- नीदरलैंड के मेयर फाल्गुन बिन्नेंडिज्क 40 साल बाद अपनी असली मां की तलाश में नागपुर लौटे हैं
- फाल्गुन का जन्म 1985 में नागपुर मेडिकल कॉलेज में हुआ था और उन्हें तीन दिन बाद मातृसेवा संघ को सौंपा गया
- उन्होंने महाभारत के कर्ण-कुंती की कहानी से प्रेरणा लेकर अपनी बेटी का नाम अपनी जैविक मां के नाम पर रखा
नागपुर: अपनी जड़ों से जुड़ने की तड़प और अपनी जन्म देने वाली मां को एक बार देख लेने की चाहत इंसान को सात समंदर पार खींच लाती है. यह कहानी है नीदरलैंड के हीम्स्टेडे (Heemstede) शहर के मेयर फाल्गुन बिन्नेंडिज्क की, जो 40 साल बाद अपनी असली पहचान की तलाश में महाराष्ट्र के नागपुर लौटे हैं. फाल्गुन का जन्म 10 फरवरी 1985 को नागपुर मेडिकल कॉलेज में हुआ था. उनकी मां उस समय मात्र 21 वर्ष की थीं और अविवाहित थीं. सामाजिक लोक-लाज और बदनामी के डर से उन्होंने अपने तीन दिन के कलेजे के टुकड़े को नागपुर की संस्था 'मातृसेवा संघ' (MSS) को सौंप दिया था. बाद में, एक डच दंपति ने उन्हें गोद लिया और वे नीदरलैंड चले गए.

महाभारत के 'कर्ण-कुंती' से मिली प्रेरणा
आज नीदरलैंड में एक सफल जीवन और राजनीतिक सम्मान पाने के बावजूद, फाल्गुन के मन में अपनी मां के प्रति कोई कड़वाहट नहीं है. वे कहते हैं, "महाभारत में कर्ण और कुंती की कहानी ने मेरे मन पर गहरा प्रभाव डाला. मेरा मानना है कि दुनिया के हर 'कर्ण' को उसकी 'कुंती' से मिलने का पूरा अधिकार है." उनकी इस भावना का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी बेटी का नाम भी अपनी जैविक मां के नाम पर रखा है.
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40 साल बाद मिला नाम देने वाला हाथ
फाल्गुन की यह तीसरी भारत यात्रा (2017 और 2024 के बाद) एक मायने में बहुत खास रही. उनकी मुलाकात मंगला भुसारी से हुई, जो मातृसेवा संघ की पूर्व अधीक्षिका हैं. यह मंगला भुसारी ही थीं, जिन्होंने 40 साल पहले इस अनाथ बच्चे का नाम 'फाल्गुन' रखा था. अपने नामकरण करने वाली महिला से मिलना फाल्गुन के लिए बेहद भावुक रहा, हालांकि मां का पता अब भी एक रहस्य बना हुआ है.

रिकॉर्ड्स में अधूरा पता बना बाधा
फाल्गुन के पास अपनी जन्मतिथि और मां का नाम तो है, लेकिन सामाजिक डर के कारण उनकी मां ने अस्पताल के रिकॉर्ड में अपना सही पता दर्ज नहीं कराया था. नागपुर के जिला अधिकारी, नगर निगम आयुक्त और महिला व बाल कल्याण विभाग की टीमें पुराने अस्पतालों और नागरिक निकायों के रिकॉर्ड खंगाल रही हैं. 40 साल पुराने दस्तावेजों में सटीक जानकारी न होने के कारण पुलिस और प्रशासन को उन्हें ढूंढने में काफी मुश्किल आ रही है.

मां के नाम संदेश: "मैं बोझ नहीं बनना चाहता"
फाल्गुन अपनी पत्नी और चार बच्चों के साथ नागपुर आए हैं. उन्होंने मीडिया के माध्यम से अपनी मां को एक बहुत ही संवेदनशील संदेश दिया है. "मैं अपनी मां पर कोई बोझ नहीं बनना चाहता. मैं बस उन्हें एक बार मिलकर यह बताना चाहता हूं कि उनका बेटा आज बहुत सुखी, सुरक्षित और सफल है. मैं सिर्फ उन्हें यह सुकून देना चाहता हूं कि उन्होंने जो फैसला लिया था, उसके बावजूद मैं एक अच्छी जिंदगी जी रहा हूं."
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