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₹1,200 करोड़ की पोषण व्यवस्था, फिर भी बच्चों की थालियां खाली; मध्य प्रदेश में राशन कहां अटक रहा है?

मध्य प्रदेश में 1200 करोड़ रुपये की टेक-होम राशन (THR) योजना पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. 85 लाख बच्चों, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं तक पोषण आहार समय पर नहीं पहुंच रहा. भोपाल, सागर, विदिशा और आगर-मालवा के कई आंगनवाड़ी केंद्रों में महीनों तक राशन की आपूर्ति बाधित रही.

₹1,200 करोड़ की पोषण व्यवस्था, फिर भी बच्चों की थालियां खाली; मध्य प्रदेश में राशन कहां अटक रहा है?
  • MP में टेक-होम राशन योजना के तहत 85 लाख बच्चों-महिलाओं को पोषण आहार मिलता है, लेकिन वितरण बाधित हो रहा है.
  • सरकार ने टेक-होम राशन की जिम्मेदारी ग्रामीण आजीविका मिशन से महिला एवं बाल विकास विभाग को सौंपने का फैसला किया.
  • आंगनवाड़ी केंद्रों पर कई महीनों तक राशन नहीं आया, जिससे कुपोषित बच्चों-गर्भवती महिलाओं को पोषण नहीं मिला.

मध्य प्रदेश में करीब 85 लाख बच्चों, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं को पूरक पोषण उपलब्ध कराने वाली लगभग ₹1,200 करोड़ की व्यवस्था एक बार फिर बदली जा रही है. राज्य सरकार ने टेक-होम राशन, यानी THR, के उत्पादन और वितरण की जिम्मेदारी राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन से वापस लेकर महिला एवं बाल विकास विभाग को सौंपने का फैसला किया है.

वर्ष 2018 के बाद यह पांचवां मौका है, जब पोषण आहार के उत्पादन और वितरण का मॉडल बदला जा रहा है. लेकिन विभागों के बीच जिम्मेदारी बदलने की इस कवायद के बीच कई आंगनवाड़ी केंद्रों तक पोषण आहार पहुंच ही नहीं रहा.

भोपाल, सागर, विदिशा और आगर-मालवा में की गई जमीनी पड़ताल में सामने आया कि कई आंगनवाड़ी केंद्रों पर टेक-होम राशन की आपूर्ति एक से तीन महीने तक बाधित रही. आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के मुताबिक बच्चे, गर्भवती महिलाएं और धात्री माताएं सरकारी ऐप और रजिस्टर में दर्ज हैं, उनकी उपस्थिति और वजन की जानकारी भी अपडेट की जा रही है, लेकिन उनके हिस्से का पोषण आहार केंद्रों तक नहीं पहुंचा.

सरकारी रिकॉर्ड में योजनाएं सक्रिय हैं. बजट स्वीकृत है. लाभार्थियों के नाम दर्ज हैं. मोबाइल ऐप पर निगरानी हो रही है. फिर भी आखिरी छोर पर महिलाओं को यह जवाब दिया जा रहा है कि राशन “ऊपर से नहीं आया.” व्यवस्था बच्चे को गिन सकती है, उसका वजन दर्ज कर सकती है, उसे ऐप पर पंजीकृत कर सकती है, लेकिन उसकी थाली तक भोजन पहुंचाने की गारंटी नहीं दे पा रही.

सत्ता के गलियारे के पीछे भी दो महीने नहीं पहुंचा राशन

भोपाल की लिंक रोड राजधानी के सबसे प्रभावशाली इलाकों में गिनी जाती है. यहां मंत्रियों, वरिष्ठ अधिकारियों और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के आवास हैं. उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा का बंगला भी इसी क्षेत्र में है. उनके बंगले के पीछे की एक गली में आंगनवाड़ी केंद्र क्रमांक 729 संचालित होता है. यह केंद्र एक छोटे से कमरे में चलता है. करीब 50 बच्चे यहां आते हैं. चौदह गर्भवती महिलाएं और आठ धात्री माताएं भी इस केंद्र में पंजीकृत हैं.

