- राजनीति अब सिर्फ मैदान, चौपालों, रैलियों और मंचों तक सीमित नहीं रह गई है.
- जनता का मूड गांव की चौपाल पर कम और स्मार्टफोन की स्क्रीन पर ज्यादा तय हो रहा है.
- इसे देखते हुए मध्य प्रदेश में भाजपा की रणनीति भी बदलती दिख रही है, इसकी शुरुआत विधायक महेंद्र यादव ने की है.
21वीं सदी की राजनीति अब सिर्फ मैदान, चौपालों, रैलियों और मंचों तक सीमित नहीं रह गई है. जनता का मूड अब गांव की चौपाल पर कम और स्मार्टफोन की स्क्रीन पर ज्यादा तय हो रहा है. जो नेता जनता के फोन की स्क्रीन पर नजर नहीं आ रहा, वह धीरे-धीरे राजनीति के नक्शे से भी ओझल होने लगा है. इस 'डिजिटल जनाधार' को लेकर मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले की कोलारस विधानसभा से एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाली खबर सामने आई है.
फॉलोअर्स घटेंगे तो कुर्सी भी जाएगी
कोलारस में आयोजित मंडल बैठक के दौरान विधायक महेंद्र यादव ने दो टूक शब्दों में कहा- अगर किसी कार्यकर्ता को पद पर बने रहना हैं तो उसे अपनी सोशल मीडिया फॉलोइंग बढ़ानी होगी. विधायक ने बाकायदा पदाधिकारियों के लिए न्यूनतम फॉलोअर्स का टारगेट सेट कर दिया है.
पद के लिए इतने फॉलोअर्स जरूरी
- मंडल अध्यक्ष: न्यूनतम 25,000 फॉलोअर्स
- शक्ति केंद्र प्रमुख: न्यूनतम 5,000 फॉलोअर्स
- बूथ अध्यक्ष: न्यूनतम 1,000 फॉलोअर्स
आखिर नेताओं के लिए रील्स और 'लाइव' क्यों बने संजीवनी?
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, आज के दौर में सोशल मीडिया सिर्फ विचार साझा करने का जरिया नहीं, बल्कि समानांतर राजनीतिक मंच बन चुका है. बिना किसी रुकावट या फिल्टर के नेता अपनी बात सीधे जनता तक पहुंचा पाते हैं. जहां एक बड़ी जनसभा में लाखों रुपये खर्च होते हैं, वहीं एक फेसबुक लाइव या इंस्टाग्राम रील मिनटों में लाखों लोगों तक मुफ्त में पहुंच जाती है. चुनाव 5 साल में एक बार आते हैं, लेकिन सोशल मीडिया के जरिए नेता अपने क्षेत्र की जनता के सामने रोजाना अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकता है.
टिकट बंटवारे में भी दिखेगा 'डिजिटल रिपोर्ट कार्ड' का असर
कोलारस का यह घटनाक्रम इस बात की ओर इशारा कर रहा कि आने वाले चुनाव में राजनीतिक दल उम्मीदवारों को टिकट देने के लिए उनकी जमीनी पकड़ के साथ-साथ सोशल मीडिया एंगेजमेंट को भी मुख्य पैमाना बनाएंगे. अगर, ऐसा हुआ तो वही नेता रेस में आगे टिकेगा, जिसकी जमीन के साथ-साथ डिजिटल दुनिया पर भी मजबूत पकड़ होगी.
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