- इंदौर के 6 सरकारी अस्पतालों के पीने के पानी में ई-कोलाई और टोटल कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया पाए गए हैं.
- 6 अस्पतालों के पानी की जांच में मलजनित प्रदूषण के संकेत देने वाले बैक्टीरिया पाए जाने से सुरक्षा पर सवाल उठे.
- कई अस्पतालों में आरओ प्लांट बंद मिले और वाटर कूलर के आसपास गंदगी देखी गई, जिससे पेयजल व्यवस्था की खराबी दिखी.
इंदौर के भागीरथपुरा दूषित पानी कांड की यादें अभी धुंधली भी नहीं हुई हैं. दिसंबर 2025 में गंदे पानी के कारण 36 लोगों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया था. अब शहर के सरकारी अस्पतालों से सामने आई एक नई रिपोर्ट ने चिंता और बढ़ा दी है. जांच में खुलासा हुआ है कि इंदौर के कई बड़े सरकारी अस्पतालों के पीने के पानी में ई-कोलाई और टोटल कॉलीफॉर्म जैसे बैक्टीरिया मिले हैं, जिन्हें मानव मल से होने वाले प्रदूषण का संकेत माना जाता है. यह खुलासा इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इन अस्पतालों में रोजाना हजारों मरीज और उनके परिजन पानी का उपयोग करते हैं.
9 अस्पतालों के सैंपलों की जांच में खुलासा
शहर के 9 सरकारी अस्पतालों में पानी की गुणवत्ता जांचने के लिए सैंपल लिए थे. ये सैंपल अस्पतालों में मरीजों और उनके परिजनों के लिए लगाए आरओ प्लांट, वाटर कूलर और अन्य पेयजल स्रोतों से लिए. जांच रिपोर्ट में सामने आया कि 6 अस्पतालों के पानी में ई-कोलाई और टोटल कॉलीफॉर्म की मौजूदगी मिली है, जिससे अस्पतालों की पेयजल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.
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इन अस्पतालों का पानी जांच में फेल
रिपोर्ट के अनुसार पीसी सेठी अस्पताल, एमवाय अस्पताल, मानसिक चिकित्सालय, जिला अस्पताल, सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और चाचा नेहरू अस्पताल के पानी के नमूनों में बैक्टीरिया मिले हैं. ये सभी अस्पताल इंदौर के प्रमुख सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में शामिल हैं, जहां बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं. ऐसे में रिपोर्ट का सामने आना स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाने वाला माना जा रहा है.
कई जगह बंद मिले RO प्लांट
जांच के दौरान केवल पानी की गुणवत्ता ही नहीं, बल्कि अस्पतालों की पेयजल व्यवस्था में कई खामियां भी सामने आईं. रिपोर्ट में बताया गया है कि कई स्थानों पर आरओ प्लांट बंद मिले. वहीं कुछ वाटर कूलरों के आसपास गंदगी भी देखी गई. इससे यह सवाल उठ रहा है कि पेयजल व्यवस्थाओं की नियमित निगरानी और देखरेख कितनी गंभीरता से की जा रही है.
ई-कोलाई मिलने का क्या मतलब है?
विशेषज्ञों के अनुसार, ई-कोलाई बैक्टीरिया आमतौर पर मलजनित प्रदूषण का संकेत माना जाता है. यदि यह पीने के पानी में पाया जाए तो पेट और आंतों से जुड़े संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है. अस्पतालों में भर्ती मरीज पहले से ही स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे होते हैं, ऐसे में दूषित पानी उनके लिए अतिरिक्त जोखिम पैदा कर सकता है. यही वजह है कि इस रिपोर्ट को बेहद गंभीर माना जा रहा है.
रिपोर्ट में जिला अस्पताल की पानी व्यवस्था का भी जिक्र किया है. जानकारी के मुताबिक यहां पानी वितरण के लिए सामाजिक संस्था द्वारा उपलब्ध कराए लोटों का उपयोग किए जाने की बात सामने आई है. इस व्यवस्था को लेकर भी स्वच्छता और संक्रमण नियंत्रण के मानकों पर सवाल खड़े हो रहे हैं.
सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में भी मिली गड़बड़ी
जांच रिपोर्ट के अनुसार सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल की सातवीं मंजिल पर लगे आरओ प्लांट और कैंटीन के पानी में भी ई-कोलाई और टोटल कॉलीफॉर्म पाए गए हैं. इससे स्पष्ट होता है कि समस्या किसी एक अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि कई संस्थानों में स्वच्छ पेयजल व्यवस्था को लेकर सुधार की जरूरत है.
हाइजीन और सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल
अस्पतालों को मरीजों के लिए सबसे सुरक्षित जगह माना जाता है, लेकिन इस रिपोर्ट के बाद हाइजीन और पेयजल प्रबंधन को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं. मरीजों और उनके परिजनों को उपलब्ध कराए जाने वाले पानी की गुणवत्ता सुनिश्चित करना अस्पताल प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है.
अधिकारियों ने क्या कहा?
मामले में अधिकारियों का कहना है कि अस्पतालों में नियमित रूप से पानी के सैंपलों की जांच कराई जाती है. यदि किसी नमूने में कोई कमी या प्रदूषण मिलता है तो अस्पताल अधीक्षक को इसकी सूचना देकर आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए जाते हैं. हालांकि रिपोर्ट सामने आने के बाद अब लोगों की नजर इस बात पर है कि संबंधित अस्पतालों में कमियों को दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं.
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