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता रमा कुशवाहा के अनुसार अप्रैल में टेक-होम राशन आया था, लेकिन मई और जून में नई आपूर्ति नहीं हुई. उन्होंने कहा, “अप्रैल में राशन मिला था और उसे अप्रैल-मई में बांटा गया. मई-जून में राशन नहीं आया. जुलाई में फिर से आया है.”

आपूर्ति अब दोबारा शुरू हो गई है, लेकिन दो महीने का यह अंतर एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है. किसी कुपोषित बच्चे की जरूरत सरकारी सप्लाई कैलेंडर के हिसाब से नहीं रुकती. गर्भवती महिला अपनी प्रोटीन और कैलोरी की जरूरत अगली खेप आने तक स्थगित नहीं कर सकती. कुपोषित बच्चे के लिए हर छूटा हुआ पैकेट केवल आपूर्ति में देरी नहीं है. वह एक छूटा हुआ भोजन, कम हुआ पोषण और कई बार विकास पर स्थायी असर हो सकता है.

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राशन की कमी के बारे में बताती आंगनवाड़ी कार्यकर्ता. 

हर महीने क्या मिलना चाहिए

मध्य प्रदेश में 97,882 स्वीकृत आंगनवाड़ी केंद्र हैं, जो 453 बाल विकास परियोजनाओं के अंतर्गत संचालित होते हैं. राज्य में करीब 85 लाख लाभार्थी पंजीकृत हैं. पूरक पोषण आहार का खर्च केंद्र और राज्य सरकार बराबर-बराबर वहन करते हैं. टेक-होम राशन योजना के तहत छह महीने से तीन वर्ष तक के बच्चों को हर महीने दो पैकेट हलवा प्रीमिक्स, एक पैकेट बाल आहार और एक पैकेट खिचड़ी मिलनी चाहिए. गर्भवती और धात्री महिलाओं के लिए दो पैकेट गेहूं-सोया बर्फी, एक पैकेट गेहूं-बेसन मिश्रण और एक पैकेट खिचड़ी देने का प्रावधान है.

यह सामान्य खाद्यान्न नहीं है. यह उन बच्चों और महिलाओं के लिए पूरक पोषण है, जो पहले से ही कुपोषण, एनीमिया, कम वजन और अपर्याप्त भोजन के जोखिम में हो सकते हैं. कई गरीब परिवारों के लिए आंगनवाड़ी से मिलने वाला यह राशन अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि पोषक भोजन का एकमात्र नियमित और सुनिश्चित स्रोत है.

ऐप पर नाम दर्ज, लेकिन थाली में राशन नहीं

भोपाल में अमरावत खुर्द, बरखेड़ा पठानी और वल्लभ भवन के आसपास के कई आंगनवाड़ी केंद्रों की पड़ताल की गई. कुछ केंद्रों पर कार्यकर्ताओं ने रजिस्टर दिखाए. कुछ जगह मोबाइल ऐप पर लाभार्थियों की प्रविष्टियां दिखाई गईं. कई जगह हाल में आए राशन के पैकेट भी मौजूद थे. लेकिन कार्यकर्ताओं और लाभार्थियों से बातचीत में साफ हुआ कि आपूर्ति नियमित नहीं रही.

आगर-मालवा के वार्ड क्रमांक 16 में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता शारदा यादव बच्चों को आम और दूसरे फलों के फायदे समझा रही थीं. केंद्र की पात्रता सूची में 106 बच्चों के नाम दर्ज थे. लेकिन सरकार के संपर्क ऐप में यह दर्ज था कि जून और जुलाई का टेक-होम राशन केंद्र तक नहीं पहुंचा. शारदा यादव ने कहा, “पिछले महीने राशन नहीं मिला. बाकी काम नियमित है. एक महीने से ज्यादा हो गया है.”

