- शिवपुरी के बिजरौनी गांव के सात किसानों ने बिना मुआवजा लिए करोड़ों रुपये की जमीन सड़क निर्माण के लिए दान की है.
- बिजरौनी गांव मानसून में बसरदी नदी के उफान से टापू बन जाता था जिससे संपर्क पूरी तरह टूट जाता था.
- प्रस्तावित बायपास आयुर्वेदिक औषधालय से गौशाला तक बनेगा और खतौरा रोड से सीधे जुड़ जाएगा.
आज जब जमीन के छोटे-छोटे विवाद भी रिश्तों में दरार डाल देते हैं और कई बार मामला थाने-कचहरी तक पहुंच जाता है, तब शिवपुरी जिले के बिजरौनी गांव के सात किसानों ने ऐसी मिसाल पेश की है, जो सिर्फ उनके गांव ही नहीं, पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा बन गई है. इन किसानों ने किसी निजी लाभ या मुआवजे की उम्मीद के बिना अपनी करोड़ों रुपये मूल्य की जमीन सड़क निर्माण के लिए दान कर दी.
उनका मकसद सिर्फ इतना है कि हर साल बारिश में बाहरी दुनिया से कट जाने वाले उनके गांव को ‘टापू' बनने के अभिशाप से हमेशा के लिए मुक्ति मिल सके. किसानों के इस फैसले से अब वर्षों पुरानी समस्या का समाधान होने की उम्मीद जगी है और विकास का नया रास्ता खुलता दिखाई दे रहा है.
बारिश में 'टापू' बन जाता था बिजरौनी
शिवपुरी जिले के बदरवास जनपद के अंतर्गत आने वाला बिजरौनी गांव लंबे समय से एक गंभीर समस्या से जूझ रहा था. गांव तक पहुंचने के लिए केवल एक मुख्य मार्ग है, जिसके बीच में बसेड़ी नदी पड़ती है. नदी पर बनी छोटी पुलिया सामान्य दिनों में तो आवागमन का जरिया बनती है, लेकिन मानसून आते ही हालात बदल जाते हैं.
बारिश के दौरान नदी उफान पर आ जाती है और पुलिया के ऊपर कई फीट तक पानी बहने लगता है. ऐसे में गांव का संपर्क बदरवास, खतौरा और आसपास के अन्य इलाकों से पूरी तरह टूट जाता है. गांव चारों ओर से पानी से घिर जाता है और किसी टापू की तरह नजर आने लगता है.
स्वास्थ्य, शिक्षा और व्यापार पर पड़ता था असर
कनेक्टिविटी टूटने का सबसे ज्यादा असर गांव के रोजमर्रा के जीवन पर पड़ता था. किसी मरीज को अस्पताल ले जाना हो, बच्चों को पढ़ाई के लिए बाहर जाना हो या फिर किसानों को अपनी उपज बाजार तक पहुंचानी हो, हर काम प्रभावित होता था. कई बार आपातकालीन परिस्थितियों में लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता था. ग्रामीण वर्षों से इस समस्या का स्थायी समाधान चाहते थे, लेकिन जमीन उपलब्ध न होने के कारण मामला आगे नहीं बढ़ पा रहा था.

दान करने के बाद जमीन की खुदाई शुरू हुई.
5 फीट की पगडंडी बनेगी 36 फीट चौड़ा बायपास
ग्रामीणों और किसानों ने जब समाधान की दिशा में कदम बढ़ाया तो तस्वीर बदलने लगी. जिस स्थान पर अब बायपास प्रस्तावित है, वहां पहले खेतों के बीच से निकलने वाली करीब 5 फीट चौड़ी कच्ची पगडंडी थी. गांव के सात किसानों ने आपसी सहमति से अपने खेतों की लगभग 1500 मीटर लंबी और 12 मीटर यानी करीब 36 फीट चौड़ी जमीन सड़क निर्माण के लिए देने का फैसला किया. यह जमीन बेशकीमती मानी जा रही है, लेकिन किसानों ने गांव के भविष्य को अपनी निजी संपत्ति से ऊपर रखा.
