पंजाब में BJP-अकाली का साथ आना क्या AAP, कांग्रेस के लिए बन सकता है चुनौती? आंकड़ों में समझें

पंजाब की राजनीति में बीजेपी और अकाली दल की दोस्ती का इतिहास काफी पुराना है. 1990 के दशक की शुरुआत में दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़े, लेकिन 1996 में अकाली दल के मोगा डिक्लेरेशन के बाद दोनों दलों के बीच राजनीतिक नजदीकी बढ़ी.

पंजाब में BJP-अकाली का साथ आना क्या AAP, कांग्रेस के लिए बन सकता है चुनौती? आंकड़ों में समझें
पंजाब की राजनीति

पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर तैयारियां अभी से तेज हो गई हैं. सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीति पर काम कर रहे हैं. राजनीतिक गलियारों में चर्चा तो यह भी है कि करीब 25 साल पुराने दोस्त फिर साथ आ सकते हैं. भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के बीच गठबंधन की चर्चा तब से तेज हुई है जब सुखबीर सिंह बादल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात हुई. हालांकि, दोनों दलों की ओर से गठबंधन को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है.

BJP-अकाली दल की दोस्ती का इतिहास

पंजाब की राजनीति में बीजेपी और अकाली दल की दोस्ती का इतिहास काफी पुराना है. 1990 के दशक की शुरुआत में दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़े, लेकिन 1996 में अकाली दल के मोगा डिक्लेरेशन के बाद दोनों दलों के बीच राजनीतिक नजदीकी बढ़ी. मोगा डिक्लेरेशन के जरिए पंजाबी आईडेंटिटी, आपसी सौहार्द और राष्ट्रीय सुरक्षा पर फोकस रहा.  इसके बाद 1997 में पहली बार बीजेपी और अकाली दल ने साथ मिलकर पंजाब विधानसभा चुनाव लड़ा और सत्ता में आए.

Advertisement - Scroll to continue

इसके बाद दोनों दल लंबे समय तक एक-दूसरे के सहयोगी बने रहे. 2007 और 2012 में गठबंधन ने लगातार दो बार पंजाब में सरकार बनाई. 2017 में भी दोनों ने साथ चुनाव लड़ा, लेकिन सत्ता कांग्रेस के हाथ चली गई. 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर दोनों दलों का गठबंधन टूट गया.

इस गठबंधन के पीछे दोनों दलों का अपना-अपना राजनीतिक आधार था. अकाली दल की पंजाब के ग्रामीण और सिख मतदाताओं के बीच मजबूत पकड़ थी, जबकि बीजेपी का आधार मुख्य रूप से शहरी और हिंदू मतदाताओं में रहा. गठबंधन के दौरान दोनों दल एक-दूसरे के वोट बैंक को जोड़ने की कोशिश करते थे.

पंजाब की आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी करीब 38.5 फीसदी है. बीजेपी लंबे समय से राज्य की उन विधानसभा सीटों पर खास ध्यान देती रही है, जहां हिंदू आबादी 60 फीसदी या उससे ज्यादा है. 

1997 से अब तक पंजाब विधानसभा चुनाव के नतीजे

1997 में पहली बार बीजेपी और अकाली दल ने साथ मिलकर पंजाब विधानसभा चुनाव लड़ा. 117 सीटों वाली विधानसभा में अकाली दल ने 75 सीटें जीतीं, जबकि बीजेपी के खाते में 18 सीटें आईं. यानी गठबंधन ने कुल 93 सीटों पर जीत दर्ज की. अकाली दल का वोट शेयर 37.64 फीसदी और बीजेपी का 8.33 फीसदी रहा. कांग्रेस सिर्फ 14 सीटों पर सिमट गई और उसका वोट शेयर 26.59 फीसदी रहा.

2002 के पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जोरदार वापसी की. कांग्रेस ने 62 सीटें जीतीं, जबकि अकाली दल को 41 और बीजेपी को सिर्फ 3 सीटें मिलीं. यानी अकाली दल और बीजेपी गठबंधन कुल 44 सीटों पर सिमट गया. कांग्रेस का वोट शेयर करीब 35.81 फीसदी और अकाली दल का 31.08 फीसदी रहा.

