- मध्य प्रदेश CM डॉ. मोहन यादव के कार्यक्रम में उपयोग किया गया पानी गंदगी के मानकों से बहुत अधिक पाया गया था
- CM सुरक्षा टीम ने VVIP प्रोटोकॉल के तहत खाद्य सामग्री और पानी की जांच में कई जरूरी प्रक्रियाएं नहीं अपनाईं
- टर्बिडिटी स्तर स्वीकार्य सीमा से कई गुना अधिक पाया गया जबकि अन्य महत्वपूर्ण जल गुणात्मक परीक्षण नहीं किए गए
मध्यप्रदेश में इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से कथित तौर पर कई लोगों की मौत और असुरक्षित पेयजल के जानलेवा नतीजों के सामने आने के कुछ ही महीनों बाद मध्य प्रदेश में एक और चौंकाने वाला मामला सामने आया है. इस बार मामला खुद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कार्यक्रम से जुड़ा है.
एनडीटीवी के पास मौजूद हैं सबूत
NDTV के पास स्टेट रिसर्च लेबोरेटरी की जांच रिपोर्ट, मुख्यमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े पुलिस अधीक्षक सुरक्षा एवं मुख्य सुरक्षा अधिकारी का पत्र और उज्जैन संभागायुक्त द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस मौजूद है. ये दस्तावेज मिलकर कई स्तरों पर हुई चूक की ओर इशारा करते हैं. वीवीआईपी कार्यक्रम के लिए रखा गया पानी घटिया पाया गया, जवाबदेही कागजी कार्रवाई तक सीमित दिखी और जल गुणवत्ता विशेषज्ञों के अनुसार, भागीरथपुरा जैसी त्रासदी के बाद जिन अहम मानकों की जांच होनी चाहिए थी, लैब टेस्टिंग में वे पैरामीटर भी शामिल नहीं किए गए.
सेमलिया आश्रम में मुख्यमंत्री का दौरा
यह पानी 30 अप्रैल को शाजापुर जिले के सेमलिया आश्रम में मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान रखा गया था. पुलिस अधीक्षक सुरक्षा एवं मुख्य सुरक्षा अधिकारी (मुख्यमंत्री) के पत्र के अनुसार जिला प्रशासन ने कार्यक्रम में उपयोग के लिए पेयजल और खाद्य सामग्री रखवाई गई थी . उपयोग के दौरान सामग्री के अमानक होने का संदेह हुआ, इसके बाद मुख्यमंत्री निवास के चिकित्सा अधिकारी ने खाद्य सामग्री और पानी को खाद्य सुरक्षा अधिकारी, भोपाल के माध्यम से जांच के लिए भेजा.
ये तीन चूक हुई
यह पहली चूक थी, मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के लिए रखा गया पानी पेयजल सुरक्षा के एक महत्वपूर्ण मानक पर खरा नहीं उतरा.
दूसरी चूक वीवीआईपी प्रोटोकॉल से जुड़ी है, मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव को जेड प्लस सुरक्षा प्राप्त है. उच्च पदस्थ सूत्रों ने एनडीटीवी को बताया कि ऐसे मामलों में सख्त स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर का पालन किया जाता है और दौरे के हर पहलू के लिए विशेषज्ञ नियुक्त होते हैं. मुख्यमंत्री की सुरक्षा टीम पर एसओपी अनुपालन की समग्र जिम्मेदारी होती है, जिसमें खाद्य सामग्री का प्रमाणन, खाद्य अधिकारियों और बैगेज हैंडलर्स की मौजूदगी, एंटी-सैबोटाज ड्रिल, मैकेनिकल चेक और भोजन-पेय पदार्थ परोसे जाने से पहले उनकी जांच शामिल है.
तीसरी चूक रिपोर्ट आने के बाद की कार्रवाई में दिखती है. 18 मई को उज्जैन संभागायुक्त आशीष सिंह ने शाजापुर के जिला आबकारी अधिकारी विनय रंगशाही को कारण बताओ नोटिस जारी किया नोटिस में कहा गया है कि 30 अप्रैल को मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान वीआईपी भोजन व्यवस्था, कक्ष व्यवस्था, हेलीपैड व्यवस्था और समय-समय पर दिए गए निर्देशों के पालन की जिम्मेदारी संबंधित अधिकारी को दी गई थी.
