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समुंदर फिर वापस आया... महाराष्ट्र में कमल की 'आंधी' के धुरंधर बने देवेंद्र फडणवीस

देवेंद्र फडणवीस का डंका केवल मुंबई नहीं बल्कि पूरे राज्य में बज रहा है. जहां पिछली बार बीजेपी 29 में से 15 निगमों पर क़ाबिज़ थी इस बार सहयोगियों के साथ यह आंकड़ा 23 के भी पार जा रहा है. यह प्रचंड जीत बता रही है कि कैसे महाराष्ट्र में विपक्षी पूरी तरह से सफाया हो गया.

समुंदर फिर वापस आया... महाराष्ट्र में कमल की 'आंधी' के धुरंधर बने देवेंद्र फडणवीस
देवेंद्र फडणवीस की योजना के आगे विपक्षी नेता हुए चित
  • देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में महायुति ने महाराष्ट्र में निगम चुनावों में बीजेपी की प्रचंड जीत हासिल की है
  • फडणवीस ने मुंबई में मराठी वोटों पर ठाकरे परिवार के दावों को चुनौती देते हुए मजबूत पकड़ बनाई है
  • सहयोगी दलों के साथ सीट बंटवारे और स्थानीय नेतृत्व को प्राथमिकता देने से चुनाव रणनीति सफल रही है
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मुंबई:

मेरा पानी उतरता देख, मेरे किनारे पर घर मत बना लेना, मैं समुंदर हूं, लौट कर वापस आऊंगा... 2019 के विधानसभा चुनाव में अपने नारे ‘मैं वापस आऊंगा' का मजाक बनाने पर देवेंद्र फडणवीस ने यह शेर विधानसभा में बतौर नेता प्रतिपक्ष सुनाया था. तब से आज तक हर बार उन्होंने इसे सही साबित कर दिखाया है.आज महाराष्ट्र में निगम चुनावों में बीजेपी की प्रचंड जीत का सेहरा फडणवीस के सिर पर ही बाँधा जा रहा है. उनकी अगुवाई में महायुति ने राज्य के राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह से बदल दिया. विधानसभा चुनाव में मिली ऐतिहासिक जीत को निगम चुनावों में जारी रख बीजेपी ने साबित कर दिया कि राज्य की जनता का विश्वास उस पर और ज़्यादा बढ़ा है.

फडणवीस ने आज की जीत से कई बातें साबित कर दीं। पहली बात तो यह कि चाहें भाई साथ आएं या चाचा-भतीजा; बिखरों के मिलने के बावजूद वे ही सब पर भारी हैं. दूसरा यह कि मुंबई में मराठी वोटों पर अपना कब्जा बनाए रखने के ठाकरे परिवार के दावे को चकनाचूर कर दिया. बीएमसी में बीजेपी और शिवसेना को मिली ऐतिहासिक जीत की गूंज लंबे समय तक याद रखी जाएगी. यहां पर एकनाथ शिंदे की भूमिका भी महत्वपूर्ण है जिनकी 30 सीटों पर जीत ने उद्धव और राज ठाकरे के अरमानों पर पानी फेर दिया. शिंदे ने ठाणे और कल्याण डोंबिवली में अपना जलवा बरकरार रखा है.

देवेंद्र फडणवीस का डंका केवल मुंबई नहीं बल्कि पूरे राज्य में बज रहा है. जहां पिछली बार बीजेपी 29 में से 15 निगमों पर क़ाबिज़ थी इस बार  सहयोगियों के साथ यह आंकड़ा 23 के भी पार जा रहा है. यह प्रचंड जीत बता रही है कि कैसे महाराष्ट्र में विपक्षी पूरी तरह से सफाया हो गया. फडणवीस की यह रणनीति भी काम आई कि प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण को सहयोगियों दलों पर दबाव बनाने के लिए आगे किया जाए. चुनाव से पहले चाहे सहयोगी दलों के नेताओं को लाने के उनके फ़ैसले के खिलाफ दिल्ली तक शिकायत गई हो लेकिन परिणाम बताते हैं कि रणनीति कारगर रही. फडणवीस ने रविंद्र चव्हाण के साथ मिलकर जमीनी स्तर पर बूथ-मंडल कमजोरियों को दूर किया, स्थानीय नेतृत्व को प्राथमिकता दी और डोर-टू-डोर अभियान चलाया. बागी नेताओं पर सख्ती से पार्टी एकजुट रही.