2007 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल-बीजेपी गठबंधन ने फिर वापसी की. अकाली दल ने 48 सीटें जीतीं और बीजेपी को 19 सीटें मिलीं. गठबंधन के खाते में कुल 67 सीटें आईं. कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट गई. अकाली दल का वोट शेयर 37.09 फीसदी और बीजेपी का 8.28 फीसदी रहा.

इसके बाद 2012 के पंजाब विधानसभा चुनाव में अकाली दल-बीजेपी गठबंधन ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाई. इस चुनाव में अकाली दल को 56 सीटें मिलीं, जबकि बीजेपी ने 12 सीटें जीतीं. दोनों दलों ने मिलकर 68 सीटें अपने नाम कीं. कांग्रेस 46 सीटों पर रही.

लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में पंजाब की राजनीति की तस्वीर बदल गई. कांग्रेस ने जबरदस्त वापसी करते हुए 77 सीटें जीत लीं. आम आदमी पार्टी ने पहली बार बड़ी एंट्री करते हुए 20 सीटें जीतीं. अकाली दल 15 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रहा, जबकि बीजेपी को सिर्फ 3 सीटें मिलीं. कांग्रेस का वोट शेयर करीब 38.77 फीसदी, अकाली दल का 25.42 फीसदी, आप का 23.88 फीसदी और बीजेपी का 5.43 फीसदी रहा.

2022 के विधानसभा चुनाव में तो और बड़ा बदलाव देखने को मिला. आम आदमी पार्टी की लहर में कांग्रेस और अकाली दल दोनों पीछे रह गए. आप ने 92 सीटें जीतीं, कांग्रेस 18 सीटों पर सिमट गई, अकाली दल को सिर्फ 3 और बीजेपी को 2 सीटें मिलीं. आप का वोट शेयर 42.31 फीसदी, कांग्रेस का 23.15 फीसदी, अकाली दल का 18.52 फीसदी और बीजेपी का 6.65 फीसदी रहा.

लोकसभा चुनावों में भी दिखा गठबंधन का फायदा

अगर लोकसभा चुनाव की बात करें तो कई मौकों पर बीजेपी और अकाली दल के साथ आने का फायदा दोनों दलों को मिला है.

1998 के लोकसभा चुनाव में पंजाब की 13 सीटों में से अकाली दल ने 8 और बीजेपी ने 3 सीटें जीतीं. यानी दोनों दलों ने मिलकर 11 सीटें अपने नाम कीं. बाकी दो सीटों पर जनता दल और निर्दलीय उम्मीदवार जीते.

1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने जोरदार वापसी करते हुए 8 सीटें जीतीं. अकाली दल को 2 और बीजेपी को 1 सीट मिली. यानी बीजेपी-अकाली गठबंधन सिर्फ 3 सीटों तक सिमट गया.

2004 के लोकसभा चुनाव में अकाली दल और बीजेपी गठबंधन ने फिर जोरदार वापसी की. अकाली दल ने 8 और बीजेपी ने 3 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 2 सीटें मिलीं.

2009 में कांग्रेस ने फिर बढ़त बनाई और 8 सीटें जीत लीं. अकाली दल को 4 और बीजेपी को 1 सीट मिली.

2014 के लोकसभा चुनाव में पंजाब की राजनीति में आम आदमी पार्टी की एंट्री हुई. आप ने 4 सीटें जीतीं. अकाली दल को भी 4 सीटें मिलीं, कांग्रेस ने 3 और बीजेपी ने 2 सीटें जीतीं. बीजेपी-अकाली गठबंधन ने मिलकर 6 सीटें अपने नाम कीं.

2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने फिर वापसी की और 8 सीटें जीत लीं. उसका वोट शेयर करीब 40.58 फीसदी रहा. बीजेपी और अकाली दल ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और दोनों को कुल 4 सीटें मिलीं-अकाली दल 2 और बीजेपी 2. दोनों का संयुक्त वोट शेयर करीब 37.5 फीसदी रहा.

