Khelo India Tribal Games 2026: असम के धेमाजी जिले की 19 वर्षीय वेटलिफ्टर मोनिखा सोनोवाल ने गुरुवार को अपने पहले खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 में महिला 48 किलोग्राम वर्ग का स्वर्ण पदक जीतकर सबका ध्यान खींचा. राजमिस्त्री की बेटी मोनिखा ने यह कामयाबी तब हासिल की, जब वे पिछले तीन महीनों से घुटने की गंभीर चोट से जूझ रही थीं और उन्हें प्रतियोगिता न खेलने की सलाह दी गई थी. सीमित संसाधनों, आत्म‑संदेह और शारीरिक दर्द के बावजूद उन्होंने मजबूत इच्छाशक्ति, एनसीओई ईटानगर में मिली ट्रेनिंग और खुद पर भरोसे के दम पर गोल्ड मेडल जीतकर साबित कर दिया कि हौसले के आगे हालात भी झुक जाते हैं.

Khelo India Tribal Games 2026: मोनिखा सोनोवाल बीच में
पदक जीतने के बाद दिल छू लेना किस्सा
“शायद वह अभी कंस्ट्रक्शन साइट पर व्यस्त होंगे…”फोन मिलाते वक्त 19 साल की मोनिखा सोनोवाल के चेहरे पर वही मुस्कान थी, जिसमें जीत का सुकून भी था और संघर्ष की यादें भी. कुछ ही मिनट पहले उन्होंने पहले खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 में महिलाओं के 48 किलोग्राम वेटलिफ्टिंग वर्ग का स्वर्ण पदक जीता था. यह सिर्फ एक मेडल नहीं, बल्कि उस भरोसे की जीत थी, जो बार‑बार चोट और हालात से लड़कर भी कायम रहा.
राजमिस्त्री पिता की संघर्ष भरी जिंदगी बनी ताकत
मोनिखा के पिता पद्मधर सोनोवाल, पेशे से राजमिस्त्री हैं. दिनभर निर्माण स्थलों पर काम कर वे अपने परिवार का पालन‑पोषण करते हैं. चार लोगों के इस छोटे से परिवार में संसाधन सीमित थे, लेकिन सपनों पर कोई रोक नहीं थी. मोनिखा बताती हैं कि उनके पिता हर मुकाबले से पहले सिर्फ इतना कहते थे “हार भी सहेजना, लेकिन कोशिश कभी मत छोड़ना.”
असम के छोटे गांव से शुरू हुई कहानी
असम के धेमाजी जिले का बटघोरिया पेनबेनी चौक गुवाहाटी से करीब 425 किलोमीटर दूर, ब्रह्मपुत्र के उत्तरी तट पर बसा एक शांत इलाका. यहां की जिंदगी साधारण है. अधिकतर परिवारों के सपने रोजमर्रा की जरूरतों के दायरे में ही सिमटे रहते हैं. मोनिखा दो बहनों में बड़ी हैं, लेकिन उनका सपना बाकी सबसे अलग था.

Khelo India Tribal Games 2026: मोनिखा सोनोवाल की संघर्ष
बारबेल की आवाज ने बदली दिशा
वेटलिफ्टिंग हॉल में बजती बारबेल की आवाज… यही वह पल था, जब मोनिखा को लगा कि यह खेल सिर्फ ताकत नहीं, बल्कि रास्ता भी है. सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने खेल में दिल लगाया. धीरे‑धीरे उनकी जिज्ञासा जुनून में बदली. इस सफर में उन्हें सबसे बड़ी प्रेरणा मिली टोक्यो ओलंपिक की रजत पदक विजेता मीराबाई चानू से. उनकी कहानी ने मोनिखा को यह भरोसा दिया कि छोटे गांव की बेटी भी बड़ा सपना देख सकती है.
NCOE ईटानगर से मिली नई उड़ान
मोनिखा के करियर का बड़ा मोड़ तब आया, जब दो साल पहले उन्हें भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (NCOE), ईटानगर में जगह मिली. यहीं उन्हें प्रोफेशनल ट्रेनिंग, संतुलित पोषण, बेहतर मार्गदर्शन और चोट से उबरने का वैज्ञानिक सपोर्ट मिला. मोनिखा कहती हैं कि “NCOE ईटानगर ने मुझे वह सब दिया, जिसकी कल्पना मेरे जैसे छोटे गांव की खिलाड़ी सिर्फ सपने में कर सकती है. अगर यहां का सपोर्ट न मिलता, तो शायद मैं आज यहां नहीं होती.”
चोट, संदेह और सबसे बड़ा फैसला;‘मौके बार‑बार नहीं आते'
पिछले तीन महीनों से मोनिखा दाहिने घुटने की चोट से जूझ रही थीं. यह चोट ट्रेनिंग के दौरान लगी थी. मेडिकल और कोचिंग स्टाफ ने सलाह दी कि वे खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में हिस्सा न लें. लेकिन मोनिखा के लिए यह फैसला आसान नहीं था. वे कहती हैं “कोच मेरे घुटने को लेकर चिंतित थे. उन्होंने आराम करने को कहा. लेकिन ऐसे मौके बार‑बार नहीं आते. मैं इतना बड़ा मंच छोड़ना नहीं चाहती थी.”
चोट के बावजूद जीता गोल्ड
गुरुवार को मोनिखा ने दर्द को पीछे छोड़ते हुए मंच संभाला. हर लिफ्ट के साथ उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया. और अंत में, खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स का पहला वेटलिफ्टिंग गोल्ड उनके नाम दर्ज हो गया. यह जीत सिर्फ तकनीक की नहीं थी, बल्कि मानसिक मजबूती की भी थी.
सफलता कोई संयोग नहीं; पदकों से सजी मेहनत की कहानी
मोनिखा की कामयाबी एक दिन में नहीं आई. हर टूर्नामेंट ने उन्हें और मजबूत बनाया है.
- 2023: स्कूल नेशनल्स में स्वर्ण पदक
- 2024: ओडिशा के संबलपुर में खेलो इंडिया अस्मिता लीग – रजत
- 2025: तेजपुर राज्य चैंपियनशिप – कांस्य
- इंटर‑यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप, चंडीगढ़ – आठवां स्थान
‘यह तो बस शुरुआत है'; भारत के लिए खेलने का सपना
गोल्ड मेडल जीतने के बाद मोनिखा की नजरें अगले लक्ष्य पर थीं. वे कहती हैं “मैं हर दिन खुद को बेहतर बनाना चाहती हूं. एक दिन भारत का प्रतिनिधित्व करना मेरा सपना है. यह गोल्ड मेरी यात्रा की बस शुरुआत है.”
छोटे गांव की बड़ी प्रेरणा
मोनिखा सोनोवाल की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता नहीं है. यह कहानी है उस जज्बे की, जो सीमित हालात में भी हार मानने से इनकार कर देता है. राजमिस्त्री की बेटी ने यह साबित कर दिया कि अगर सपना सच्चा हो और हिम्मत मजबूत हो तो रास्ते खुद बन जाते हैं.
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