लाभार्थी संदीप सूर्यवंशी ने कहा कि परिवारों को बताया गया कि ऊपर से सामग्री नहीं आई है. डिजिटल रिकॉर्ड यह साबित करता है कि लाभार्थी मौजूद हैं. वही रिकॉर्ड यह भी दिखाता है कि उनका राशन नहीं पहुंचा. सरकार पोषण वितरण की निगरानी के लिए डिजिटल प्रणाली पर लगातार जोर दे रही है, लेकिन ऐप में की गई प्रविष्टि किसी बच्चे का पेट नहीं भर सकती.

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इस मोबाइल एप पर होती है पूरे राशन की जानकारी.  

सामान से भरा कमरा, पेड़ के नीचे बैठे बच्चे

आगर-मालवा के ही एक दूसरे केंद्र में आंगनवाड़ी सहायिका प्रेम बाई बच्चों को नीम के पेड़ के नीचे भोजन करा रही थीं. आंगनवाड़ी का एकमात्र कमरा सामग्री से भरा हुआ था. बच्चों के बैठने तक की पर्याप्त जगह नहीं थी. बिजली और पंखे की व्यवस्था भी नहीं थी. केंद्र में लगभग 40 बच्चे पंजीकृत हैं. कार्यकर्ता के मुताबिक करीब एक महीने से टेक-होम राशन नहीं आया था. कमरा सामान से भरा था, लेकिन बच्चों के लिए तय पोषण आहार मौजूद नहीं था.

सागर में करीब तीन महीने से राशन नहीं

सागर के कटरा इलाके में दो आंगनवाड़ी केंद्रों की पड़ताल की गई. दोनों केंद्रों में मिलाकर दस से ज्यादा गर्भवती महिलाएं और करीब 30 बच्चे पंजीकृत हैं. दोनों जगह कार्यकर्ताओं ने बताया कि टेक-होम राशन लगभग तीन महीने से नहीं पहुंचा. आंगनवाड़ी सहायिका वर्षा रजक ने कहा, “करीब तीन महीने हो गए हैं. गर्भवती महिलाओं को हलवा, गेहूं-सोया बर्फी और खिचड़ी दी जाती है, लेकिन सामग्री नहीं आई.”

दूसरी सहायिका मेनका भदौरिया ने भी लगभग तीन महीने से राशन नहीं पहुंचने की बात कही. तीन महीने कोई मामूली प्रशासनिक देरी नहीं है. तीन वर्ष से कम उम्र के बच्चे के लिए यह शारीरिक और मानसिक विकास का महत्वपूर्ण समय है. बाद में अतिरिक्त पैकेट भेज देने से यह नहीं माना जा सकता कि नुकसान की भरपाई हो गई.

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बच्चों की आंगवाड़ियां तो रंग-बीरंगी हैं लेकिन थाली खाली है.  

एक साल की बच्ची का वजन सिर्फ 4.8 किलो

विदिशा जिले के जतरपुरा में रहने वाली पूजा आदिवासी की एक वर्षीय बेटी का वजन केवल 4.8 किलोग्राम है.  पूजा का कहना है कि कभी-कभार दलिया या सत्तू का पैकेट मिल जाता है, लेकिन आपूर्ति नियमित नहीं है. उन्होंने कहा, “बच्ची एक साल की है और वजन 4.8 किलो है. दलिया मिलता है, बाकी कुछ नहीं. पंद्रह दिन से सत्तू का पैकेट भी नहीं मिला. कहते हैं ऊपर से सामान नहीं आया.” 

पूजा की बच्ची किसी रजिस्टर की केवल एक संख्या नहीं है. इतने कम वजन वाले बच्चे के लिए पोषण की हर रुकावट उसके स्वास्थ्य, विकास और जीवन पर सीधा खतरा बन सकती है.

