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लंदन में कहां और किस हालत में है भोजशाला की मां वाग्देवी की असली मूर्ति? NDTV को मिलीं Exclusive तस्वीरें

Vagdevi Idol News: एनडीटीवी आपके लिए लंदन के उस म्यूजियम के अंदर से वीडियो लेकर आया है जहां वाग्देवी की प्रतिमा रखी हुई है. जिनको न जानकारी हो उनके लिए बता दें कि वाग्देवी माता सरस्वती माता का ही एक और नाम है.

लंदन में कहां और किस हालत में है भोजशाला की मां वाग्देवी की असली मूर्ति? NDTV को मिलीं Exclusive तस्वीरें
vagdevi temple
  • भोजशाला परिसर को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मंदिर घोषित किया है और वहां वाग्देवी की मूर्ति स्थापित की गई है
  • असली वाग्देवी की मूर्ति लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में सुरक्षित है जो 11वीं सदी की संगमरमर की मूर्ति है
  • ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मूर्ति पर खुदा शिलालेख वाग्देवी का उल्लेख करती है जो इसे धार के भोजशाला से जोड़ता है
नई दिल्ली/लंदन:

मध्य प्रदेश के धार जिले का भोजशाला परिसर सुर्खियों में है. वजह है वहां सालों से चला आ रहा एक विवाद, परिसर मंदिर था या मस्जिद? मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने विवाद पर विराम लगाते हुए इसे एक मंदिर माना है. हिंदू समुदाय ने इसे ऐतिहासिक फैसला बताते हुए वहां वाग्देवी की मूर्ति स्थापित कर पूजा भी शुरू कर दी. लेकिन कम लोग ही जानते होंगे कि भोजशाला मंदिर परिसर में स्थापित माता की मूर्ति असली नहीं है. असल मूरत तो सात समंदर पार लंदन में है जिसे अब वापस भारत लाने की मांग तेज हो गई है. सवाल तो ये भी उठेगा कि वाग्देवी की मूर्ति किस हालत में है? तो आइए आपको सब डिटेल में बताते हैं. एनडीटीवी आपके लिए लंदन के उस म्यूजियम के अंदर से वीडियो लेकर आया है जहां वाग्देवी की प्रतिमा रखी हुई है. जिनको न जानकारी हो उनके लिए बता दें कि वाग्देवी माता सरस्वती माता का ही एक और नाम है.

लंदन के इस म्यूजियम में रखी है वाग्देवी की मूर्ति 

लंदन के बीचों-बीच स्थित मशहूर 'ब्रिटिश म्यूजियम' की गैलरी संख्या 33 में, 11वीं सदी की सफेद संगमरमर से बनी अंबिका की एक मूल मूर्ति रखी हुई है.इस म्यूजियम में मौजूद करीब 80 लाख ऐतिहासिक चीजों में से यह भी एक है.कई लोगों का मानना है कि इस मूर्ति का संबंध मध्य प्रदेश के धार में स्थित भोजशाला की प्रसिद्ध वाग्देवी (देवी सरस्वती) की मूर्ति से है.

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धार की भोजशाला को लेकर चल रहे कानूनी और राजनीतिक विवाद के बीच यह मूर्ति एक बार फिर चर्चा में आ गई है.मध्य प्रदेश में अदालत की निगरानी में चल रहे पुरातात्विक सर्वे और सुनवाई ने इस जगह की ऐतिहासिक पहचान और यहां की लापता मूर्तियों से जुड़े सवालों को फिर से गरमा दिया है.एनडीटीवी (NDTV) की टीम ने ब्रिटिश म्यूजियम के अंदर जाकर विशेष रूप से इस मूर्ति को देखा और इसका वीडियो बनाया, जहां यह आज भी आम जनता के दर्शन के लिए रखी हुई है.

किस हालत में लंदन के म्यूजियम में हैं मां वाग्देवी?

ब्रिटिश म्यूजियम के रिकॉर्ड के अनुसार, संगमरमर की यह मूर्ति 1034 ईस्वी की है, जब वहां राजा भोज के अधीन परमार राजवंश का शासन था.बताया जाता है कि यह मूर्ति 1875 में धार में सिटी पैलेस के खंडहरों के बीच मिली थी और इसे 1880 के आसपास ब्रिटेन ले जाया गया था. तब से इसे बहुत ही शानदार और सुरक्षित स्थिति में रखा गया है,और वर्तमान में यह म्यूज़ियम के 'एशियाई कलाकृतियों' के तहत 'मध्य और पश्चिम भारत' खंड में प्रदर्शित है. इस मूर्ति पर खुदे एक शिलालेख (inscription) में "वाग्देवी" का जिक्र है, जिन्हें वाणी और ज्ञान की देवी माना जाता है.इस जिक्र ने उन दावों को और मजबूत कर दिया है जो इस मूर्ति को भोजशाला से जोड़ते हैं,जिसे कई हिंदू लंबे समय से एक सरस्वती मंदिर मानते भी आए हैं.

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मूर्ति को वापस लाने की मांग तेज

यह विवाद अब धार से आगे बढ़कर ब्रिटेन के सबसे प्रतिष्ठित संग्रहालयों (म्यूजियम) तक पहुंच गया है, जिसने औपनिवेशिक काल (गुलामी के दौर) की कलाकृतियों, उनके मालिकाना हक और उन्हें वापस अपने देश लौटाने से जुड़े बड़े सवालों को एक बार फिर हवा दे दी है.साल 2022 में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए, 'ग्लासगो म्यूजियम्स' ने मंदिर की 1,000 साल से भी पुरानी नक्काशी समेत छह भारतीय कलाकृतियों को वापस करने पर सहमति जताई थी.इसे ब्रिटेन के किसी म्यूजियम से भारतीय वस्तुओं की अब तक की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण वापसी माना जाता है.औपनिवेशिक काल के दौरान मंदिरों, पूजनीय स्थलों और शाही खजाने से ली गई इन कलाकृतियों को, भारतीय उच्चायोग के प्रतिनिधियों के साथ हुए एक समझौते के बाद आधिकारिक तौर पर वापस सौंप दिया गया था.

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यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के कला इतिहासकार और पोस्टडॉक्टरल फेलो डॉ. विवेक गुप्ता ने कहा, "भले ही ब्रिटेन कलाकृतियों को बहुत ही शानदार तरीके से सुरक्षित रखता है, लेकिन वहां के म्यूजियम के कई क्यूरेटर (संग्रहालय अध्यक्ष) संस्कृत भाषा नहीं समझते हैं.इस वजह से उनके लिए इन कलाकृतियों के असली सांस्कृतिक, कलात्मक अर्थ और महत्व को पूरी तरह से समझ पाना मुश्किल हो जाता है."

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