जिसे लेकर मई 2026 में विधानसभा में भी भारी हंगामा हुआ

महाराष्ट्र को 'बेटा' चाहिए ? राज्य में 1000 लड़कों पर सिर्फ 888 बेटियां जबकि नेशनल एवरेज है 914

Maharashtra Sex Ratio: महाराष्ट्र को देश के सबसे अमीर और आधुनिक राज्यों में गिना जाता है. मुंबई और पुणे जैसे चकाचौंध वाले शहर इसी राज्य में हैं. लेकिन इसी महाराष्ट्र की एक दूसरी तस्वीर भी है. यहां बच्चों के जन्म से जुड़े नए सरकारी आंकड़ों यानि SRS रिपोर्ट ने राज्य के अंधेरे पक्ष को सामने ला दिया है. आंकड़े बताते हैं कि साल 2020 से 2022 के बीच महाराष्ट्र में बेटियों के जन्म की रफ्तार देश के बाकी राज्यों के मुकाबले काफी धीमी रही. इस दौरान राज्य में हर 1,000 लड़कों के जन्म पर सिर्फ 899 लड़कियों ने जन्म लिया. वहीं अगर पूरे देश का औसत देखा जाए तो वह 918 है. इसका खुलासा खुद महाराष्ट्र विधानसभा में मई के आखिरी हफ्ते में रखी गई रिपोर्ट से हुआ. यानी इतनी आर्थिक तरक्की के बाद भी महाराष्ट्र देश के औसत आंकड़े से भी बहुत पीछे चल रहा है. यह साफ इशारा है कि समाज में आज भी बेटों और बेटियों को लेकर भेदभाव खत्म नहीं हुआ है. ये स्थिति क्यों है इसी रिपोर्ट में हम एक्सपर्ट्स की राय तो जानेंगे लेकिन पहले ये जान लेते हैं कि खुद सरकारी आंकड़े क्या कहते हैं?  

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शहरों का हाल गांवों से भी बुरा 

इस पूरी रिपोर्ट में जो बात सबसे ज्यादा हैरान और परेशान करती है, वो है शहरों और गांवों का फर्क. हम अक्सर यह मानकर चलते हैं कि शहरों में लोग ज्यादा पढ़े-लिखे हैं, वहां आधुनिक सुविधाएं हैं, तो बेटियों को लेकर सोच भी बेहतर होगी. लेकिन सरकारी आंकड़ों ने इस सोच को पूरी तरह गलत साबित कर दिया है. महाराष्ट्र के गांवों में स्थिति में पहले से काफी सुधार हुआ है. पिछले दशक में जहां गांवों का लिंगानुपात 888 था, वह अब सुधरकर 1,000 लड़कों पर 910 लड़कियों के जन्म तक पहुंच गया है. यानी गांवों की सोच बदल रही है. लेकिन जैसे ही हम चमक-दमक वाले शहरों की तरफ आते हैं, कहानी बिल्कुल उल्टी हो जाती है. शहरों में यह आंकड़ा सुधरने के बजाय और गिर गया है. पिछले दशक में शहरों का जो आंकड़ा 908 था, वह अब भारी गिरावट के साथ महज 885 पर आ गया है

यह स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है. क्या शहरों में आज भी 'बेटा ही चाहिए' वाली जिद ज्यादा हावी है? और सबसे बड़ा सवाल यह कि लिंग जांच (Sex Determination) के खिलाफ जो कड़े कानून बने हैं, क्या शहरों में गुपचुप तरीके से उनकी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं? कानून की सख्ती के बावजूद शहरों का यह हाल होना प्रशासन की मुस्तैदी पर भी सवाल उठाता है.

केरल और छत्तीसगढ़ ने मारी बाजी, उत्तराखंड सबसे पीछे

जब हम देश के दूसरे बड़े राज्यों पर नजर डालते हैं, तो पता चलता है कि आर्थिक रूप से पिछड़े माने जाने वाले कुछ राज्यों ने इस मोर्चे पर बहुत शानदार काम किया है. छत्तीसगढ़ इस लिस्ट में सबसे ऊपर है, जहां हर 1,000 लड़कों पर 978 बेटियों ने जन्म लिया है. इसके ठीक बाद केरल का नंबर आता है, जहां यह आंकड़ा 974 है. छत्तीसगढ़ और केरल जैसे राज्यों से महाराष्ट्र को बहुत कुछ सीखने की जरूरत है, जो पैसे के मामले में तो आगे हैं लेकिन बेटियों को बचाने में पीछे छूट गए हैं.
वहीं दूसरी तरफ, उत्तराखंड की हालत पूरे देश में सबसे ज्यादा खराब और चिंताजनक है. वहां जन्म के समय लिंगानुपात गिरकर महज 872 पर पहुंच गया है, जो पूरे देश में सबसे कम है. इसके अलावा हरियाणा (885) और देश की राजधानी दिल्ली (876) का हाल भी बेहद निराशाजनक है. 

डॉक्टरों की साठगांठ से 'गायब' हो रही हैं बेटियां: एक्सपर्ट

इस पूरे ट्रेंड को लेकर जब देश के जाने-माने अर्थशास्त्री, लेखक और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के पूर्व प्रोफेसर डॉ. वंदना सोनलकर से बात की गई, तो उन्होंने इस कड़वे सच से पर्दा उठाया. प्रोफेसर सोनलकर का कहना है, "महाराष्ट्र का यह पैटर्न कोई चौंकाने वाला नहीं है.

हम 1990 के दशक से ही जानते हैं कि केवल आर्थिक समृद्धि आने से लिंगानुपात में सुधार नहीं होता.प्रोफेसर सोनलकर ने साफ कहा, "शहरी महाराष्ट्र में लिंगानुपात के इतना कम होने की एक बड़ी वजह यह है कि वहां ऐसी तकनीकों तक लोगों की पहुंच बहुत आसान है, जिससे जन्म से पहले ही लिंग की पहचान कर ली जाती है या गर्भपात करा दिया जाता है.

हालांकि यह पूरी तरह से गैरकानूनी है, लेकिन सच यह है कि इस खेल में कई डॉक्टर भी सीधे तौर पर लोगों के साथ मिले हुए हैं.

छोटा परिवार, लेकिन बेटे की चाहत: एक नया खतरा

सरकार की ही रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र में अब लोग छोटे परिवार को अपना रहे हैं. वहां 'टोटल फर्टिलिटी रेट' (TFR) घटकर 1.5 हो चुका है. इसका सीधा सा मतलब है कि अब औसतन एक मां एक या दो बच्चों को ही जन्म दे रही है जबकि जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए यह रेट 2.1 होना चाहिए.जनसंख्या विशेषज्ञों का कहना है कि जब लोग परिवार छोटा रखना चाहते हैं, लेकिन उनके मन में यह जिद भी होती है कि 'कम से कम एक बेटा तो जरूर हो', तब बेटियों के जन्म का ग्राफ तेजी से गिरता है.  

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