गुणवत्ताहीन एवं पीने योग्य नहीं
नोटिस में साफ लिखा गया कि उनके द्वारा उपलब्ध कराया गया पेयजल “गुणवत्ताहीन एवं पीने योग्य नहीं” पाया गया. इसमें यह भी कहा गया कि स्टेट रिसर्च लेबोरेटरी, भोपाल ने पानी के नमूने में हाई टर्बिडिटी पाई. संभागायुक्त ने इसे वीआईपी ड्यूटी के प्रति गंभीर लापरवाही और गैर-जिम्मेदारी बताते हुए पूछा कि क्यों न उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई प्रस्तावित की जाए.
लेकिन नोटिस की गंभीर भाषा के बावजूद अब तक कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई, बल्कि संबंधित अधिकारी विनय रंगशाही का तबादला शाजापुर से खंडवा जिला आबकारी अधिकारी के रूप में कर दिया गया. आबकारी विभाग का कहना है कि यह तबादला नियमित प्रक्रिया के तहत किया गया है. चौथी और शायद सबसे चिंताजनक चूक अब जल गुणवत्ता विशेषज्ञ और पर्यावरणविद् डॉ. सुभाष सी. पांडे ने उठाई है, पानी की गुणवत्ता पर काम करने वाले डॉ. पांडे के अनुसार, जांच ही अधूरी थी.
लैबोरेटरी ने कई महत्वपूर्ण पैरामीटर की जांच नहीं
डॉ. पांडे ने एनडीटीवी से कहा, “लैबोरेटरी ने कई महत्वपूर्ण पैरामीटर की जांच नहीं की. Dissolved Oxygen की जांच नहीं हुई, हैवी मेटल्स की जांच नहीं हुई, bacteriological parameters की जांच नहीं हुई और pesticide parameters भी शामिल नहीं किए गए जिन पैरामीटर की जांच होनी चाहिए थी, वही छोड़ दिए गए.” उनका यह आंकलन मामले को और गंभीर बनाता है. लैब रिपोर्ट ने हाई टर्बिडिटी तो उजागर कर दी, लेकिन इस बड़े सवाल का जवाब नहीं मिला कि पानी में और क्या मौजूद था?
उन्होंने कहा कि हाई टर्बिडिटी केवल पानी के गंदा दिखने का मामला नहीं है, यह इस बात का चेतावनी संकेत है कि पानी को साफ करने की प्रक्रिया विफल हो सकती है. उन्होंने कहा, “इसका मतलब है कि वाटर ट्रीटमेंट प्रोसेस प्रभावी नहीं है. पानी को शुद्ध करने के लिए जो प्रक्रियाएं अपनाई जानी चाहिए थीं, वे या तो पूरी तरह विफल हो गईं या उनका पालन ही नहीं किया जा रहा. यह बेहद गंभीर मामला है.”
गेस्ट्रोइंटेस्टाइनल बीमारियों की आशंका
डॉ. पांडे ने यह भी चेतावनी दी कि अत्यधिक गंदले पानी में खतरनाक रोगजनक छिपे हो सकते हैं. उन्होंने कहा, “इस तरह के गंभीर कंटैमिनेशन में hidden pathogens बैक्टीरिया, वायरस और पैरासाइट्स की मौजूदगी का बड़ा खतरा रहता है. इससे गेस्ट्रोइंटेस्टाइनल बीमारियों की आशंका काफी बढ़ जाती है.”
इसलिए यह मामला अब केवल पानी के एक खराब नमूने तक सीमित नहीं है, दस्तावेज और विशेषज्ञ की राय मिलकर बताते हैं कि व्यवस्था, निरीक्षण, प्रोटोकॉल, जवाबदेही और यहां तक कि जांच हर स्तर पर चूक हुई. मध्य प्रदेश ने हाल ही में भागीरथपुरा की भयावहता देखी थी, जहां दूषित पानी से कई लोगों मौतें हुईं और बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े. उस त्रासदी के बाद सरकार ने कार्रवाई और सख्त जांच का भरोसा दिया था लेकिन कुछ ही हफ्तों बाद मुख्यमंत्री के अपने कार्यक्रम के लिए रखा गया पानी बुनियादी सुरक्षा मानक पर फेल हो गया. अगर भागीरथपुरा ने आम नागरिकों के सामने मौजूद खतरे को उजागर किया था, तो शाजापुर का यह मामला दिखाता है कि वीवीआईपी व्यवस्था भी दूषित पानी और प्रशासनिक लापरवाही से अछूती नहीं है.
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