2024 के लोकसभा चुनाव में अकाली दल और बीजेपी अलग-अलग चुनाव लड़े. इसका नुकसान दोनों को उठाना पड़ा. अकाली दल को सिर्फ 1 सीट मिली, जबकि बीजेपी अपना खाता भी नहीं खोल सकी. हालांकि, बीजेपी का वोट शेयर 18.56 फीसदी रहा. कांग्रेस ने 7 और आम आदमी पार्टी ने 3 सीटें जीतीं.

2024 का लोकसभा चुनाव डिकोड

2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों को देखें तो बीजेपी गुरदासपुर, जालंधर और लुधियाना जैसी सीटों पर दूसरे स्थान पर रही. ऐसे में अगर बीजेपी और अकाली दल के वोट को जोड़कर देखा जाए तो कुछ सीटों पर मुकाबले का गणित काफी अलग नजर आता है.

गुरदासपुर

गुरदासपुर सीट पर कांग्रेस के सुखजिंदर सिंह रंधावा ने जीत दर्ज की. उन्हें 3,64,043 वोट मिले. दूसरे नंबर पर बीजेपी के दिनेश सिंह बब्बू रहे, जिन्हें 2,81,182 वोट मिले. तीसरे स्थान पर आम आदमी पार्टी के अमनशेर सिंह रहे, जिन्हें 2,77,252 वोट मिले. अकाली दल के डॉ. दलजीत सिंह चीमा को 85,500 वोट मिले.

बीजेपी का वोट शेयर करीब 26.17 फीसदी और अकाली दल का करीब 7.96 फीसदी रहा. दोनों को जोड़ने पर संयुक्त वोट शेयर करीब 34.13 फीसदी बैठता है. यानी अगर दोनों दल साथ चुनाव लड़ते तो इस सीट पर मुकाबला काफी करीबी हो सकता था. कांग्रेस का वोट शेयर इस सीट पर 33.88 फीसदी था.

जालंधर

जालंधर सीट पर कांग्रेस के चरणजीत सिंह चन्नी ने जीत दर्ज की. उन्हें 3,90,053 वोट मिले. बीजेपी के सुशील कुमार रिंकू 2,14,060 वोट के साथ दूसरे स्थान पर रहे. आम आदमी पार्टी के पवन कुमार टीनू को 2,08,889 वोट मिले, जबकि अकाली दल के मोहिंदर सिंह केपी को 67,911 वोट मिले.

बीजेपी का वोट शेयर करीब 21.75 फीसदी और अकाली दल का 6.90 फीसदी रहा. दोनों का वोट जोड़ने पर आंकड़ा करीब 28.65 फीसदी बैठता है. इस सीट पर कांग्रेस का वोट शेयर 39.62 फीसदी रहा था. ऐसे में अगर गठबंधन हो गया होता तो वोटों का बिखराव कम होता और मुकाबला शायद और करीबी रहता. 

लुधियाना

लुधियाना सीट पर कांग्रेस के अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने जीत दर्ज की. उन्हें 3,22,224 वोट मिले. बीजेपी के रवनीत सिंह बिट्टू 3,01,282 वोट के साथ दूसरे स्थान पर रहे. आम आदमी पार्टी के अशोक पराशर पप्पी को 2,37,077 और अकाली दल के रणजीत सिंह ढिल्लों को 90,220 वोट मिले.

यहां बीजेपी का वोट शेयर करीब 28.58 फीसदी और अकाली दल का करीब 8.56 फीसदी रहा. दोनों को जोड़ने पर संयुक्त वोट शेयर करीब 37.14 फीसदी बैठता है. यानी यहां भी बीजेपी-अकाली दल के साथ आने पर वोटों का बिखराव कम हो सकता था और मुकाबला और दिलचस्प हो सकता था.

