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बेरोजगारी का बहाना बनाकर बच्चों को गुजारा भत्ता देने से नहीं मुकर सकते पिता, बॉम्बे हाई कोर्ट का अहम फैसला

भारत में कानूनन 18 वर्ष से कम उम्र के सभी वैध और नाजायज बच्चे गुजारे-भत्ते के पूर्ण हकदार है और बालिग अविवाहित बेटियां तब तक पिता से गुजारा भत्ता पा सकती हैं, जब तक उनकी शादी नहीं हो जाती है.

बेरोजगारी का बहाना बनाकर बच्चों को गुजारा भत्ता देने से नहीं मुकर सकते पिता, बॉम्बे हाई कोर्ट का अहम फैसला
नागपुर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

Bombay High Court Verdict: बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने बच्चों के भरण-पोषण को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी पिता बेरोजगारी का बहाना बनाकर अपने बच्चों को गुजारा भत्ता देने की अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता है. हाई कोर्ट ने बच्चों को गुजारा भत्ता देने के आदेश को चुनौती देने वाली एक पिता की याचिका को सिरे से खारिज करते हुए इसे अनिवार्य बताया है.

मामला बुलढाणा का है, जहां की फैमिली कोर्ट ने एक व्यक्ति को अपने बेटे और बेटी के भरण-पोषण के लिए हर महीने 4,000-4,000 रुपए कुल 8,000 रुपए गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था. आदेश के खिलाफ पिता ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. बेरोजगारी की दलील देते हुए पिता ने कहा था कि वह बच्चों को पैसे देने में असमर्थ है.

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बच्चों के भरण-पोषण के लिए फैमिली कोर्ट ने सुनाया था 8 हजार रुपए देने का फैसला

गौरतलब है बेरोजगार पिता को फैमिली कोर्ट ने उसके दो बच्चों के भरण-पोषण के लिए 8 हजार रुपए प्रति माह गुजारा भत्ता देने का फैसला सुनाया था, जिसको पिता ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. बताया जाता है कि ऑटो-रिक्शा चालक पीड़ित ने हाल में अपनी ऑटो-रिक्शा बेच दी थी, जिसके कारण अब उसके पास कमाई का कोई जरिया नहीं बचा है.

पिता की अपील पर हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी, 'आप जिम्मेदारी से नहीं भाग सकते हैं'

मामले की सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने पिता की इन सभी दलीलों को अमान्य करते हुए कहा कि बच्चों का पालन-पोषण करना पिता की कानूनी और व्यक्तिगत जिम्मेदारी है. मामले की सुनवाई के दौरान उम्र का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि बच्चे अभी केवल 10 और 7 साल के हैं, इतनी छोटी उम्र में उनके पालन-पोषण और सुनहरे भविष्य की अनदेखी नहीं की जा सकती.

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हाई कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि बेरोजगारी का बहाना नहीं चलेगा. कोर्ट ने आगे कहा कि, बेरोजगारी या कम आमदनी होना, बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का कोई ठोस कारण नहीं हो सकता. अदालत ने यह भी नोट किया कि पिता ने पहले से तय की गई भरण-पोषण की राशि का भुगतान भी बच्चों को नहीं किया था.

'बच्चों के बुनियादी अधिकारों की जिम्मेदारी से समझौता नहीं किया जा सकता'

उल्लेखनीय है भारत में बच्चों का भरण-पोषण( गुजारा भत्ता) एक कानूनी अधिकार है, जो यह सुनिश्चित करता है कि माता-पिता के आपसी विवाद या तलाक के बाद बच्चों का पालन-पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य प्रभावित न हो. इस अहम फैसले से हाई कोर्ट ने साफ किया है कि वैवाहिक विवादों या परिस्थितियों के बावजूद, बच्चों के बुनियादी अधिकारों और उनके भरण-पोषण की जिम्मेदारी से समझौता नहीं किया जा सकता है.

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