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धार में 'मां सरस्वती लोक' और राजा भोज रिसर्च इंस्टीट्यूट बनेगा, कैसे पुनर्जीवित होगी भोजशाला की ऐतिहासिक-बौद्धिक विरासत?

भोजशाला से जुड़ी ऐतिहासिक और बौद्धिक विरासत को पुनर्जीवित करने के लिए सरकार सभी आवश्यक कदम उठाएगी. भोजशाला परिसर में “मां सरस्वती लोक” का निर्माण किया और धार में “राजा भोज रिसर्च इंस्टीट्यूट” भी बनाया जाएगा. यह ऐलान सीएम मोहन यादव ने किया, वे भोजशाला पर आए हाईकोर्ट के फैसले के 10 दिन बाद दर्शन करने गए थे.

धार में 'मां सरस्वती लोक' और राजा भोज रिसर्च इंस्टीट्यूट बनेगा, कैसे पुनर्जीवित होगी भोजशाला की ऐतिहासिक-बौद्धिक विरासत?
Maa Saraswati Lok' and Raja Bhoj Research Institute to be Built in Dhar: Mega Plan to Revive Bhojshala Legacy.

जिस भोजशाला को परमार राजा भोज ने ज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित किया उस ऐतिहासिक मान्यता के करीब एक हजार साल बाद, और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने विवादित परिसर को मां सरस्वती को समर्पित मंदिर घोषित किया, इस फैसले के लगभग 10 दिन बाद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सोमवार 25 मई को धार की ऐतिहासिक भोजशाला को एक बड़े राजनीतिक, सांस्कृतिक और विकासात्मक ऐलान का केंद्र बना दिया. 

धार स्थित भोजशाला परिसर में पूजा-अर्चना करने के बाद मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि राज्य सरकार भोजशाला परिसर में भव्य “मां सरस्वती लोक” का निर्माण कराएगी. इसके साथ ही धार में “राजा भोज रिसर्च इंस्टीट्यूट” भी स्थापित किया जाएगा. मुख्यमंत्री ने कहा-  सरकार हाईकोर्ट के आदेश का अक्षरशः पालन सुनिश्चित करेगी और पुरातत्व विभाग के समन्वय से भोजशाला से जुड़ी ऐतिहासिक और बौद्धिक विरासत को पुनर्जीवित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगी. 

यह घोषणा उस ऐतिहासिक फैसले के करीब दस दिन बाद हुई है, जिसमें 15 मई 2026 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने भोजशाला परिसर को मां सरस्वती को समर्पित हिंदू मंदिर घोषित किया था. इस फैसले के बाद वह पुरानी व्यवस्था प्रभावी रूप से समाप्त हो गई, जिसके तहत एएसआई की व्यवस्था के अनुसार मंगलवार को हिंदू पक्ष पूजा करता था और शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष नमाज अदा करता था. हाईकोर्ट के इस फैसले से असंतुष्ट मुस्लिम पक्ष अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है.

प्राचीन ज्ञान परंपरा का प्रतीक

ऐसी जगह पर खड़े होकर, जहां दशकों से आस्था, इतिहास और अदालत की कार्यवाही एक-दूसरे से टकराती रही हैं, डॉ. यादव ने इस फैसले को 750 वर्षों के संघर्ष की सफल परिणति बताया. उन्होंने कहा कि धार में अब एक नए युग की शुरुआत हुई है. मुख्यमंत्री के अनुसार, राजा भोज से जुड़ी भोजशाला केवल पत्थरों की कोई इमारत नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का प्रतीक है. वह स्थान जहां कभी संस्कृत, विज्ञान, शोध और शास्त्रार्थ की परंपरा फलती-फूलती थी. 

औद्योगिक विकास की नई धारा बहेगी 

मुख्यमंत्री ने इस घोषणा को धार के व्यापक विकास रोडमैप से भी जोड़ा. उन्होंने कहा- राजा भोज की इस पावन भूमि पर अब विरासत संरक्षण से लेकर जल संरक्षण और औद्योगिक विकास तक समग्र विकास की नई धारा बहेगी. राजा भोज को जल प्रबंधन का अग्रदूत बताते हुए मुख्यमंत्री ने धार की पुरानी पहचान “तालाबों की नगरी” के रूप में याद की. उन्होंने कहा कि यहां बारह-साढ़े बारह तालाबों की ऐसी व्यवस्था बनाई गई थी, जिसमें एक तालाब भरने के बाद उसका अतिरिक्त पानी अपने आप अगले तालाब में पहुंच जाता था. 

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सीएम का दौरान एक नए अध्याय का संकेत

सीएम यादव का यह दौरा राजनीतिक और प्रतीकात्मक दोनों दृष्टि से अहम था. हाईकोर्ट के फैसले के बाद उनका भोजशाला परिसर में यह पहला दौरा था. इसलिए यह केवल एक प्रशासनिक या धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि भोजशाला की बदलती कहानी में एक नए अध्याय का संकेत भी माना जा रहा है. 

भोजशाला एमपी के सबसे विवादित और संवेदनशील विरासत में से एक  

हालांकि भोजशाला की कहानी बेहद संवेदनशील और परतदार है. हिंदू पक्ष लंबे समय से इसे मां वाग्देवी का प्राचीन मंदिर और राजा भोज से जुड़ा संस्कृत अध्ययन केंद्र बताता रहा है. वहीं मुस्लिम याचिकाकर्ता इसे कमाल मौला मस्जिद परंपरा से जोड़ते रहे हैं. सर्वेक्षणों और ऐतिहासिक दस्तावेजों में एक ओर हिंदू प्रतीक और मूर्तिशिल्प के प्रमाण मिलते हैं, तो दूसरी ओर परिसर में फारसी और अरबी शिलालेखों का भी उल्लेख है. यही कारण है कि भोजशाला मध्य प्रदेश के सबसे विवादित और संवेदनशील विरासत स्थलों में से एक रही है. 

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मामला सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा के दायरे में

हालिया एएसआई सर्वे में परिसर और उसके आसपास से 1,700 से अधिक पुरातात्विक अवशेष मिलने की बात सामने आई थी. इनमें मूर्तियां, स्तंभ, संरचनात्मक अवशेष और इतिहास के कई बिखरे हुए टुकड़े शामिल बताए गए. हिंदू पक्ष ने इन अवशेषों को धार्मिक और शैक्षणिक परंपरा से जोड़ा. हाईकोर्ट के फैसले में भी पुरातात्विक और ऐतिहासिक सामग्री को महत्वपूर्ण आधार माना गया, हालांकि अब यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा के दायरे में है. 

भोजशाला की कहानी में एक और अध्याय जुड़ा 

भोजशाला के पत्थरों ने साम्राज्यों को बनते-बिगड़ते देखा है, यहां प्रार्थनाओं के स्वर बदले, शिलालेखों पर धूल जमी, इतिहास के अर्थ बदले और पीढ़ियों ने इसकी पहचान को लेकर संघर्ष किया.  लेकिन, हाईकोर्ट के फैसले और मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भोजशाला की कहानी में एक और अध्याय जुड़ गया है एक ऐसा अध्याय जो तय करेगा कि भोजशाला को केवल विवाद के रूप में याद किया जाएगा या राजा भोज की कल्पना के अनुरूप ज्ञान, संस्कृति और बौद्धिक विरासत के प्राचीन केंद्र के रूप में फिर से स्थापित किया जाएगा. 

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