जिस भोजशाला को परमार राजा भोज ने ज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित किया उस ऐतिहासिक मान्यता के करीब एक हजार साल बाद, और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने विवादित परिसर को मां सरस्वती को समर्पित मंदिर घोषित किया, इस फैसले के लगभग 10 दिन बाद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सोमवार 25 मई को धार की ऐतिहासिक भोजशाला को एक बड़े राजनीतिक, सांस्कृतिक और विकासात्मक ऐलान का केंद्र बना दिया.
यह घोषणा उस ऐतिहासिक फैसले के करीब दस दिन बाद हुई है, जिसमें 15 मई 2026 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने भोजशाला परिसर को मां सरस्वती को समर्पित हिंदू मंदिर घोषित किया था. इस फैसले के बाद वह पुरानी व्यवस्था प्रभावी रूप से समाप्त हो गई, जिसके तहत एएसआई की व्यवस्था के अनुसार मंगलवार को हिंदू पक्ष पूजा करता था और शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष नमाज अदा करता था. हाईकोर्ट के इस फैसले से असंतुष्ट मुस्लिम पक्ष अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है.
प्राचीन ज्ञान परंपरा का प्रतीक
औद्योगिक विकास की नई धारा बहेगी
मुख्यमंत्री ने इस घोषणा को धार के व्यापक विकास रोडमैप से भी जोड़ा. उन्होंने कहा- राजा भोज की इस पावन भूमि पर अब विरासत संरक्षण से लेकर जल संरक्षण और औद्योगिक विकास तक समग्र विकास की नई धारा बहेगी. राजा भोज को जल प्रबंधन का अग्रदूत बताते हुए मुख्यमंत्री ने धार की पुरानी पहचान “तालाबों की नगरी” के रूप में याद की. उन्होंने कहा कि यहां बारह-साढ़े बारह तालाबों की ऐसी व्यवस्था बनाई गई थी, जिसमें एक तालाब भरने के बाद उसका अतिरिक्त पानी अपने आप अगले तालाब में पहुंच जाता था.
सीएम का दौरान एक नए अध्याय का संकेत
भोजशाला एमपी के सबसे विवादित और संवेदनशील विरासत में से एक
हालांकि भोजशाला की कहानी बेहद संवेदनशील और परतदार है. हिंदू पक्ष लंबे समय से इसे मां वाग्देवी का प्राचीन मंदिर और राजा भोज से जुड़ा संस्कृत अध्ययन केंद्र बताता रहा है. वहीं मुस्लिम याचिकाकर्ता इसे कमाल मौला मस्जिद परंपरा से जोड़ते रहे हैं. सर्वेक्षणों और ऐतिहासिक दस्तावेजों में एक ओर हिंदू प्रतीक और मूर्तिशिल्प के प्रमाण मिलते हैं, तो दूसरी ओर परिसर में फारसी और अरबी शिलालेखों का भी उल्लेख है. यही कारण है कि भोजशाला मध्य प्रदेश के सबसे विवादित और संवेदनशील विरासत स्थलों में से एक रही है.
मामला सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा के दायरे में
भोजशाला की कहानी में एक और अध्याय जुड़ा
भोजशाला के पत्थरों ने साम्राज्यों को बनते-बिगड़ते देखा है, यहां प्रार्थनाओं के स्वर बदले, शिलालेखों पर धूल जमी, इतिहास के अर्थ बदले और पीढ़ियों ने इसकी पहचान को लेकर संघर्ष किया. लेकिन, हाईकोर्ट के फैसले और मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भोजशाला की कहानी में एक और अध्याय जुड़ गया है एक ऐसा अध्याय जो तय करेगा कि भोजशाला को केवल विवाद के रूप में याद किया जाएगा या राजा भोज की कल्पना के अनुरूप ज्ञान, संस्कृति और बौद्धिक विरासत के प्राचीन केंद्र के रूप में फिर से स्थापित किया जाएगा.
भोजशाला: आदेश के बाद पहले शुक्रवार को घरों और मस्जिदों में हुई नमाज, मंदिर में दिनभर चली पूजा
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