- 2026 के पहले सात महीनों में मध्य प्रदेश में बाघों की मौत का आंकड़ा 40 तक पहुंच गया है जो चिंताजनक है.
- करंट लगने से हुई बाघों की मौतें खासकर मंडला, शहडोल, उमरिया और सिवनी जिलों में सामने आई हैं.
- मध्य प्रदेश में 2012 से 2025 के बीच देश में हुई कुल बाघ मौतों का सबसे अधिक हिस्सा दर्ज हुआ है.
29 जुलाई को दुनिया भर में विश्व बाघ दिवस मनाया जा रहा है. मध्य प्रदेश में भी बाघों के संरक्षण और उनकी बढ़ती संख्या को लेकर उपलब्धियां गिनाई जाएंगी. लेकिन इस जश्न के बीच एक कड़वा सच भी सामने खड़ा है. जिस राज्य को देश का "टाइगर स्टेट" कहा जाता है, वहीं बाघों की मौत के आंकड़े लगातार चिंता बढ़ा रहे हैं.
साल 2026 के सिर्फ सात महीनों में मध्य प्रदेश में 40 बाघों की मौत हो चुकी है. यह संख्या न सिर्फ प्रदेश के लिए चेतावनी है, बल्कि वन्यजीव संरक्षण की व्यवस्थाओं पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है. जंगलों से लेकर गांवों की सरहद तक बाघों के सामने बढ़ते खतरे अब साफ दिखाई देने लगे हैं.
सात महीने में 40 बाघों की मौत
वन विभाग के रिकॉर्ड के मुताबिक, 1 जनवरी से 28 जुलाई 2026 तक मध्य प्रदेश में 40 बाघों की मौत दर्ज की गई है. पूरे देश में इस दौरान करीब 114 बाघों की मौत हुई, जिनमें अकेले 40 मौतें मध्य प्रदेश में हुई हैं. पिछले साल इसी अवधि में 33 बाघों की मौत हुई थी. ऐसे में इस बार के आंकड़े और ज्यादा चिंताजनक माने जा रहे हैं.
करंट के जाल ने छीनी कई बाघों की जान
इस साल हुई मौतों में कई मामले ऐसे हैं, जिनमें बाघ अवैध रूप से बिछाए गए बिजली के तारों की चपेट में आ गए. रिकॉर्ड के अनुसार पांच बाघों की मौत करंट लगने से हुई. एक मामले में शिकार की पुष्टि भी हुई है. इसके अलावा आपसी संघर्ष, बीमारी, खुले कुओं में गिरने और प्राकृतिक कारणों को भी मौत की वजह बताया है. करंट से हुई मौतों के मामले मंडला, शहडोल, उमरिया और सिवनी जिलों से सामने आए हैं.
सबसे ज्यादा बाघ, सबसे ज्यादा मौतें
मध्य प्रदेश लंबे समय से देश में सबसे अधिक बाघों वाला राज्य रहा है. लेकिन दुखद पहलू यह है कि मौतों के मामले में भी प्रदेश शीर्ष पर बना हुआ है. एनटीसीए के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2012 से 2025 तक देश में 1,581 बाघों की मौत हुई, जिनमें से 423 मौतें अकेले मध्य प्रदेश में दर्ज की गईं. वर्ष 2023 में प्रदेश में 45, वर्ष 2024 में 47 और वर्ष 2025 में 55 बाघों की मौत हुई थी. अब 2026 के शुरुआती सात महीनों में ही यह आंकड़ा 40 तक पहुंच चुका है.
वन विभाग कई मामलों में मौत की वजह आपसी संघर्ष, बीमारी या प्राकृतिक कारण बताता है. हालांकि वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोग मानते हैं कि कई मामलों की गहराई से जांच की जरूरत है. उनका कहना है कि कुछ घटनाएं शिकार और लापरवाही की ओर भी इशारा करती हैं, जिन्हें सिर्फ प्राकृतिक कारण बताकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.

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शहडोल में एक रात में खत्म हो गए दो बाघ
शहडोल जिले के जयसिंहनगर रेंज के करपा बीट में एक दर्दनाक घटना सामने आई. यहां किसान के खेत में लगाए गए करंट की चपेट में आकर नर और मादा बाघ की मौत हो गई. दोनों के शव सुबह ग्रामीणों को दिखाई दिए, जिसके बाद वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची. इस घटना ने जंगल से बाहर बढ़ते खतरों को उजागर कर दिया.
छिंदवाड़ा जिले में एक रेडियो कॉलर लगे बाघ की मौत ने भी वन अमले को चौंका दिया. यह बाघ बांधवगढ़ से लाकर सतपुड़ा क्षेत्र में छोड़ा था. जब उसका लोकेशन सिग्नल बंद हुआ तो टीम तलाश में निकली. जांच के दौरान एक जहरीला बैल मिला और कुछ दूरी पर गड्ढे में दबा बाघ का शव बरामद हुआ. इस मामले ने शिकार और जहर देकर मारने की आशंका को मजबूत किया.
सतना में सूअर के लिए बिछाया करंट, बाघ की गई जान
सतना जिले के मझगवां क्षेत्र में जंगली सूअरों को रोकने के लिए खेतों के आसपास बिजली का करंट बिछाया था. इसी करंट की चपेट में आने से एक बाघ की मौत हो गई. वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामले मानव और वन्यजीव संघर्ष की गंभीर तस्वीर पेश करते हैं.
बढ़ती संख्या से बढ़ा दबाव
विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष 2014 से 2022 के बीच देश में बाघों की संख्या में करीब 65 प्रतिशत वृद्धि हुई, जबकि मध्य प्रदेश में यह बढ़ोतरी 155 प्रतिशत तक रही. प्रदेश में बाघों की संख्या 785 से बढ़कर अब लगभग एक हजार के आसपास पहुंच गई. अधिक संख्या के कारण जंगलों में क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ रहा है और कई बाघ भोजन तथा नए इलाके की तलाश में गांवों और खेतों की ओर पहुंच रहे हैं.

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टाइगर रिजर्व के बाहर ज्यादा खतरा
एनटीसीए के आंकड़े बताते हैं कि बाघों की मौत सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं है. करीब 47.5 प्रतिशत मौतें टाइगर रिजर्व के बाहर हुई हैं. वहीं बाघों की खाल और अंगों की 80 प्रतिशत से अधिक बरामदगी भी संरक्षित क्षेत्रों के बाहर हुई है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह अवैध शिकार और तस्करी के खतरे की ओर संकेत करता है.
क्या कहते हैं वन्यजीव विशेषज्ञ?
वाइल्डलाइफ एक्टिविस्ट अजय दुबे का कहना है कि बाघों की मौत रोकने के लिए वन्यजीव अपराधों की निगरानी मजबूत करनी होगी. इसके लिए फील्ड में विशेष अधिकारियों की तैनाती बढ़ाने, मुखबिर तंत्र को सक्रिय करने और ग्रामीणों के साथ बेहतर संवाद स्थापित करने की जरूरत है. उनका मानना है कि बिजली के तार, जहर और शिकार के अन्य तरीकों पर सख्ती से रोक लगाने के साथ-साथ वन्यजीव अपराधों में दोषसिद्धि की दर बढ़ाई जानी चाहिए. इससे कानून का डर बढ़ेगा और शिकारियों की गतिविधियों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा.
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