Tantya Bhil Statue Scam:मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों आदिवासी नायक टंट्या भील का नाम हर बड़े मंच की शोभा है. उन्हें 'भारत का रॉबिन हुड' कहा जाता है, जिन्होंने अंग्रेज़ों से सात साल तक लोहा लिया और आखिरकार युवावस्था में फांसी चढ़ा दिए गए. लेकिन जब सम्मान देने की बारी आई, तो सिस्टम ने अपना असली रंग दिखा दिया. खरगोन के बिस्टान नाका चौराहे पर लगी उनकी नई प्रतिमा आज श्रद्धा की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की गवाह बन गई है जहाँ महान क्रांतिकारियों की यादें भी भ्रष्टाचार के फाइबर में ढाल दी जाती हैं.
वीआईपी दौरों की चमक और गाँवों का अंधेरा
टंट्या मामा का जन्मस्थान बड़ौदा-अहिर गांव हर चुनाव में किसी 'तीर्थ' से कम नहीं होता. राहुल गांधी की पदयात्रा हो या मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर, सत्ता का हर रास्ता इस धूल भरी सड़क से होकर गुजरता है. हैरानी की बात यह है कि जिस गांव के नाम पर राजनीति चमकती है, वहां के 200 से अधिक परिवार आज भी गरीबी रेखा के नीचे संघर्ष कर रहे हैं.यह विरोधाभास साफ करता है कि सत्ता के लिए टंट्या मामा का नाम सिर्फ एक 'चुनावी चाबी'है, जिसका इस्तेमाल बंद ताले खोलने के लिए तो होता है, लेकिन उन तालों के पीछे की गरीबी दूर करने के लिए नहीं.
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धातु का वादा और 'प्लास्टिक' का खेल
भ्रष्टाचार की सबसे भद्दी तस्वीर तब सामने आई जब नगर पालिका ने टंट्या मामा की मूर्ति के नाम पर सरकारी खजाने से 9.90 लाख रुपये का भुगतान कर दिया. आधिकारिक रिकॉर्ड और कलेक्टर के निर्देशों में स्पष्ट था कि प्रतिमा संगमरमर या अष्टधातु की होगी. लेकिन जब 15 नवंबर को अनावरण हुआ, तो वहां 9 फुट की फाइबर (FRP) की मूर्ति खड़ी कर दी गई. जानकारों के मुताबिक इस फाइबर मूर्ति की असली कीमत एक लाख रुपये भी नहीं है. यानी आदिवासियों के नायक के नाम पर करीब 9 लाख रुपये का सीधा 'कमीशन' खेल दिया गया.
कागजी माफी और चुनावी गणित
अब जब मामला खुला और कांग्रेस ने दस्तावेजों के साथ मोर्चा खोला,तो प्रशासन 'त्रुटि' का हवाला दे रहा है. नगर पालिका अधिकारी कह रहे हैं कि ठेकेदार ने लिखित माफी मांग ली है और जांच की जाएगी. लेकिन सवाल यह है कि विधायक और अध्यक्ष की मौजूदगी में हुए इस भव्य अनावरण के दौरान क्या किसी की नजर इस 'फाइबर' वाले धोखे पर नहीं पड़ी? दरअसल,यह चूक नहीं बल्कि वह आत्मविश्वास है जो जानता है कि आदिवासी अस्मिता के नाम पर कुछ भी परोसा जा सकता है. मध्य प्रदेश की 84 विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाने वाले आदिवासियों को शायद यह 'फाइबर' वाला सम्मान कभी रास नहीं आएगा.
क्या प्रतीकों तक सीमित रहेगा सम्मान?
टंट्या मामा ने कभी अंग्रेजों के खिलाफ स्वाभिमान की लड़ाई लड़ी थी, लेकिन आज उनकी स्मृति खुद को राजनीतिक व्यापार बनने से बचाने के लिए लड़ रही है. विडंबना देखिए, जिस योद्धा ने शोषण के खिलाफ हथियार उठाए थे, आज उसी के नाम पर शोषण की नई इबारत लिखी जा रही है. जब तक नायक सिर्फ मूर्तियों और टेंडरों तक सीमित रहेंगे, तब तक बड़ौदा-अहिर जैसे गाँवों की सड़कें धूल ही उड़ाती रहेंगी और सत्ता के गलियारों में श्रद्धा की जगह 'सौदा' होता रहेगा.
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