2022 का विधानसभा चुनाव डीकोड

2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की एकतरफा आंधी चली थी, वो 92 सीटें जीतने में कामयाब रही थी. लेकिन फिर भी कई ऐसी सीटें रहीं जहां पर अगर अकाली-बीजेपी का गठबंधन होता तो नतीजे कुछ अलग भी हो सकते थे. इसके ऊपर एक और पैटर्न यह भी समझ आया है कि बीजेपी-अकाली के गठबंधन से कांग्रेस को ज्यादा नुकसान हो सकता था क्योंकि जिन सीटों पर आम आदमी पार्टी जीती, वहां कई पर वोट शेयर 50 फीसदी से भी ज्यादा दर्ज किया गया. वहीं कांग्रेस जिन सीटों पर जीती वहां उसका औसत वोट शेयर 30 से 35 फीसदी के बीच में रहा. ऐसे में ऐसी सीटें जरूर सामने आई हैं जहां पर अकाली-बीजेपी का कुल वोट शेयर कांग्रेस से ज्यादा रहा और उन सीटों पर नतीजे भी बदल सकते थे.

सबसे पहले नीचे उन सीटों के नतीजे देखते हैं जहां बीजेपी दूसरे नंबर पर रही थी-

सीटबीजेपी वोट शेयरअकाली वोट शेयरबीजेपी-अकाली का कुल वोट

विजेता पार्टी का वोट शेयर

बल्लुआना27.83%12.48%40.31%41.26%
फाजिल्का24.54%9.50%34.04%43.73%
लुधियाना सेंट्रल28.63%8.4137.04%33.55%
लुधियाना नॉर्थ28.66%9.16%37.82%40.89%
लुधियाना साउथ16.85%10.72%27.57%41.77%
राजपुरा23.81%11.05%34.86%40.37%
सुजानपुर32.89%6.22%39.11%36.50%


अब ऊपर दी गई टेबल से दो बातें स्पष्ट हैं. अगर बीजेपी-अकाली का गठबंधन होता तो संभाव होता कि ऊपर दी गई सात सीटों में से तीन पर उनकी जीत हो जाती. यहां समझने वाली बात यह भी है कि वोट ट्रांसफर का खेल सिर्फ दो पार्टियों के वोट शेयर जोड़ने से स्पष्ट नहीं हो सकता, ऐसे में कई सीटों पर विजेता पार्टी से कम संयुक्त वोट शेयर होने के बाद भी मुकाबला काटे का संभव हो सकता है.

अब नीचे दी गई टेबल में उन सीटों के नतीजे देखते हैं जहां अकाली दल दूसरे नंबर पर रही-

सीटअकाली वोट शेयरबीजेपी वोट शेयरअकाली-बीजेपी का वोट शेयर

विजेता पार्टी का वोट शेयर

अमलोह24.90%8.36%33.26%46.64%
अमृतसर उत्तर24.25%11.28%35.53%47.28%
अटारी29.19%2.01%31.20%44.81%
बलाचौर30.71%4.87%35.58%34.68%
बरनाला20.80%6.98%27.78%49.59%
भुचो मंडी24.00%1.57%25.57%57.89%
डेरा बाबा नानक36.36%1.34%37.70%36.69%
फरीदकोट28.41%1.88%30.29%41.41%
गिल19.21%7.02%26.23%50.80%
गुरदासपुर29.49%7.95%37.44%35.43%
गुरु हर सहाय41.57%2.87%44.44%49.18%
जगराओं20.52%3.60%24.12%52.39%
जलालाबाद35.21%3.15%38.36%53.21%
खन्ना20.96%9.90%30.86%48.81%
खरड़22.95%8.67%31.62%44.49%
लांबी40.84%0.83%41.67%49.31%
मुक्तसर28.35%7.16%35.51%51.37%
राजा सांसी31.29%1.82%33.11%35.43%
समराला20.11%1.76%21.87%43.41%
शाहकोट30.07%1.10%31.17%39.24%
श्री हरगोबिंदपुर29.45%1.07%30.52%43.23%
तलवंडी साबो25.65%3.35%29%37.33%
तरनतारन30.34%0.91%31.25%40.81%
जीरा27.41%1.33%28.74%42.54%

ऊपर दी गई टेबल से पता चलता कि अगर सिर्फ वोट शेयर जोड़ा जाए तो बीजेपी-अकाली तीन और सीटें जीत सकती थी. वहीं राजा सांसी, शाहकोट, तलवंडी साबो, तरनतारन, गुरु हर सहाय और लांबी ऐसी सीटें रहीं जहां मुकाबला काफी नजदीक का बन जाता.