जिन बच्चों को व्यवस्था जानती थी, उन्हें भी नहीं बचा सकी

यह आपूर्ति संकट ऐसे समय सामने आया है, जब गंभीर रूप से कम वजन वाले बच्चों की मौतें पहले ही मध्य प्रदेश की पोषण व्यवस्था की कमजोरियां उजागर कर चुकी हैं. अप्रैल 2026 में सतना जिले के मझगवां विकासखंड में चार महीने की सुप्रियांशी की मौत हो गई. उसका वजन सिर्फ 2.86 किलोग्राम था. उसके जुड़वां भाई नैतिक का वजन भी तीन किलोग्राम से कम था.

सुप्रियांशी पोषण ट्रैकर पर पंजीकृत थी. वह व्यवस्था के लिए अदृश्य बच्ची नहीं थी. उसका नाम सरकारी डेटाबेस में मौजूद था. लेकिन उसका पंजीकरण ऐसी नियमित निगरानी और समय पर हस्तक्षेप में नहीं बदल सका, जो उसकी जान बचा पाता. अगस्त 2025 में शिवपुरी की 15 महीने की दिव्यांशी की मौत हुई थी. मृत्यु के समय उसका वजन केवल 3.7 किलोग्राम था. उसका हीमोग्लोबिन 7.4 ग्राम था, यानी वह गंभीर एनीमिया से भी जूझ रही थी. दिव्यांशी की पहचान भी सरकारी अभियान के दौरान की गई थी और उसका नाम पोषण ट्रैकर पर दर्ज था. व्यवस्था ने उसे देखा था. उसे गिना था. उसका रिकॉर्ड बनाया था लेकिन उसे बचा नहीं सकी.

सुप्रियांशी की मौत से करीब छह महीने पहले सतना में चार महीने के हुसैन रजा की भी मौत हुई थी. बताया गया कि जन्म के समय उसका वजन सामान्य, करीब तीन किलोग्राम था. लेकिन चार महीने बाद जब उसे अस्पताल लाया गया, तब उसका वजन घटकर केवल 2.5 किलोग्राम रह गया था. वह निमोनिया और गंभीर कम वजन की स्थिति से जूझ रहा था.

जांच में सामने आया कि उसे कभी पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती नहीं कराया गया. सरकारी रिकॉर्ड में उसकी पहचान गंभीर कुपोषित बच्चे के रूप में भी नहीं की गई थी. यह अंतर बेहद भयावह है. सुप्रियांशी और दिव्यांशी व्यवस्था में दर्ज थीं, लेकिन बचाई नहीं जा सकीं. हुसैन की तो उस व्यवस्था ने ठीक से पहचान तक नहीं की, जो ऐसे ही बच्चों को बचाने के लिए बनाई गई थी. एक बच्चा गिना गया, लेकिन सुरक्षित नहीं किया गया. दूसरा गिना ही नहीं गया.

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इसी राशन की थैली में आता है पोषण आहार. 

रिकॉर्ड कार्यकर्ता संभालें, राशन उनके हाथ में नहीं

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों और महिलाओं को केंद्र तक बुलाएं, वजन दर्ज करें, रजिस्टर भरें, मोबाइल ऐप अपडेट करें, माताओं को सलाह दें और लाभार्थियों के सवालों का जवाब दें. लेकिन उत्पादन, परिवहन और वितरण पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है. जब राशन नहीं आता, तो उसी स्थानीय कार्यकर्ता को मां के सामने खड़े होकर कहना पड़ता है कि स्टॉक ऊपर से नहीं आया. फैसले भोपाल में लिए जाते हैं.
जवाब गांवों, कस्बों और बस्तियों में बैठी आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को देना पड़ता है. यही दूरी इस संकट के केंद्र में है.