सही मुद्दों का प्रचार

राज्य सरकार की योजनाओं (इंफ्रास्ट्रक्चर, लाडकी बहिन जैसी) को प्रचार का आधार बनाया गया। सहयोगी दलों (शिवसेना शिंदे गुट) के साथ सीट बंटवारा संभाला ताकि गठबंधन मजबूत रहे।

विपक्ष पर फोकस

पवार परिवार की एकता को कमजोर करने के लिए मजबूत उम्मीदवार उतारे गए. युवा-गैर-पारंपरिक मतदाताओं पर सर्वे-आधारित प्रचार किया. उम्मीदवार चयन में स्थानीय लोकप्रियता, जमीनी पकड़ और पार्टी वफादारी को प्राथमिकता दी गई. ऐसे उम्मीदवारों को तरजीह दी गई जो क्षेत्रीय मुद्दों (जैसे पानी, सड़क, ड्रेनेज) पर मजबूत पकड़ रखते हों और पिछले चुनावों में पार्टी को नुकसान न पहुंचाए हों. बागियों को बाहर रखा गया। मराठी, गैर-मराठी, महिलाओं और युवाओं को प्रतिनिधित्व देते हुए चयन किया, साथ ही शिवसेना (शिंदे गुट) के साथ सीट बंटवारे में मज़बूत उम्मीदवार उतारे. कुल मिलाकर, जीतने की क्षमता मुख्य मापदंड रही. 

चुनाव प्रचार में भी फडणवीस हावी रहे. पूरे राज्य में उन्होंने जम कर प्रचार किया और वे विरोधियों पर हावी रहे. उन्होंने 37 सभाएं और रैलियाँ कीं. सहयोगी दलों के साथ तालमेल भी दिखाई दिया. एकनाथ शिंदे ने 25 जनसभाएँ और 29 रोड शो किए. वहीं अजीत पवार ने 25 कार्यक्रम किए. उधर उद्धव ठाकरे की नाशिक, ठाणे और मुंबई में तीन साझा सभाएं हुईं. कांग्रेस के किसी बड़े नेता को चुनावी मैदान में नहीं देखा गया. 

फडणवीस की चुनावी कामयाबी का एक पहलू एनसीपी की बड़ी हार के रूप में सामने आया है. पुणे में बीजेपी ने बड़ी जीत हासिल की और पिंपरी-चिंचवड़ में भी फिर से सत्ता पर क़ाबिज़ हुई. इसके गहरे राजनीतिक अर्थ हैं. बीजेपी की यह जीत एनसीपी के अजित पवार और शरद पवार गुटों के साथ आने के बावजूद हुई है. इनमें न केवल सीटों का तालमेल हुआ बल्कि साझा घोषणापत्र भी आया. बीजेपी पर तीखे हमले भी किए गए. इसे परिवार की एकता बताया गया. लेकिन यह दाँव नहीं चला.

अब महायुति सरकार पर भी इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है. कभी कांग्रेस के प्रभुत्व वाला यह क्षेत्र पूरी तरह से बीजेपी के प्रभावक्षेत्र में आ चुका है.वहीं, फडणवीस महायुति के निर्विवादित नेता के रूप में भी स्थापित हुए हैं. आज की जीत से उन्होंने साबित किया कि विधानसभा चुनाव का प्रचंड बहुमत संयोग नहीं था. वे अब अधिक आत्मविश्वास के साथ फ़ैसले करेंगे. यह उनके सरकार को भी स्थायित्व प्रदान करेगा. सहयोगी दलों को भी स्पष्ट संदेश है कि सभी तरह के विकल्प खुले हुए हैं. 

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