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IIT बॉम्बे ने किया कमाल, बेकार चीजों को रसोई ईंधन में बदल दिया, 30-40 फीसदी हो रही LPG की बचत

Biomass Gasification: आईआईटी बॉम्बे ने गिरे हुए पत्तों और कैंपस के कचरे को कुकिंग ईंधन में बदलने का एक अनोखा तरीका विकसित किया है, जिससे LPG के इस्तेमाल में  30-40 फीसदी कमी लाई जा सकती है. जांच-पड़ताल और सुरक्षा परीक्षणों में खरी उतरे इस सिस्टम का इस्तेमाल आईआईटी बॉम्बे के कैंपस की कैंटीन में अब सफलतापूर्वक किया जा रहा है.

IIT बॉम्बे ने किया कमाल, बेकार चीजों को रसोई ईंधन में बदल दिया, 30-40 फीसदी हो रही LPG की बचत
IIT BOMBAY BIG BREAKTHROUGH AMID LPG CRISIS

IIT Bombay Inventions: आईआईटी बॉम्बे ने ईरान-इजराइल युद्ध के बीच पैदा हुए घरेलू कुकिंग गैस एलपीजी संकट के बीच एक अनोखा तरीका विकसित किया है, जिससे रसोई गैस की खपत में बड़ी कमी आएगी. दावा है कि नई तकनीक के LPG के इस्तेमाल में 30-40 फीसदी की कमी आएगी, जिसका इस्तेमाल आईआईटी बॉम्बे के कैंपस की कैंटीन में किया जा रहा है और एलपीजी के इस्तेमाल में कमी लाने में मदद मिली है. 

आईआईटी बॉम्बे ने गिरे हुए पत्तों और कैंपस के कचरे को कुकिंग ईंधन में बदलने का एक अनोखा तरीका विकसित किया है, जिससे LPG के इस्तेमाल में  30-40 फीसदी कमी लाई जा सकती है. जांच-पड़ताल और सुरक्षा परीक्षणों में खरी उतरे इस सिस्टम का इस्तेमाल आईआईटी बॉम्बे के कैंपस की कैंटीन में अब सफलतापूर्वक किया जा रहा है.

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साल 2014 में सबसे पहले सामने आया था बायोमास गैसीफिकेशन का विचार

गौरतलब है बेकार चीजों को घरेलू ईंधन में बदले का विचार सबसे पहले साल 2014 में सामने आया था, लेकिन शुरुआती परीक्षणों में कई बड़ी दिक्कतें मसलन बहुत ज़्यादा धुआं निकलना, सिस्टम में रुकावटें और कैंटीन के किचन के कर्मचारियों का विरोध शामिल है, लेकिन समय के साथ इसकी तकनीक में शोधकर्ता समस्याओं को दूर करने सफल हो गए और यह सिस्टम बेहिचक उपयोग में लाया जा सकेगा. 

बायोमास गैसीफिकेशन से LPG के इस्तेमाल में आई 30-40 फीसदी की कमी

रिपोर्ट के मुताबिक शुरूआती समस्याएं दूर होने के बाद यह सिस्टम जांच-पड़ताल में सही पाया गया और सुरक्षा परीक्षण में सफल होने के बाद आईआईटी बॉम्बे के कैंपस की कैंटीन में इसका सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे LPG के इस्तेमाल में 30–40 फीसदी तक कम करने में मदद मिली है. इसकी मदद से कम उत्सर्जन के साथ खाना पकाने का काम कुशलता से हो रहा है.

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इस तकनीक से लगभग 60 फीसदी थर्मल एफिशिएंसी प्राप्त होती है, जो पारंपरिक चूल्हों की तुलना में बहुत अधिक है. इस प्रोजेक्ट की शुरुआत 2014 में केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर संजय महाजनी ने की थी, जिससे साल 2017 में जुड़े ऊर्जा विज्ञान और इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर संदीप कुमार इसके बर्नर के डिजाइन में सुधार किया.

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व्यापक इस्तेमाल के लिए इनफिक्सन एनर्जी प्रा. लिमिटेड को दिया लाइसेंस

यह प्रोजेक्ट न सिर्फ़ ईंधन की लागत कम करता है, बल्कि कार्बन उत्सर्जन भी घटाता है, जिससे यह एक उपयोगी और टिकाऊ विकल्प बन गया है. अब इस प्रोजेक्ट को बड़े हॉस्टलों तक पहुंचाने की योजनाएं बनाई जा रही हैं, जहां इसके इस्तेमाल से काफ़ी मात्रा में एलपीजी की बचत हो सकती है और पर्यावरण को भी फ़ायदा पहुंच सकता है.

कार्बन उत्सर्जन को काफी हद तक कम करता है बायोमास गैसीफिकेशन

उल्लेखनीय है यह प्रोजेक्ट उदाहरण है कि कैसे शोध को ज़मीनी स्तर पर लागू करके असल दुनिया में बदलाव ला सकते हैं. यह सिस्टम कार्बन उत्सर्जन को सालाना लगभग 8 टन तक कम करता है और इसमें हानिकारक उत्सर्जन 20 ppm से भी कम रहता है. अगर इसे बड़े पैमाने पर छात्रावासों में लागू किया जाता है, तो इससे सालाना लगभग लाखों की बचत हो सकती है. 

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