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अजब MP में गजब फैसला; खत्म हो चुकी बच्चों की दवा पर लगा प्रतिबंध, जबलपुर में स्वास्थ्य विभाग पर उठे सवाल

Paracetamol Syrup Controversy: जबलपुर में बच्चों को दी गई पैरासिटामोल सिरप को एक साल बाद अमानक घोषित कर प्रतिबंध लगाया गया, जबकि स्टॉक पहले ही खत्म हो चुका था. स्वास्थ्य विभाग की निगरानी पर सवाल खड़े हुए. पढ़िए पूरी खबर.

अजब MP में गजब फैसला; खत्म हो चुकी बच्चों की दवा पर लगा प्रतिबंध, जबलपुर में स्वास्थ्य विभाग पर उठे सवाल
बच्चों को बांटी गई पैरासिटामोल सिरप एक साल बाद अमानक घोषित

Paracetamol Syrup Controversy: मध्य प्रदेश के जबलपुर में स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है. मामला बच्चों को बुखार में दी जाने वाली पैरासिटामोल सिरप का है, जिसे अब अमानक घोषित कर उसके उपयोग और बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. हैरानी की बात यह है कि जिस दवा पर रोक लगाई गई है, उसका पूरा स्टॉक करीब एक साल पहले ही सरकारी अस्पतालों में वितरित होकर खत्म हो चुका था. ऐसे में देर से आई जांच रिपोर्ट और अब लगाया गया प्रतिबंध कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है, खासकर गुणवत्ता नियंत्रण और समयबद्ध निगरानी को लेकर.

16 हजार बोतल दवा बच्चों को पहले ही बांटी जा चुकी

जानकारी के अनुसार वर्ष 2025 में जबलपुर जिले के सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में लगभग 16 हजार बोतल पैरासिटामोल पीडियाट्रिक ओरल सस्पेंशन बच्चों को मुफ्त वितरित की गई थीं. यह दवा Zenith Drugs Limited द्वारा निर्मित थी और बुखार से पीड़ित बच्चों के इलाज में नियमित रूप से इस्तेमाल की जा रही थी. यह पूरा स्टॉक जनवरी 2025 तक खत्म हो चुका था और इसके बाद इस बैच की कोई दवा भंडारण में मौजूद नहीं थी.

जांच में दवा पाई गई अमानक

स्वास्थ्य विभाग ने इसी दवा के सैंपल को भोपाल स्थित खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) की ड्रग टेस्टिंग लैब में जांच के लिए भेजा था. जांच के दौरान यह दवा गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरी और इसे “अमानक” घोषित कर दिया गया. लैब रिपोर्ट में सिरप में क्रिस्टलाइजेशन की समस्या सामने आई, जो दवा की गुणवत्ता से जुड़ी कमी को दर्शाती है.

Paracetamol Syrup Controversy: बच्चों की दवा अमानक घोषित

Paracetamol Syrup Controversy: बच्चों की दवा अमानक घोषित

एक साल बाद आई रिपोर्ट, अब लगाया गया प्रतिबंध

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस दवा की जांच रिपोर्ट अप्रैल 2026 में सामने आई, जबकि संबंधित बैच का पूरा स्टॉक जनवरी 2025 में ही समाप्त हो चुका था. रिपोर्ट मिलने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने दवा के उपयोग और बिक्री पर तत्काल प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी कर दिया. हालांकि व्यवहारिक रूप से अब यह आदेश केवल कागजी कार्रवाई बनकर रह गया है, क्योंकि दवा पहले ही मरीजों को दी जा चुकी है.

CMHO का बयान: दवा हानिकारक नहीं थी

मुख्य जिला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. नवनीत कोठारी ने इस मामले पर सफाई देते हुए कहा कि जांच में सिरप में क्रिस्टलाइजेशन की समस्या जरूर पाई गई थी, लेकिन जो दवा बच्चों को दी गई, वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं थी. उनके अनुसार, रिपोर्ट आने के बाद एहतियात के तौर पर प्रतिबंध लगाया गया है और निर्माता कंपनी के खिलाफ आगे की कार्रवाई तय नियमों के अनुसार की जाएगी.

उठ रहे हैं कई बड़े सवाल

इस पूरे मामले ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं जैसे:

  • जब दवा का वितरण 2025 में ही हो गया था, तो उसी समय गुणवत्ता की जांच क्यों नहीं की गई?
  • सैंपल पहले पास हुआ और बाद में फेल कैसे हो गया?
  • खत्म हो चुके स्टॉक की जांच रिपोर्ट एक साल की देरी से क्यों आई?
  • यदि दवा अमानक थी, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी तय होगी, निर्माता की या वितरण से पहले जांच न करने वाले तंत्र की?

निगरानी तंत्र की खामियां उजागर

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा मामला सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में गुणवत्ता नियंत्रण और निगरानी तंत्र की गंभीर खामियों को उजागर करता है. बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाली दवाओं में छोटी‑सी चूक भी गंभीर परिणाम ला सकती है. ऐसे में समय पर जांच, रिपोर्ट और कार्रवाई बेहद जरूरी है.

आगे की कार्रवाई पर टिकी नजर

अब देखना होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों या संबंधित दवा कंपनी पर क्या कार्रवाई करता है. साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि भविष्य में ऐसी लापरवाही न हो, इसके लिए क्या ठोस सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं. फिलहाल यह मामला न सिर्फ प्रशासनिक देरी, बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही पर सवाल खड़े कर रहा है.

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