कहते हैं कि अगर इरादों में मजबूती और लक्ष्य के प्रति स्पष्टता हो, तो असफलता भी आपके रास्ते का पत्थर नहीं, बल्कि सफलता की सीढ़ी बन जाती है. मध्यप्रदेश के चंबल इलाके में भिंड जिले के फुले गांव निवासी दीपक बघेल की कहानी कुछ ऐसी ही है. UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 में ऑल इंडिया रैंक 602 हासिल करने वाले दीपक ने साबित कर दिया कि निरंतरता और सही रणनीति से बड़े से बड़ा मुकाम पाया जा सकता है.
बचपन का सपना नेवी, लेकिन किस्मत को कुछ और था मंजूर
आर्मी में नायब सूबेदार रह चुके जगपाल सिंह के बेटे दीपक बघेल ने ग्वालियर से स्कूली शिक्षा और जीवाजी यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन पूरा किया. दीपक का बचपन से सिविल सर्वेंट बनने का कोई इरादा नहीं था. 12वीं के बाद उन्होंने सर्विस सिलेक्शन बोर्ड की कठिन परीक्षा क्रैक की और उनका चयन इंडियन नेवी के लिए हो गया था. लेकिन नियति ने उनके लिए एक अलग रास्ता तय कर रखा था. परिस्थितियों के कारण वे नेवी जॉइन नहीं कर सके और 2022 में उन्होंने UPSC की तैयारी शुरू की.
दो बार इंटरव्यू तक पहुंचे, लेकिन अंतिम लिस्ट से रहे दूर
दीपक का UPSC का सफर किसी रोलरकोस्टर राइड से कम नहीं था.
- पहला प्रयास (2023): शानदार प्रदर्शन करते हुए पहली ही बार में पर्सनालिटी टेस्ट (इंटरव्यू) तक पहुंचे, लेकिन फाइनल मेरिट लिस्ट में नाम नहीं आया.
- दूसरा प्रयास (2024): एक बार फिर दिन-रात मेहनत की, दोबारा इंटरव्यू हॉल तक पहुंचे, लेकिन किस्मत ने फिर से धोखा दिया और अंतिम सूची में जगह नहीं मिली.
लगातार दो बार इंटरव्यू राउंड से बाहर होना किसी भी अभ्यर्थी का मनोबल तोड़ने के लिए काफी होता है. कोई भी आम इंसान इस मोड़ पर आकर हिम्मत हार सकता था, लेकिन दीपक ने हार मानने से इनकार कर दिया.
रणनीति में बदलाव और सादगी से मिली सफलता
निराश होने के बजाय दीपक ने थोड़ा ब्रेक लिया, आत्मचिंतन किया और अपनी गलतियों को समझा. इस दौर में IPS अधिकारी अभिजीत चौधरी उनके मेंटर बने. दीपक ने बिना सोचे-समझे ज्यादा पढ़ने के बजाय अपनी रणनीति को पूरी तरह री-डिजाइन किया.
दीपक बताते हैं कि उनकी सफलता का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट यह था कि "मैंने अपनी तैयारी को बिल्कुल सरल बना दिया. उत्तरों में बेवजह की क्लिष्ट शब्दावली का इस्तेमाल बंद किया और अपनी मौलिकता को बनाए रखा."
दिल्ली का भ्रम तोड़ा, घर रहकर की तैयारी
ग्वालियर में रहकर तैयारी करते समय दीपक के मन में भी अक्सर यह सवाल उठता था कि क्या दिल्ली जाने से कोई खास फायदा मिलता है? लेकिन समय के साथ उन्हें यह अहसास हुआ कि कोचिंग का शहर नहीं, बल्कि आपकी निरंतरता, सोच में स्पष्टता और खुद पर विश्वास सबसे ज्यादा मायने रखता है. 602वीं रैंक हासिल करने के बाद भी दीपक का सफर यहां खत्म नहीं हुआ है. उनका सपना भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी बनने का है, जिसके लिए वे अपनी तैयारी जारी रखे हुए हैं.
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