बिना मुआवजे के विभाग को दी जमीन
इस पहल की सबसे खास बात यह है कि किसानों ने जमीन के बदले किसी तरह के मुआवजे की मांग नहीं की है. 6 जुलाई को सभी किसानों ने नोटरी के माध्यम से शपथ पत्र तैयार कर पीडब्ल्यूडी विभाग को सौंप दिया. शपथ पत्र में स्पष्ट रूप से लिखा है कि सड़क निर्माण के लिए विभाग जिस सीमा तक जमीन का उपयोग करना चाहे, कर सकता है. इतना ही नहीं, किसानों और उनके वारिसों ने भी भविष्य में किसी प्रकार का मालिकाना हक या मुआवजे का दावा नहीं करने की बात लिखित रूप से स्वीकार की है.
आयुर्वेदिक औषधालय से गौशाला तक बनेगा बायपास
प्रस्तावित बायपास बिजरौनी के आयुर्वेदिक औषधालय से शुरू होकर गांव की गौशाला तक पहुंचेगा. इसके बाद यह मार्ग सीधे खतौरा रोड से जुड़ जाएगा. बायपास बनने के बाद खतौरा से बदरवास जाने वाले लोगों को गांव के भीतर से होकर नदी पार नहीं करनी पड़ेगी. वाहन चालक गांव शुरू होने से पहले ही बायपास के जरिए मुख्य सड़क से जुड़ जाएंगे. इससे बारिश के मौसम में भी आवागमन लगातार जारी रहेगा.

खेत दान के बाद शुरू हुआ काम.
स्वर्गीय रामसिंह यादव का सपना हो रहा साकार
इस सड़क परियोजना की कल्पना कोई नई नहीं है. वर्ष 2012-13 में तत्कालीन विधायक स्वर्गीय रामसिंह यादव ने गांव का दौरा कर इस बायपास का प्रारूप तैयार कराया था. उनकी इच्छा थी कि बिजरौनी की वर्षों पुरानी समस्या का स्थायी समाधान हो.
बाद में उनके पुत्र और वर्तमान कोलारस विधायक महेंद्र सिंह यादव ने इस योजना को आगे बढ़ाया. उनकी अनुशंसा पर शासन ने सड़क निर्माण के लिए 1 करोड़ 33 लाख रुपये की राशि मंजूर की. बजट उपलब्ध होने के बाद भी जमीन का मुद्दा सबसे बड़ी बाधा था, जिसे किसानों ने अपनी पहल से दूर कर दिया.
ये हैं बिजरौनी के भूमिदान महादानी
गांव और क्षेत्र में जिन किसानों की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, उनमें प्रकाशपुरी गोस्वामी, नंदराम किरार, बृजेश किरार, राजा भैया किरार, गिर्राज किरार, रमेश पटेल और विजय सिंह किरार शामिल हैं. इन किसानों ने निजी हितों से ऊपर उठकर सामूहिक हित को प्राथमिकता दी और यह दिखा दिया कि विकास केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि जनभागीदारी से भी संभव है.
विकास के साथ बढ़ेगी जमीन की कीमत
ग्रामीणों और जानकारों का मानना है कि इस सड़क के निर्माण से पूरे क्षेत्र को फायदा मिलेगा. बेहतर सड़क सुविधा मिलने से आवागमन आसान होगा, कारोबार बढ़ेगा और लोगों को बारिश के मौसम में होने वाली परेशानियों से राहत मिलेगी. साथ ही, जिन किसानों की जमीनें इस नए बायपास से सटी हुई हैं, उनकी भूमि का व्यावसायिक मूल्य भी भविष्य में बढ़ सकता है. हालांकि किसानों का कहना है कि उनके लिए सबसे बड़ी खुशी गांव को वर्षों पुरानी परेशानी से छुटकारा दिलाना है.
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