सरकार ने समस्या मानी, मॉडल फिर बदला

महिला एवं बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया ने स्वीकार किया कि आपूर्ति व्यवस्था में दिक्कतें आई हैं. उन्होंने कहा, “हां, कुछ समस्याएं रही हैं. हमने उन्हें दूर करने का प्रयास किया है और आगे व्यवस्था को सुचारु रूप से चला पाएंगे.” राज्य मंत्रिमंडल ने अब टेक-होम राशन का जिम्मा राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन से वापस लेकर महिला एवं बाल विकास विभाग को सौंपने का फैसला किया है.

सरकार को उम्मीद है कि इससे समन्वय और वितरण बेहतर होगा. लेकिन 2018 के बाद यह पांचवां बदलाव है. विभाग बदले. एजेंसियां बदलीं. उत्पादन मॉडल बदला. वितरण प्रणाली बदली. लेकिन आपूर्ति श्रृंखला के अंतिम छोर पर इंतजार कर रहे बच्चे नहीं बदले.

कुपोषित बच्चे पर रोज ₹8

राज्य में कुपोषित बच्चे के पोषण पर प्रतिदिन लगभग ₹8 और गंभीर कुपोषित बच्चे पर करीब ₹12 खर्च किए जाते हैं. गर्भवती महिला को प्रतिदिन लगभग 20 ग्राम प्रोटीन उपलब्ध कराने की योजना की लागत करीब ₹9.50 है. इतनी छोटी राशि से राज्य के व्यापक कुपोषण संकट से लड़ने की अपेक्षा की जा रही है.

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 के आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में पांच वर्ष से कम उम्र के 31.4 प्रतिशत बच्चे ठिगनेपन, यानी स्टंटिंग, से प्रभावित हैं. कम वजन वाले बच्चों का प्रतिशत 33 से बढ़कर 39.7 हो गया है. दुबलेपन, यानी वेस्टिंग, का आंकड़ा 18.9 प्रतिशत से बढ़कर 23.8 प्रतिशत हो गया है. छह से 23 महीने तक के केवल 12 प्रतिशत बच्चों को न्यूनतम स्वीकार्य आहार मिल रहा है. इसका अर्थ है कि करीब 88 प्रतिशत छोटे बच्चों को उनकी उम्र के अनुरूप पर्याप्त और विविध भोजन नहीं मिल रहा.

पहले छह महीने तक केवल स्तनपान कराने की दर भी 74 प्रतिशत से घटकर 56.4 प्रतिशत रह गई है. ये आंकड़े बताते हैं कि संकट केवल राशन के पैकेट देर से पहुंचने का नहीं है. यह भोजन की मात्रा, गुणवत्ता और विविधता का भी संकट है. यह एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातस्थिति है, जो घरों और आंगनवाड़ी केंद्रों के भीतर चुपचाप फैल रही है.

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पोषण आहार का स्टॉक रजीस्टर. 

पहले भी सवालों के घेरे में रही योजना

मध्य प्रदेश की टेक-होम राशन योजना पहली बार सवालों के घेरे में नहीं आई है. वर्ष 2022 में NDTV की पड़ताल में सामने आया था कि सरकारी रिकॉर्ड में पोषण आहार ढोने वाले कई वाहनों के पंजीकरण नंबर मोटरसाइकिलों, ऑटो-रिक्शा और टैंकरों के निकले. करीब 400 मीट्रिक टन पोषण आहार के परिवहन और वितरण को लेकर गंभीर सवाल उठे थे. इन खुलासों के बाद सड़क से विधानसभा तक राजनीतिक हंगामा हुआ.

दो वर्ष बाद नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट ने भी 2018 से 2021 के बीच लगभग ₹428 करोड़ की अनियमितताओं की ओर इशारा किया. चेतावनियां पहले से मौजूद थीं. ऑडिट रिपोर्ट सामने थी. वाहनों के फर्जी या संदिग्ध रिकॉर्ड उजागर हो चुके थे. फिर भी वर्षों बाद आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अब भी वही वाक्य दोहरा रही हैं राशन नहीं आया.

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