- नरवर किले से लगभग 3500 किलो वजनी ऐतिहासिक तोप रहस्यमय तरीके से चोरी हो गई है, जिसका अब तक पता नहीं चला.
- चोरों ने गद्दे, रजाइयां और रस्सियों का उपयोग करके तोप को बिना आवाज किए नीचे उतारा होगा.
- भारी तोप को किले से नीचे उतारने के लिए तकनीकी सहायता और मशीनों का इस्तेमाल किया गया माना जा रहा है.
शिवपुरी जिले का ऐतिहासिक नरवर किला सदियों से अपनी मजबूती, वीरता और गौरवशाली इतिहास के लिए जाना जाता है. जिस किले को दुश्मनों के लिए भेद पाना आसान नहीं था, उसी किले से महाराजा जीवाजी राव सिंधिया की रियासत के दौर की करीब 3500 किलो वजनी ऐतिहासिक तोप रहस्यमय तरीके से गायब हो गई. सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी भारी तोप को ऊंचे और दुर्गम किले से नीचे कैसे उतारा गया?
शुरुआती जांच और स्थानीय चर्चाओं में जो बातें सामने आ रही हैं, वे किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगतीं. गद्दों, रजाइयों, रस्सियों और भारी उपकरणों की मदद से इस पूरी वारदात को बेहद सुनियोजित तरीके से अंजाम देने की आशंका जताई जा रही है.
गद्दे-रजाइयों के सहारे दबाई आवाज
नरवर किले से तोप चोरी की घटना को देखकर साफ लगता है कि यह काम लंबे समय की तैयारी और पूरी योजना के साथ किया. माना जा रहा है कि चोरों ने सबसे पहले इस बात का ध्यान रखा कि तोप को खिसकाने या नीचे उतारने के दौरान किसी तरह की तेज आवाज न हो. इसके लिए तोप को गद्दों, रजाइयों और अन्य मुलायम सामान से लपेटा. उद्देश्य यह था कि पत्थरों या दीवारों से टकराने पर आवाज बाहर तक न पहुंचे और किसी को भनक न लगे.
रस्सियों और मशीनों की मदद से उतारी गई भारी तोप
करीब 3500 किलो वजनी तोप को किले से नीचे उतारना सामान्य बात नहीं है. इतनी ऊंचाई और कठिन रास्तों वाले क्षेत्र में यह काम बिना तकनीकी सहायता के संभव नहीं माना जा रहा. आशंका है कि चोरों ने मजबूत रस्सियों, लोहे के तारों और किसी क्रेन या चरखी जैसी व्यवस्था का इस्तेमाल किया. धीरे-धीरे और सावधानी के साथ तोप को नीचे पहुंचाया, ताकि किसी तरह का नुकसान भी न हो और किसी को शक भी न हो.

यह वहीं जगह है जहां पर वो एतिहासिक तोप रखी जाती थी.
रात के सन्नाटे में दिया वारदात को अंजाम
जानकारों का मानना है कि पूरी कार्रवाई रात के समय की गई. अंधेरे और सन्नाटे का फायदा उठाकर चोर कई घंटों तक किले के भीतर सक्रिय रहे. हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी कवायद के बावजूद किसी सुरक्षा कर्मी या स्थानीय व्यक्ति को इसकी जानकारी नहीं लगी. इससे किले की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.
नाकाबंदी के बीच राजस्थान पहुंची तोप
घटना सामने आने के बाद पुलिस ने क्षेत्र में सघन चेकिंग और नाकाबंदी का दावा किया था. लेकिन अब जो जानकारियां सामने आ रही हैं, उनसे पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठने लगे हैं. सूत्रों के मुताबिक चोरी हुई तोप मध्य प्रदेश की सीमा पार कर राजस्थान तक पहुंच गई है. बताया जा रहा है कि करौली जिले में उसके होने की आशंका के आधार पर पुलिस की टीमें तलाश में जुटी हैं.
अंतरराज्यीय सीमा कैसे पार हुई?
मामले का सबसे अहम सवाल यही है कि इतनी बड़ी और भारी तोप को आखिर किस वाहन से ले जाया गया और वह पुलिस की नजर से कैसे बच गई. अगर नाकाबंदी प्रभावी थी तो किसी भी बड़े वाहन की जांच में यह तोप आसानी से पकड़ी जा सकती थी. यही वजह है कि घटना के बाद पुलिस की सतर्कता और निगरानी व्यवस्था पर लगातार सवाल उठ रहे हैं.

ये वो पत्थर है जिस पर तोप को रखा गया था.
खुदाई वाले पुराने मामले से जोड़ रही पुलिस
इस बीच पुलिस जांच को एक पुराने खुदाई और खजाने से जुड़े मामले से जोड़कर भी देख रही है. अधिकारियों का मानना है कि कुछ ऐसे सुराग मिले हैं जो इस दिशा में इशारा करते हैं. हालांकि अभी तक इस संबंध में कोई ठोस खुलासा नहीं हुआ है. दूसरी ओर, लोगों का कहना है कि इस एंगल पर ज्यादा जोर देने से असली चोरों तक पहुंचने की प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है.
स्थानीय मदद या बड़े गिरोह की भूमिका?
जिस तरह से पूरी वारदात को अंजाम दिया, उससे यह संभावना भी जताई जा रही है कि चोरों को स्थानीय स्तर पर मदद मिली हो सकती है. किले के रास्तों, उसकी बनावट और सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी किसी बाहरी व्यक्ति के लिए आसान नहीं होती. इसलिए जांच एजेंसियां इस बात की भी पड़ताल कर रही हैं कि कहीं किसी संगठित गिरोह या स्थानीय भेदिए की भूमिका तो नहीं रही.
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